Sunday, March 29, 2026

मोहन सामंत


मोहन सामंत अपनी एक रचना के साथ


भारत की स्वतंत्रता के बाद मुंबई में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के रूप में आधुनिक भारतीय कला का एक नया रूप उभर कर सामने आया था। इस ग्रुप के ज्यादातर सदस्य जहाँ पेरिस के कला जगत से प्रभावित थे वहीं मोहन सामंत और एमएफ हुसेन ने भारतीय चित्रकला परंपरा से प्रेरणा लेकर अपनी अलग कला भाषा विकसित की थी। मोहन सामंत का जन्म मुंबई के एक ज़मींदार परिवार में हुआ था। उन्होंने 1952 में सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स से ग्रेजुएशन किया। उन्हें भारत के दो सबसे प्रतिष्ठित कला सम्मान मिलेकलकत्ता की एकेडमी ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स का स्वर्ण पदक और बॉम्बे आर्ट सोसाइटी का स्वर्ण पदक। उन्होंने इटली सरकार की स्कॉलरशिप पर दो साल (1957-58) इटली में काम किया। उन्होंने एम. पालसिकर के सानिध्य में बसोहली लघु चित्रकला का अध्ययन किया। जनवरी 1959 में, वे रॉकफ़ेलर ग्रांट पर न्यूयॉर्क आए। 2004 में न्यूयॉर्क में उनका निधन हुआ।



प्रसिद्ध कला इतिहासकार और आलोचक जॉन रिचर्डसन ने 1963 में इस कलाकार को दुनिया के 100 सर्वश्रेष्ठ कलाकारों में शामिल किया था। पॉल क्ली और पिकासो जैसे चित्रकारों से प्रभावित सामंत अपनी खुद की शैली और रूप गढ़ने को महत्व देते थे। वह पश्चिमी कलाकारों से प्रभावित अवश्य हुए परंतु उन्होंने भारतीय कला परंपरा को अधिक महत्वपूर्ण माना। सामंत ने कहा था, "आप जिस चीज़ को लगातार रचते रहते हैं, उसी में आपका विकास होता है।" और "चित्रकला के 25 अलग-अलग तरीके हैं, और कैनवस के सामने आने पर 15 अलग-अलग तरीकों से कोई रूप उभरता है। आप खुद को दोहराते नहीं हैं।"



50 के दशक की शुरुआत में, सामंत 'प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप' (PAG) में शामिल हो गए। जहाँ उनके साथी सदस्यों ने अपनी प्रेरणा मुख्य रूप से पेरिस से ली, वहीं सामंत ने मिस्र के समाधि-चित्रों, अजंता की भित्ति-चित्रों और राजपूती लघु-चित्रों की छवियों को खंगाला, और अपने काम में आदिम छवियों की एक श्रृंखला स्थापित की। बसोहली लघुचित्र कला के गहन अध्ययन ने उन्हें एक ऐसी चित्रभाषा विकसित करने में सहायता की जिसमें बाहरी रुप में पश्चिमी कला की तकनीक दिखाई देती है पर चित्रों की आत्मा भारतीय रही। घनवाद का प्रभाव उनके कामों में दिखाई देता है पर उसे उन्होंने अलग तरह से इस्तेमाल किया। उनके चित्रों की संरचना को देखें तो उनमें घनवाद का आंशिक प्रयोग ही है। उन्होंने चित्र में कभी मानव आकृतियों में तो कभी पूरक संरचनाओं में घनवादी संरचनाओं का इस्तेमाल करते हुए भारतीय विषयों को रचा।





सामंत 1968 में न्यूयॉर्क में स्थाई रुप से बस गये। एक इंटरव्यू में, वे मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट में घंटों बिताने का ज़िक्र करते हैं, जहाँ उन्हें दुनिया भर की सांस्कृतिक धरोहरों के संग्रह में आज भी शक्तिशाली प्रतीक मिलते रहते हैं। वे अपनी कला का वर्णन लगभग 'इंस्टॉलेशन आर्ट' (स्थापना कला) जैसा करते हैं; "बस फ़र्क इतना है कि मेरा इंस्टॉलेशन मेरे फ़्रेम के अंदर होता है।" इस तरह की रचनाओं के पीछे अंजता-एलेरा के भित्ति चित्रों की प्रेरणा मुख्य दिखाई देती है। क्योंकि उनके चित्रों को देखें तो उनमें एक विषय को विस्तार देते हुए किया गया चित्रण दिखाई देता है। एकल आकृतियों की जगह वह आकृतियों का समूह अधिक रचते थे।



सामंत की कला में शुरुआत से ही अनेक माध्यमों को मिलाकर काम करना शामिल रहा है। उन्होंने अलंकारिक और अमूर्त कला को मिलाकर तो काम किया ही, 1960 के दशक में उन्होंने रेत औरल गोंद के साथ रंगों को मिलकार अलग तरह के टैक्सचर के साथ काम किया। 1970 के दशक में उन्होंने कैनवास पर कागज के टुकड़ों को चिपकार काम किया। 1980 के दशक में उन्होंने तार से आकृतियां बनाना शुरु किया। वह तार से आकृतियाँ बनाते और उन्हें कैनवास परल चिपकाकर चित्र को पूरा करते। इस तरह उन्होंने अनेक माध्यमों को मिलाते हुए अपनी अभिव्यक्ति को अलग रूप दिया। अमूर्तन उनकी रचनाओं में मुख्य आकारों के साथ ही पृष्ठभूमि में भी मिलता है जिसके माध्यम से वह अपनी रचनाओं को बहुकोणीय बना देते थे।



सामंत एक चित्रकार के साथ ही संगीत में भी गहरी रुचि रखते थे। सारंगी उनका प्रिय वाद्य था जिसपर वह नियमित रियाज करते थे। इस संदर्भ में भी उन्होंने कहा था कि मैं सारंगी का रियाज़ नहीं करता। मैं इसे हर दिन ऐसे बजाता हूँ जैसे मैं किसी कॉन्सर्ट में हूँकभी बहुत अच्छा, तो कभी बहुत बुरा। इसी तरह, मैं ड्रॉइंग और स्केचिंग के ज़रिए पेंटिंग का रियाज़ नहीं करता। मैं बस पेंट करता हूँ, और अगर मुझे वह पसंद नहीं आता, तो मैं उसी कैनवस पर दो- तीन बार, या कई बार पेंट कर देता हूँ। मैं पेंटिंग की तैयारी के लिए ड्रॉइंग और स्केच का इस्तेमाल नहीं करता; वे पूरी तरह से अलग काम होते हैं। 18 मई, 2003 को उन्होंने अपने मैनहैटन स्टूडियो में, संगीत और कला से भरी एक दोपहर का आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने अपनी पेंटिंग्स से घिरे हुए, सारंगी पर भारतीय शास्त्रीय राग बजाए थे।



उनके प्रमुख एकल शो में जहांगीर आर्ट गैलरी, मुंबई (2000), बिड़ला एकेडमी ऑफ आर्ट, कोलकाता (1998), बिड़ला एकेडमी ऑफ आर्ट एंड कल्चर, मुंबई (1997), गैलरी बी.ए.आई., न्यूयॉर्क (1994, 1995), बर्थडे बुक, न्यूयॉर्क ( 1973 और 1975), सिलेक्टेड आर्टिस्ट्स गैलरी, न्यूयॉर्क (1972), पंडोल गैलरी, मुंबई (1967), गैलरी केमोल्ड, मुंबई और दिल्ली (1966), ताज आर्ट गैलरी, मुंबई (1966), ताज आर्ट गैलरी, मुंबई (1965), वर्ल्ड हाउस गैलरीज, न्यूयॉर्क (1961 और 1965),  और रोम इंस्टीट्यूट ऑफ ओरिएंटल स्टडीज, इटली (1958) शामिल हैं। 


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