प्रदर्शनी विचारः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
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| डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज, कलाकार जेपी सिंह और राजेंद्र प्रसाद सिंह |
ऑल इंडिया फाइन आर्ट एंड क्राफ्ट सोसायटी (AIFACS), नई दिल्ली में 11 मार्च से 22वीं राष्ट्रीय स्टूडियो पॉटरी प्रदर्शनी शुरू हुई है। इस प्रदर्शनी में देशभर के लगभग एक सौ कलाकारों की कृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। ललित कला के क्षेत्र में स्टूडियो पॉटरी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और यह प्रदर्शनी इस माध्यम की विविध संभावनाओं और समकालीन प्रयोगों को सामने लाती है।
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| जेपी सिंह अपनी प्रदर्शित रचनाओं के साथ। |
प्रदर्शनी में
पारंपरिक पॉटरी के साथ-साथ ऐसे अनेक काम भी देखने को मिलते हैं जिनमें कलाकारों ने
नए रूप और शिल्पगत प्रयोग किए हैं। सामान्यतः पॉटरी को उपयोगिता से जोड़कर देखा
जाता रहा है। प्लेट, मग और अन्य घरेलू उपयोग की क्रॉकरी लंबे समय तक इस कला का
प्रमुख हिस्सा रही है। लेकिन आज के कलाकार इस माध्यम को केवल उपयोगिता तक सीमित
नहीं रखते, बल्कि उसे कलात्मक अभिव्यक्ति के नए आयामों के साथ प्रस्तुत कर रहे
हैं।
प्रदर्शनी में
शामिल कई कृतियाँ शिल्प कला की श्रेणी में आती हैं, जबकि कुछ कामों में संस्थापन
कला की झलक भी दिखाई देती है। इससे स्पष्ट होता है कि स्टूडियो पॉटरी अब केवल
उपयोगी वस्तुओं के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि समकालीन कला के व्यापक
परिदृश्य में अपनी अलग पहचान बना रही है।
पॉटरी में
ग्लेज़िंग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आमतौर पर पॉटरी में चटख रंगों और आकर्षक
डिज़ाइनों पर विशेष ध्यान दिया जाता है, लेकिन स्टूडियो पॉटरी इससे अलग होती है।
यह कलाकार का व्यक्तिगत सृजन होता है, जिसमें वह नवीनता और प्रयोग को अधिक महत्व
देता है। स्टूडियो पॉटरी फैक्ट्री की तरह बड़े पैमाने पर तैयार नहीं की जाती।
अक्सर कलाकार यदि प्लेट भी बनाता है तो हर प्लेट अपने आप में अलग और विशिष्ट होती
है।
प्रदर्शनी में भी
यही विशेषता देखने को मिलती है। इस संदर्भ में कलाकार जे.पी. सिंह के काम का
उल्लेख किया जा सकता है, जिन्होंने पॉटरी के विविध रूपों में काम किया है। इसके
अलावा कई कलाकारों ने पूरी तरह शिल्पात्मक कृतियाँ भी रची हैं, जो इस माध्यम की
व्यापक संभावनाओं को उजागर करती हैं।








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