सोमवार, 10 अगस्त 2026

पूर्वावलोकनः प्रवाह प्रदर्शनीः वेद प्रकाश भारद्वाज



कला क्या हैयदि वह केवल किसी दृश्य, अनुभव या विचार को रूप देना नहीं, बल्कि स्वयं से आगे जाने की एक निरंतर कोशिश है?

चित्र, कविता, संगीत, नृत्य, शिल्प, छायाचित्रकला के रूप अनेक हैं, उनके माध्यम अलग-अलग हैं, उनकी भाषाएँ भी अलग हैं; लेकिन इन सबके भीतर एक अदृश्य धारा निरंतर बहती रहती है। यह धारा मनुष्य के अनुभव, उसकी संवेदना, उसकी स्मृति, उसके प्रश्नों और उसकी आकांक्षाओं से निर्मित होती है। कला इसी प्रवाह को किसी रूप में दृश्य, श्रव्य या अनुभव्य बनाती है।




शीमिता वात्सायन की रचना

पंकज निगम द्वारा क्यूरेट की गई समूह प्रदर्शनी, "प्रवाह - जीवन के प्रवाह का उत्सव" में पेंटर्स, मूर्तिकारों और फ़ोटोग्राफ़र्स की अभिव्यक्तियाँ माध्यमों और शैली की भिन्नता के बावजूद जीवन के जिस सतत प्रवाह को उजागर करती हैं, वह कलात्मक खोज की भावना को सामने लाती हैं। इस प्रदर्शनी में आदर्श मिश्रा, खुशबू शर्मा, प्रांजलि चौधरी, दीपक, पारुल कुमार, मनोजकुमार एम. साकले, आनंदा गुप्ता, सौरभ मजूमदार, अजब सिंह, सोनिया सरीन, संजीव कुमार सिन्हा, विनय कुमार, समीर मजूमदार, डिंपल चावला डांग, विकास बैजल, स्मिता घोष दत्ता, अजय रावत, डॉ. गुरदीप नागर, शीमिता वात्स्यायन, बासु कुमार, सेबी ऑगस्टीन, विनय विक्रम सिंह, जयंती बनर्जी, ज़ैद और पंकज निगम की रचनाएँ शामिल हैं। 4 से 10 सितंबर 2026 तक नई दिल्ली की आईफैक्स की गैलरियों में इस प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा।





जीवन के प्रवाह के उत्सव की प्रतीक इस प्रदर्शनी में शामिल कलाकारों की रचनाएँ देखने वालों को दृश्य में बांधती हैं तो मुक्त भी करती हैं। कला का एक आयाम, एक उद्देश्य दर्शक की मुक्ति भी है। एक कलाकार अपनी रचना के माध्यम से स्वयं को मुक्त करता है, और साथ ही दर्शक के लिए भी मुक्ति का एक मार्ग संभव करता है। यह मुक्ति है वर्तमान से, जड़ता से, पूर्वनिर्धारित अर्थों से और कभी-कभी स्वयं अपने बनाए हुए रूपों से भी। यह मुक्ति हमेशा प्रत्यक्ष नहीं होती। कभी वह रूप को तोड़ती है, कभी रूप के भीतर ही एक नया अर्थ खोजती है। कभी वह दिखाई देती है और कभी केवल महसूस की जा सकती है। कला में मुक्ति का यह अनुभव रूप और अरूप, दृश्य और अदृश्य, स्थिरता और गति के बीच लगातार घटित होता रहता है।





सौरभ मजूमदार, दीपक, अजब सिंह, सोनिया सरिन आदि के शिल्प अपने संरचनात्मक विन्यास से अधिक अंतर्गुंफित अर्थ छवियों के कारण जीवन के प्रवाह को सामने लाते हैं। कोई भी रचना शून्य से जन्म नहीं लेती। उसके पीछे कलाकार का देखा हुआ संसार, जिया हुआ समय, स्मृतियाँ, असफलताएँ, प्रश्न और पूर्ववर्ती रचनाएँ उपस्थित रहती हैं। इस अर्थ में प्रत्येक रचना अपनी पिछली रचना का विस्तार हैउसका अगला पड़ाव, उसका परिवर्तन, उसका विकास। कलाकार जब दोबारा उसी विषय की ओर लौटता है, तब भी वह वास्तव में उसी जगह नहीं लौटता। 





किसी भी रचना में कलाकार मनुष्य के आगे बढ़ने के साथ ही उसके वापस लौटने को भी दर्ज करता है। इस संदर्भ में मनोजकुमार एम. सकाले, बासु कुमार, संजीव कुमार सिन्हा, खुशबू शर्मा, जैद आदि की रचनाओं में देखा जा सकता है। समय बदल चुका होता है, देखने वाला बदल चुका होता है और स्वयं विषय भी अपने अर्थों में बदल चुका होता है। इसलिए एक ही विषय में भी अनंत संभावनाएँ जन्म लेती रहती हैं, और इस बात को इस प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं में देखा जा सकता है। डॉ. गुरुदीप नागर और अजय रावत के शिल्प, और जयंति बनर्जी, समीर मजूमदार, पारुल कुमार, पंकज निगम आदि के चित्र जीवन के प्रवाह को अपनी तरह से सामने लाते हैं।





इस तरह प्रवाहप्रदर्शनी जीवन की निरंतरता को देखने और अनुभव करने का एक अवसर सामने लाने वाली साबित होगी, इसकी पूरी संभावना है। विभिन्न माध्यमों और शैलियों में काम कर रहे कलाकारों की रचनाएँ यहाँ एक ऐसी साझा धारा में दिखाई देती हैं, जहाँ भिन्नताएँ अपनी जगह रहते हुए भी एक-दूसरे से संवाद करती हैं। एक रचना दूसरी तक पहुँचती है, एक अनुभव दूसरे अनुभव को छूता है और एक दृष्टि किसी दूसरी दृष्टि में अपना विस्तार खोजती है।





यह प्रवाह केवल कलाकृतियों के बीच नहीं है। यह कलाकार और दर्शक के बीच भी है। रचना कलाकार के भीतर से निकलकर दर्शक के अनुभव में प्रवेश करती है और वहाँ जाकर एक नए अर्थ, नई संवेदना और नए प्रश्न को जन्म देती है। इस तरह कलाकृति पूर्ण होकर भी पूर्ण नहीं होती; उसका अर्थ उसके बनने के बाद भी बहता रहता है।





आज जब निजी और सार्वजनिक जीवन, दोनों ही स्तरों पर अनेक प्रकार के विचलन, अस्थिरता और विखंडन हमारे अनुभव का हिस्सा बन चुके हैं, तब रचनात्मकता का यह प्रवाह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ठहराव और जड़ता के विरुद्ध कला का होना अपने आप में एक सक्रिय प्रतिरोध है। वह हमें याद दिलाती है कि मनुष्य केवल परिस्थितियों का परिणाम नहीं है; वह उन्हें देखने, बदलने और नए अर्थों में रचने की क्षमता भी रखता है।





प्रवाहइसलिए केवल एक समूह प्रदर्शनी नहीं, बल्कि मनुष्य के रचनात्मक अस्तित्व की एक बुनियादी अवस्था है। एक ऐसी अवस्था जो निरंतर बहती है, बदलती है, और हमेशा नये की संभावना को जिंदा रखती है। 







गुरुवार, 18 जून 2026

कला : स्मृतियों और कल्पनाओं का कोलाज

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज की एक पेंटिंग।

चाहे कोई कलाकृति अमूर्त हो या मूर्त/आकृतिमूलक, वह हमेशा स्मृतियों और कल्पना का एक कोलाज होती है। यह कलात्मक सृजन का एक मूलभूत सत्य है। कला कभी शून्य से जन्म नहीं लेती। वह जीवन के अनुभवों और रचनात्मक दृष्टि के संगम से उत्पन्न होती है, जहाँ स्मृतियाँ और कल्पना मिलकर एक नई वास्तविकता का निर्माण करती हैं। पहली दृष्टि में अमूर्त और आकृतिमूलक कला दो भिन्न संसारों की प्रतीत हो सकती हैं। आकृतिमूलक कला मनुष्य, प्रकृति, वस्तुओं और घटनाओं जैसे पहचाने जा सकने वाले रूपों को प्रस्तुत करती है। दूसरी ओर, अमूर्त कला प्रत्यक्ष चित्रण से हटकर रंगों, आकारों, बनावटों और लयों के माध्यम की अभिव्यक्ति है। इन शैलीगत भिन्नताओं के नीचे एक समान स्रोत कार्यरत रहता है। दोनों ही कलाकार के अनुभवों और उसकी कल्पनाशक्ति से निर्मित होती हैं।

स्मृति प्रत्येक कलात्मक अभिव्यक्ति की अदृश्य नींव है। हर कलाकार अपने भीतर चित्रों, भावनाओं, मुलाकातों और अनुभूतियों का एक विशाल भंडार लेकर चलता है। बचपन से लेकर कलाकार की वर्तमान अवस्था तक के दृश्यात्मक अनुभव, लोक संवाद, आनंद, पीड़ा, विस्मय और क्षति के अनुभव—ये सभी उसकी रचनात्मक चेतना का हिस्सा बन जाते हैं। कलाकार चाहे किसी विशेष घटना या स्मृति को लेकर सचेत न भी हो, फिर भी उसके रंगों, रूपों, संरचना और भावभूमि के चुनाव पर इन स्मृतियों का प्रभाव बना रहता है। 
रतन परिमू की एक रचना। 



स्मृति एक निष्पक्ष अभिलेख नहीं, बल्कि एक चयनशील कला तत्व है, जो तथ्यों से अधिक अनुभूतियों को संजोती है। यहीं कल्पना एक परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में प्रवेश करती है। वह स्मृतियों को नया रूप देती है, असंबद्ध तत्वों को जोड़ती है और उस चीज़ को आकार प्रदान करती है जो कभी वास्तविक रूप में अस्तित्व में नहीं थी। 

कल्पना के माध्यम से कोई याद किया हुआ चेहरा एक प्रतीक बन सकता है, कोई परिदृश्य रंगों की शुद्ध ऊर्जा में विलीन हो सकता है, और कोई निजी भावना सार्वभौमिक अर्थ ग्रहण कर सकती है। कल्पना स्मृति को यथार्थ की सीमाओं से मुक्त कर देती है और कला को मात्र दस्तावेज़ बनने से बचाती है। आकृतिमूलक कला में यह संबंध अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई देता है। एक चित्रित व्यक्तिचित्र किसी वास्तविक व्यक्ति से मिलता-जुलता हो सकता है, परंतु उसमें कलाकार की अनुभूति, दृष्टि और व्याख्या भी समाहित रहती है। इसी प्रकार किसी वास्तविक स्थान का चित्रण करते हुए भी कलाकार उसकी रोशनी, वातावरण और संरचना को अपने अनुभवों के अनुसार पुनर्गठित करता है। वह यथार्थ को वैसा नहीं दिखाता जैसा वह है, बल्कि जैसा वह उसे अनुभव करता है। अमूर्त कला में भी यही प्रक्रिया सक्रिय रहती है, यद्यपि उसका रूप अधिक सूक्ष्म होता है। किसी अमूर्त चित्र में पहचानने योग्य आकृतियाँ न हों, फिर भी उसके रंग, रेखाएँ और बनावटें कलाकार की स्मृतियों तथा भावनात्मक अवस्थाओं से जन्म लेती हैं। रंगों का एक प्रवाह किसी भूले-बिसरे सूर्यास्त की स्मृति जगा सकता है, ज्यामितीय रूपों का संयोजन किसी नगर की गति का संकेत दे सकता है, और सतह की बनावट उन भावनाओं को व्यक्त कर सकती है जिन्हें शब्दों में बाँधना कठिन है। 

अमूर्तता स्मृति का निषेध नहीं करती; वह उसका सार प्रस्तुत करती है। इस प्रकार कला वह स्थान बन जाती है जहाँ अतीत और संभावनाएँ एक साथ उपस्थित रहते हैं। स्मृतियाँ उसे सामग्री प्रदान करती हैं, जबकि कल्पना उसे रूपांतरण की शक्ति देती है। दोनों मिलकर ऐसी छवियाँ रचती हैं जो न पूरी तरह वास्तविक होती हैं और न पूरी तरह काल्पनिक। प्रत्येक रेखा, प्रत्येक रंग और प्रत्येक स्पर्श में स्मरण और सृजन का सम्मिलित स्वर मौजूद रहता है। यह दृष्टिकोण हमें कलाकृतियों को देखने का एक नया तरीका भी प्रदान करता है। 
गणेश पाइन की एक रचना। 



किसी रचना को केवल यथार्थवादी या अमूर्त कहकर सीमित करने के बजाय हम यह पूछ सकते हैं कि वह किन स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है और कौन-सी कल्पनात्मक संभावनाएँ हमारे सामने खोलती है। तब कलाकृति कलाकार की अंतर्यात्रा और दर्शक के अनुभवों के बीच एक संवाद का माध्यम बन जाती है। दर्शक भी अपनी स्मृतियाँ और कल्पना लेकर उस रचना के सामने आता है और इस प्रकार सृजन की प्रक्रिया को पूर्ण करता है। ऐसा करते हुए दर्शक कई बार कलाकृति को अर्थ विस्तार भी देता है। 

अंततः हर कलाकृति एक कोलाज है—तकनीकी अर्थ में नहीं, बल्कि चेतना के गहरे स्तर पर। वह अनुभवों, भावनाओं, स्मृतियों और स्वप्नों के असंख्य टुकड़ों से निर्मित होती है। चाहे वह अमूर्त हो या आकृतिमूलक, कला वह स्थल है जहाँ स्मृति अपनी अपूर्णताओं के साथ जागृत होकर नया रूप लेती है और कल्पना अपनी अनंत संभावनाओं के साथ सृजन करती है। इसी मिलन से कुछ ऐसा जन्म लेता है जो पहले कभी अस्तित्व में नहीं था—एक ऐसी कलाकृति, जो बीते हुए समय की प्रतिध्वनि भी है और आने वाली संभावनाओं का संकेत भी।

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज 


डेविड हॉकनी की पेंटिंग। 

शनिवार, 13 जून 2026

पाटनगढ़ के गोंड प्रधान और उनकी चित्रकारी


 

रजा फाउंडेशन द्वारा नई दिल्ली के इंडिया इंटर नेशनल सेंटर की गैलरी में गोंड कलाकार जो प्रधान कहलाते हैं, उनकी प्रदर्शनी का आयोजन 12 से 26 जून तक किया गया है। इस प्रदर्शनी में शामिल रचनाएँ गोंड कलम में ताजी हवा के झोंकों की तरह हैं। सदियों से एक ही तरह के विषयों पर एक जैसी शैली में काम कर रहे प्रधान कलाकारों के बीच अब जो नई पीढ़ी आ रही है वह न केवल अपनी शैली को नया रूप दे रही है बल्कि दूसरी कलाओं के साथ सांस्कृतिक संबंध भी स्थापित कर रही है। 

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज और गजेंद्र सोनी


इस प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं को देखें तो उनमें एक तरफ गोंड कला की पारंपरिक पहचान यथावत दिखाई देती है पर साथ ही सूक्ष्मता से देखने पर इस पहचान के विस्तार के संकेत भी मिलते हैं। इन रचनाओं में वैसी पुनरावृत्ति दिखाई नहीं देती, जैसी हम देखते रहै हैं।



इस प्रदर्शनी में शामिल ज्यादातर कलाकार आज भी पाटनगढ़ में ही रहकर कला कर रहे हैं। प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर इन कलाकारों का मार्गदर्शन करने वाले कलाकार गजेंद्र सोनी ने बताया कि वह इन कलाकारों को इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि वह केवल अपनी कल्पना से ही काम करें और किसी दूसरे कलाकार के काम से प्रभावित न हों। 



प्रदर्शित रचनाओं में से कुछ में अन्य लोक कलाओं से प्रेरणा ली गई दिखाई देती है। यह कोई नकल नहीं है, यह एक सांस्कृतिक संबंध है जिसमें परस्पर आदान-प्रदान संबंधों को न केवल मजबूत करता है बल्कि एक नया जीवन भी देता है। एक रचना में जिस तरह त्रिकोण के पैटर्न का डिजाइन की तरह इस्तेमाल किया गया है, फूलों की जो संरचना है और सिंह की आकृति में जो मधूबनी कला का स्पर्श है, वह नई संभावनाओं की तरफ इशारा है। हाथी गोंड कला का एक लोकप्रिय चरित्र है पर इस बार कुछ कलाकारों ने उसमें रूप के स्तर पर प्रयोग किया है। रंगों को लेकर भी नयी संभावनाएं यहां दिखाई देती हैं। 



मंगलवार, 9 जून 2026

रागिनी सिन्हाः जीवन की उड़ान

 


कला मूलतः व्यक्तिगत सृजन की प्रक्रिया होते हुए भी अपने स्वरूप में सामाजिक होती है, क्योंकि कलाकार की संवेदना, अनुभव और दृष्टि उसके सामाजिक परिवेश से निर्मित होते हैं। भारतीय समकालीन कला परिदृश्य में रागिनी सिन्हा की कला इसी तथ्य की सशक्त पुष्टि करती है। उनकी रचनात्मक यात्रा यह दर्शाती है कि किस प्रकार एक कलाकार अपने आसपास के जीवन, सामाजिक संबंधों, स्त्री-अनुभवों और सांस्कृतिक स्मृतियों को रूपकों और प्रतीकों के माध्यम से दृश्य अभिव्यक्ति प्रदान करता है। विशेषतः उनकी नवीनतम उड़ानश्रृंखला में पतंग का रूपक केवल एक दृश्य तत्व नहीं रह जाता, बल्कि वह स्वतंत्रता, आकांक्षा, असमानता, सामूहिकता और मानवीय स्वप्नों का बहुआयामी प्रतीक बनकर उभरता है।



रागिनी सिन्हा की कला की सबसे उल्लेखनीय विशेषता साधारण वस्तुओं के भीतर निहित असाधारण अर्थ-संभावनाओं की खोज है। अपने प्रारम्भिक चरण में उन्होंने कुकुरमुत्तों को केंद्र में रखकर चित्रों की रचना की। सामान्यतः उपेक्षित समझे जाने वाले इस प्राकृतिक रूप में उन्होंने सामाजिक संरचना, पारिवारिक संबंध और सामूहिक अस्तित्व का बोध देखा। बड़े और छोटे कुकुरमुत्तों के बीच उन्हें मातृत्व और संरक्षण का संबंध दिखाई देता था, जबकि समूहबद्ध संरचना सामाजिक सह-अस्तित्व का संकेत बनती थी। यहाँ प्रकृति केवल दृश्य प्रेरणा नहीं, बल्कि सामाजिक अर्थों की वाहक बन जाती है। इस प्रकार उनकी प्रारम्भिक कला में ही प्रतीकात्मकता और समाजबोध की स्पष्ट उपस्थिति दिखाई देती है।



उनकी कला-यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण चरण स्त्री-अनुभवों से जुड़ा हुआ है। बिहार के ग्रामीण और आदिवासी जीवन में स्त्रियों की स्थिति, महानगरीय जीवन में महिलाओं के समक्ष उपस्थित चुनौतियाँ तथा सामाजिक संरचना में उनकी भूमिका ने उनकी कलाभाषा को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने स्त्री को केवल पीड़ित अस्तित्व के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसकी आंतरिक शक्ति, संवेदनशीलता, सौंदर्य और सृजनात्मक ऊर्जा को भी रेखांकित किया। फूल, पक्षी और प्राकृतिक रूप उनके यहाँ स्त्री-अस्मिता के प्रतीक बनकर उपस्थित होते हैं। यह दृष्टि स्त्रीवादी कला-विमर्श के उस पक्ष से जुड़ती है जो स्त्री को केवल संघर्ष के फ्रेम में सीमित न करके उसकी स्वतंत्र चेतना और रचनात्मकता को भी महत्व देता है। इन चित्रों में अनेक स्थानों पर महानगरीय संरचनाओं की उपस्थिति भी दिखाई देती है, जो समकालीन जीवन के जटिल यथार्थ को उद्घाटित करती है।



समय के साथ रागिनी सिन्हा की कलाभाषा अधिक बहुस्तरीय और प्रतीकात्मक होती गई। उनकी नवीनतम उड़ानश्रृंखला इसी विकास का परिणाम है। पतंग यहाँ केवल एक खेल या लोक-सांस्कृतिक वस्तु नहीं, बल्कि मानवीय आकांक्षा और स्वतंत्रता का रूपक बन जाती है। आकाश में उड़ती पतंग मनुष्य की उस मानसिक अवस्था का संकेत देती है, जहाँ वह सीमाओं से मुक्त होकर कल्पना और स्वप्न के संसार में प्रवेश करना चाहता है। किंतु यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है; पतंग की डोर उसे नियंत्रित भी करती है। यही द्वंद्वस्वतंत्रता और नियंत्रण, आकांक्षा और यथार्थरागिनी की कला को गहन दार्शनिक अर्थ प्रदान करता है। स्वयं कलाकार बताती हैं कि बचपन में वे पतंग उड़ाया करती थीं, जबकि उस समय पतंग उड़ाना मुख्यतः लड़कों का खेल माना जाता था। इस प्रकार पतंग और अन्य खेलों में उनकी भागीदारी बचपन से ही लैंगिक विभाजन के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक प्रतिरोध के रूप में देखी जा सकती है।



उनकी नवीनतम रचनाओं में बच्चों की उपस्थिति विशेष महत्व रखती है। कहीं बच्चे पतंग उड़ाते हुए दिखाई देते हैं, कहीं कट चुकी पतंग को पकड़ने की आकांक्षा में दौड़ते हुए, तो कहीं उसे खो देने की निराशा में। ये दृश्य केवल बाल-मन की सहज अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि समकालीन सामाजिक संरचना का रूपक भी हैं। यहाँ आशा और निराशा साथ-साथ उपस्थित हैं; कुछ के पास अवसर हैं, जबकि कुछ लगातार वंचना का अनुभव करते हैं। इस दृष्टि से उनकी कला समाजशास्त्रीय और राजनीतिक अर्थों से भी समृद्ध हो जाती है। भारतीय कला आलोचना में प्रायः दृश्य-सौंदर्य पर अधिक बल दिया जाता रहा है, किंतु रागिनी सिन्हा की कला यह संकेत करती है कि समकालीन चित्रकला को सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं और सांस्कृतिक असमानताओं के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।



तकनीकी स्तर पर भी उनकी कला अत्यंत महत्वपूर्ण है। कला महाविद्यालय के दिनों में उन्होंने ग्राफिक आर्ट और प्रिंटमेकिंग का अध्ययन उस समय चुना, जब इस क्षेत्र में बहुत कम महिलाएँ सक्रिय थीं। इस प्रशिक्षण ने उनकी चित्रकला को विशिष्ट दृश्य-गुण प्रदान किए। उनकी पेंटिंग्स की सतह पर दिखाई देने वाली बहुस्तरीय बनावट, स्पर्शात्मक गहराई और संरचनात्मक संतुलन उनके प्रिंटमेकिंग अनुभव का परिणाम है। नई दिल्ली आने के बाद भले ही वे प्रिंटमेकिंग से दूर हुईं, परंतु उसकी तकनीकी संवेदनशीलता उनकी चित्रभाषा में लगातार उपस्थित रही। राइस पेपर, कटआउट, परतों और मिश्रित माध्यमों का प्रयोग उनकी कला को समकालीन प्रयोगधर्मिता से जोड़ता है।



उनकी रंग-योजना में प्रायः चटख रंगों का प्रयोग दिखाई देता है। प्रारम्भिक रचनाओं में नीले, हरे, पीले और लाल रंगों की प्रधानता थी, जो समय के साथ अपेक्षाकृत शांत और मद्धिम रंगों में रूपांतरित होती गई। उनकी नवीनतम कृतियों में हल्के सुनहरे रंग का प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कैनवास पर राइस पेपर चिपकाकर कार्य करने से यह रंग-संरचना और अधिक प्रभावी हो उठती है। यद्यपि रंगों की यह प्रवृत्ति परिवर्तित हुई है, फिर भी लाल रंग के प्रति उनका विशेष आकर्षण बना हुआ है। स्वयं कलाकार स्वीकार करती हैं कि लाल रंग उन्हें अत्यंत प्रिय है।



उनकी नवीनतम कृतियों में टिकुली कला के तत्वों का प्रयोग विशेष उल्लेखनीय है। यह प्रयोग केवल लोककला के सजावटी रूपों का उपयोग नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास है। बिहार की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़ते हुए वे उसे आधुनिक दृश्य-भाषा में रूपांतरित करती हैं। इस प्रकार उनकी कला न तो परंपरा की यांत्रिक पुनरावृत्ति है और न ही आधुनिकता की अंधानुकरणात्मक अभिव्यक्ति; बल्कि यह दोनों के बीच एक सृजनात्मक सामंजस्य स्थापित करती है। टिकुली कला से प्रेरित प्रतीकों के साथ-साथ उनकी रचनाओं में लेखन का प्रयोग भी एक नया आयाम प्रस्तुत करता है। वे अपनी पेंटिंग्स में ‘udan’ अथवा उड़ानशब्द को इस प्रकार अंकित करती हैं कि वह किसी मंत्र-जाप की लयात्मक पुनरावृत्ति जैसा प्रतीत होता है। यह लेखन न केवल उनकी रचनाओं को अतिरिक्त अर्थवत्ता प्रदान करता है, बल्कि उन्हें विशिष्ट दृश्य-सौंदर्य भी देता है।



रागिनी सिन्हा की कला का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसकी मानवीय संवेदना है। उनकी अमूर्त प्रतीत होने वाली संरचनाओं में भी मनुष्य और उसका भावलोक केंद्र में उपस्थित रहता है। वे साधारण वस्तुओंकुकुरमुत्ते, पतंग, फूल या पक्षियोंको ऐसे प्रतीकों में रूपांतरित करती हैं जो व्यापक सामाजिक अनुभवों को व्यक्त करने में सक्षम हैं। यही कारण है कि उनकी कला केवल दृश्य आनंद का माध्यम नहीं रह जाती, बल्कि वह समकालीन समाज, स्त्री-अस्मिता, स्वतंत्रता, आकांक्षा और सांस्कृतिक स्मृति पर गंभीर चिंतन का अवसर प्रदान करती है।



इस प्रकार रागिनी सिन्हा की कला भारतीय समकालीन चित्रकला में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखी जा सकती है। उनकी रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि कला का वास्तविक सौंदर्य केवल उसके रूप में नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक संवेदना, प्रतीकात्मक गहराई और मानवीय अनुभवों की व्यापकता में निहित होता है।


- डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज

शनिवार, 30 मई 2026

जेएमडब्ल्यू टर्नर JMW Turner: यथार्थ का दृश्यात्मक प्रभाव




जोसेफ मैलॉर्ड विलियम टर्नर (1775-1851)  की ख्याति ऐसे कलाकार के रूप में रही है जिन्होंने जल के शांत और उद्विग्न प्रवाह, हवा की मंथर व तीव्र गति के साथ ही विस्तृत परिदृश्य अवलोकन में आकाश और पृथ्वी की परिवर्तित रूपाकार स्थिति और विभिन्न संरचनाओं पर वातावरण के प्रभाव को रचा। उनके परिदृश्य चित्र, जिनमें जड़ और चेतन, दोनों की उपस्थिति रही है, स्थिर होते हुए भी गति का प्रभाव उत्पन्न करते हैं। लगभग अमूर्त की तरह दिखाई देने वाली उनकी रचनाओं में यथार्थ की गहन छवि के दृश्यात्मक प्रभाव की गहरी खोज दिखाई देती है। टर्नर को उनके तैल चित्रों के लिए जाना जाता है परंतु उनमें भी उन चित्रों का अत्यधिक महत्व है जिनमें तैल रंग को उन्होंने जल रंग जैसे प्रभाव के साथ इस्तेमाल किया है। भूदृश्य चित्रण में यह उनकी अलग पहल थी जिसे उनके जलरंग प्रेम ने नया आयाम दिया।


 

टर्नर ने अपनी कला यात्रा की शुरुआत में इंग्लैंड के भूदृश्यों, विशेषरूप से ऐतिहासिक स्थलों, भवन संरचनाओं पर केंद्रित चित्र रचने पर अधिक ध्यान दिया। 29 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी खुद की आर्ट गैलरी स्थापित कर ली थी। टर्नर की कला शुरु में मानव रचित संरचनाओं, वास्तुकला आदि पर केंद्रित रही पर जल्दी ही उन्होंने यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि मनुष्य के जीवन में प्रकृति सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसीलिए उन्होंने प्रकृति की शक्ति और उसके रहस्य को अपनी रचनाओं में खोजना शुरु किया। रोशनी, आग, पानी की शांत व चंचल लहरें, वायु के शीतल व तीब्र झोंके, कोहरा, तूफान आदि उनकी कला के विषय बन गये। वह मानते थे कि प्रकृति दिव्य भी है और भयानक भी। शुरु में वह बारीक से बारीक विवरण पर ध्यान देते थे पर धीरे-धीरे उन्होंने सूक्ष्म विवरणों की जगह वातावरण के चरित्र में अधिक दिलचस्पी दिखानी शुरु की। इससे उनकी रचनाओं में अमूर्तन जैसा प्रभाव मुख्य होता चला गया। वह चित्र में रौशनी के विभिन्न प्रभावों और चटख रंगों को अधिक महत्व देने लगे।



हम जिस दुनिया में रहते हैं, वह बहुअयामी है। इसके सभी आयामों को देख और समझ पाना अभी भी मनुष्य के लिए एक चुनौती है। एक ही वस्तु या दृश्य को लेकर मानवीय अनुभूतियों और अभिव्यक्ति में विविधता यह प्रमाणित करती है कि इस संसार को, और उसमें मानव जीवन को समग्रता में एक रेखीय परिप्रेक्ष्य में समझना असम्भव है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि कला की दुनिया में एक ही दृश्य को, एक ही स्थिति को कलाकारों ने अलग अलग तरह से अभिव्यक्त किया है। समुद्र या नदी का कोई दृश्य एक कलाकार के लिए अलग है तो दूसरे के लिए अलग। कलाकार की अपनी दृष्टि, अपने अनुभव उसकी रचना की दिशा और दशा तय करते हैं। जेएमडबल्यू टर्नर की कला में भी हमें यह देखने को मिलता है। वास्तुशास्त्रीय संरचनाओं से शुरुआत करते समय वह देखे हुए प्रत्यक्ष अनुभव के संरचनात्मक रूप तक सीमित थे। इस सीमित रूप में उन्होंने जीवन को रेखांकित किया। पर बाद में उनकी कला दृष्टि रूप से अरुप की तरफ चली गई। जो दिखाई दे रहा है से अधिक वह जो दिखाई नहीं दे रहा है, वायु, प्रकाश का प्रभाव, जल का अस्थिर चरित्र, परिप्रेक्ष्य के अनुसार पदार्थ जगत का बदलता रूप, और उसके बदलते प्रभाव को उन्होंने आत्मसात किया। 



एक नई खोज यहाँ से शुरू हुई जिसमें वह यथार्थ के जड़ रूप की जगह चेतन रूप को देखने और दिखाने लगे। इस चेतन रूप में मनुष्य पूरी तरह अनुपस्थित नहीं हुआ। बहुसंख्यक रचनाओं में वह हमें संघर्ष करता दिखाई देता है, कभी नाविक के रूप में तो कभी यात्री के रूप में, तट पर इंतजार करते, कुछ खोजते से प्रतीत होते मानव आकार। यह आकार टर्नर की चित्र भाषा में परिदृश्य का, वातावरण का हिस्सा बन जाते हैं, उसमें घुलते प्रतीत होते हैं। यहाँ मानवीय संघर्ष और सपने प्रकृति के संघर्ष के साथ एक हो जाते हैं। शांत और तीव्र हवा हो या पानी का भाव, कोहरा हो या धुंधला होता जाता कोई रूप, यह सब टर्नर के काम को उस समय के भौतिक जगत से जोड़ता है। उनके समय में औद्योगिक क्रांति के कारण उपजे सामाजिक और सांस्कृतिक संकटों का कोई कथात्मक चित्र नहीं है। पर जो है, वह यथार्थ से अलग नहीं है। उनकी रचनाओं में दूर से आती प्रकाश की किरण, पानी पर उसकी झिलमिलाती छवि, सूर्य की उपस्थिति, दूर से आते, हिचकोले खाते जहाज यह सब उस समय के यथार्थ के कुछ आयामों की तरफ संकेत करते हैं।



चालीस वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते, टर्नर ने खुद को एक ऐसे कलाकार के रूप में स्थापित कर लिया था जो नव-शास्त्रीय शैली के उस्ताद होने के साथ-साथ नए रोमांटिक आंदोलन के एक प्रमुख प्रतिनिधि भी थेपरिदृश्यों, समुद्री दृश्यों, रूपकात्मक और ऐतिहासिक दृश्यों के एक शानदार चित्रकार। 1819 में, टर्नर ने वेनिस की अपनी कई यात्राओं में से एक के दौरान, जलरंग चित्रों की एक ऐसी श्रृंखला पर काम किया जिसने उनकी कला पर दूरगामी प्रभाव डाला। इस चित्र श्रृंखला के रचने के दौरान उन्हें अहसास हुआ कि जलरंग जैसा प्रभाव तैलरंग में भी प्राप्त किया जा सकता है।


कला इतिहासकारों के अनुसार टर्नर ने तैलरंग में जलरंग वाले प्रभाव को अर्जित तो कर लिया था परंतु कला प्रेमी उसे स्वीकार करेंगे या नहीं, इसे लेकर वह दुविधा में थे। परिणाम यह हुआ कि उन्होंने अपने जलरंग चित्रों सहित बाद के चित्रों की रॉयल एकेजमी में प्रदर्शनी लगाना बंद कर दिया था। इसका उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ा।


185
1 में अपनी मृत्यु से पहले ही टर्रनर ने अपनी करीब 300 पेंटिंग्स और दो हजार से अधिक जलरंग चित्र व रेखांकन राष्ट्र को समर्पित कर दिये और अपनी निजी संपत्ति जो उस समय करीब 80 हजार पाउंट थी, निर्धन व युवा कलाकारों की सहायता के लिए दान कर दी थी। 



-डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

-सभी चित्र इंटरनेट से साभार लिये गये हैं और केवल संदर्भ के लिए प्रयोग किये गये हैं।