Thursday, March 19, 2026

जीवन का नव-सृजन- अजला फाउंडेशन की प्रदर्शनी 'उज्जीवन'






अजला फाउंडेशन की वार्षिक प्रदर्शनी उज्जीवन शीर्षक से 19 मार्च 2026 को दिल्ली की गांधी दर्शन गैलरी में शुरु हुई। उज्जीवन का अर्थ है फिर से पनपना यानी पुनर्जीवन या दूसरे शब्दों में नये सिरे से रचना, देखना, विश्लेषित करना, अभिव्यक्त करना। करीब सौ कलाकारों की इस प्रदर्शनी में प्रत्येक कलाकार की रचना में यही दिखाई दिया। मूर्त व अमूर्त रचनाओं के समन्वित आयोजन में विभिन्न आयुवर्ग के कलाकार शामिल हैं। प्रदर्शित कलाकृतियों में पेंटिंग, शिल्प, ड्राइंग आदि शामिल हैं।




प्रदर्शनी में शामिल सभी कलाकारों के नाम गिना पाना और उनकी रचनाओं का विश्लेषण संभव नहीं है पर जिन कलाकारों के कामों ने अधिक प्रभावित किया उनमें अजय समीर, अमित कल्ला, प्रकाश चांदवडकर, पूजा मुदगल, नीरजा चांदना, प्रवीण सैनी, हर्ष लोम्बा, सुनीता लांबा, देवीदास खत्री, नीरज शर्मा, सुरजीत कुमार, विनोद गोस्वामी, बबिता पात्रा, राम ओंकार, वेद प्रकाश भारद्वाज, पंकज हरजाई, सचिन कुमार, शर्मिला शर्मा, प्रीति जैन, छाया दुबे, कविता राजपूत आदि के काम शामिल हैं।




उज्जीवन, संस्कृत से उत्पन्न यह शब्द पुनर्जीवन और पुनसृजन से संदर्भित है जो कला का एक आयाम है। कला में एक कलाकार जीवन को नये सिरे से खोजता, रचता और अभिव्यक्त करता है। उसकी अभिव्यक्ति का रुप कुछ भी हो सकता है, मूर्त या अमूर्त पर उसमें जीवन को नये सिरे से सिरजने की इच्छा ही केंद्र में होती है। प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं में यह बात साफ दिखाई देती है। अनेक कलाकारों के काम में जीवन के सार तत्व की खोज के रूप में हमें अमूर्त संरचनाओं का मुक्त संसार दिखाई देता है। इन रचनाओं में जीवन का रूप नहीं, उसका भाव प्रमुख है। दूसरी तरफ अनेक रचनाकारों ने आकृतिमूलक कामों के माध्यम से जीवन को सिरजा है।





प्रदर्शित आकृतिमूलक कामों में से कई में हमें अमूर्तन का प्रभाव भी दिखाई देता है। कई कलाकारों ने इसीलिए मानव आकृतियों को रचते समय उनके अंगों को अमूर्त रखा है। यही वास्तविक जीवन है, जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं है। यह जीवन को अलग तरह से देखने की दृष्टि है। कुछ कलाकारों के काम में अध्यात्म और दर्शन की अभिव्यक्ति है। जीवन अपने आप में ऐसा उलझा हुआ दर्शन है जिसे आज तक कोई पूरी तरह खोल नहीं पाया है। आध्यात्मिकता जीवन का आधार है। इन दोनों, अध्यात्म और दर्शन को मिलाकर कलाकारों ने जीवन को प्रतिकात्मक रूप में पुनः रचा है। प्रदर्शनी में शामिल शिल्पों में भी हमें यही दिखाई देता है।




पेंटिंग में कैनवास पर जब रंग अपनी आभा बिखेरते हैं, और जब आकार बनते-बिगड़ते हैं तो उनमें हमें जीवन का वह रूप दिखाई देता है जो उसके दृश्यरूप से एकदम अलग होता है। कैनवास जैसे जीवन की धड़कन बन जाता है। वहां हमें मानवीय आशाओं, सपनों और कल्पनाओं की उड़ान दिखाई देती है। उनमें जीवन अपने अनेकानेक रूपों में दिखाई देने लगता है। प्रत्येक चित्र को देखते हुए प्रत्येक दर्शक अपनी तरह से जीवन को फिर से खिलते हुए महसूस करता है।


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