प्रदर्शनी विचारः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
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| वरिष्ठ कलाकार अनवर और सेरामिक कलाकार सीरज सक्सेना के साथ डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज |
खुर्जा द क्ले स्पेस शीर्षक से सेरामिक कलाकारों की एक समूह प्रदर्शनी 11 से 17 मार्च 2026 तक नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एनेक्सी गैलरी
में आयोजित की गई है। खुर्जा उत्तर प्रदेश का वह शहर है जो लंबे समय से पॉटरी और
सिरेमिक शिल्प के लिए प्रसिद्ध रहा है। सीरज सक्सेना ने वहां अपना एक स्टूडियो
स्थापित किया है, जहाँ कलाकारों के साथ मिलकर सिरेमिक में विभिन्न प्रयोग करते हैं।
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| सीरज सक्सेना की रचनाएं |
इस प्रदर्शनी की एक विशेषता यह भी है कि कुछ कलाकारों ने ऐसे शिल्प रचे हैं
जिनके रूप पारंपरिक पॉटरी से मेल खाते प्रतीत होते हैं, परंतु उनका उद्देश्य उपयोगितावादी वस्तु बनाना नहीं
है। वे मूलतः मूर्तिकला हैं—ऐसी कृतियाँ जो पॉटरी की परिचित संरचनाओं को एक नए कलात्मक अर्थ में रूपांतरित
करती हैं। शायद यही इस प्रदर्शनी की सबसे सुंदर और महत्वपूर्ण विशेषता है, जहाँ पारंपरिक शिल्प और
समकालीन कला एक-दूसरे से संवाद करते हुए दिखाई देते हैं।
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| संजय सावंत की एक रचना |
इस प्रदर्शनी में अनुजा पंजवानी मिन्हास, जया रावल, मिलन करमाकर, रितिका आनंद,
संजय सामंत, सीरज सक्सेना, सूरज गोराई, और जहीर अहमद के काम प्रदर्शित किये गये
हैं। प्रदर्शनी का नेतृत्व सीरज सक्सेना कर रहे हैं। यह सभी कलाकार मुख्यतः
सिरेमिक माध्यम में काम कर रहे हैं और इनका काम किसी न किसी रूप में खुर्जा से जुड़ा हुआ है।
इनमें से कई कलाकार वहीं रहकर काम करते हैं, जबकि कुछ कलाकार समय-समय पर खुर्जा जाकर वहाँ के
स्टूडियो और पारंपरिक पॉटर्स के साथ मिलकर अपनी कृतियाँ तैयार करते हैं।
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| जया रावल का सेरामिक शिल्प |
कला की दुनिया में परिवर्तन सामान्यतः बहुत तीव्र गति से नहीं होते। किसी भी
नई प्रवृत्ति या माध्यम को स्वीकार किए जाने में समय लगता है, और वह धीरे-धीरे एक लंबी
प्रक्रिया के बाद सामने आती है। सिरेमिक कला के संदर्भ में भी कुछ ऐसा ही हुआ। लंबे
समय तक सिरेमिक को मुख्यतः पॉटरी के रूप में ही देखा जाता रहा। कलाकारों ने
सिरेमिक प्लेटों या पात्रों पर चित्रांकन अवश्य किया, किंतु यह विचार कि सिरेमिक एक स्वतंत्र मूर्तिकला
माध्यम भी हो सकता है, कला-जगत में बहुत बाद में गंभीरता से उभरा।
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| जहीर अहमद की रचनाएं |
हालाँकि टेराकोटा में मूर्तिकला के उदाहरण पहले से मिलते हैं, फिर भी भारत में सिरेमिक को
लंबे समय तक उपयोगितावादी पॉटरी की परंपरा से ही जोड़ा जाता रहा। इस धारणा को
बदलने की दिशा में कुछ कलाकारों ने महत्वपूर्ण प्रयोग किए। उदाहरण के लिए ज्योत्सना
भट्ट और पीआर दरोज जैसे कलाकारों के काम को देख सकते हैं
जिन्होंने सिरेमिक के साथ ऐसे रचनात्मक प्रयोग किए जिनसे इस माध्यम की संभावनाएँ
सामने आईं। पीआर दरोज ने सिरेमिक में ऐसे कार्य प्रस्तुत किए जिन्होंने पॉटरी की पारंपरिक अवधारणा
को तोड़ते हुए इसे एक स्वतंत्र कलात्मक माध्यम के रूप में स्थापित करने का प्रयास
किया। उनके प्रयोगों ने बाद की पीढ़ी के कलाकारों को नए रूपों और संरचनाओं की खोज
के लिए प्रेरित किया।
इसी परंपरा में सीरज सक्सेना का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने न केवल
सिरेमिक में नए प्रयोग किए, बल्कि अन्य कलाकारों को भी इस माध्यम में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया।
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| मिलन करमाकर की रचनाएं |
इस प्रदर्शनी को केवल सिरेमिक की प्रदर्शनी कहना पर्याप्त नहीं होगा। अधिक
उचित यह है कि इसे मूर्तिकला की प्रदर्शनी के रूप में देखा जाए, जिसमें कलाकारों ने सिरेमिक
माध्यम में विविध शिल्प रचे हैं। प्रदर्शनी में कुछ कार्य ऐसे हैं जिनमें पॉटरी की
झलक अवश्य दिखाई देती है, किंतु वे पारंपरिक पॉटरी की सीमाओं से आगे जाते हैं। इसके अतिरिक्त बड़ी
संख्या में ऐसे कार्य भी हैं जो पूर्णतः त्रि-आयामी रूपों में निर्मित हैं। कुछ
कृतियाँ ऐसी भी हैं जिन्हें दीवारों पर टाँगा जा सकता है, जिससे सिरेमिक माध्यम की अभिव्यक्ति केवल
उपयोगितावादी वस्तुओं तक सीमित न रहकर समकालीन मूर्तिकला और इंस्टॉलेशन की दिशा
में विस्तृत होती दिखाई देती है।
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| अनुजा पंजवानी मिन्हास की रचनाएं |
सीरज सक्सेना वैसे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने सिरेमिक म्यूरल्स के लिए
जाने जाते हैं। उन्होंने भारत के अलावा कई अन्य देशों में भी बड़े पैमाने पर
सिरेमिक म्यूरल्स का निर्माण किया है, जिनमें इस माध्यम की संरचनात्मक संभावनाएँ और दृश्य प्रभाव
दोनों ही स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उनके ये म्यूरल्स सिरेमिक को केवल पॉटरी
या छोटे आकार की कलाकृतियों तक सीमित नहीं रहने देते, बल्कि इसे वास्तुशिल्पीय और सार्वजनिक कला के
व्यापक संदर्भ में स्थापित करते हैं। इस प्रदर्शनी में भी उनके कुछ ऐसे ही कार्य
शामिल हैं, जिनमें सिरेमिक के
बड़े और बहुस्तरीय रूपों के माध्यम से एक विशिष्ट दृश्य प्रभाव निर्मित होता है।
इन कृतियों में रूप, बनावट और सतह के साथ किए गए प्रयोग सिरेमिक को एक स्वतंत्र मूर्तिकला माध्यम
के रूप में देखने की संभावना को और अधिक सशक्त बनाते हैं।
अनुजा पंजवानी मिन्हास के कामों में से कुछ में मूल संरचना पारम्परिक पॉटरी की
है जिसे वह कैनवास की तरह इस्तेमाल करती हैं।
संजय सामंत पारम्परिक पॉटरी को अलग तरह से फर्श और दीवार पर संयोजित करते हुए उनका विस्तार करते हैं। मिलन करमाकर प्रतिमाओं के साथ ही प्लेट्स बनाते हैं जिनपर चित्रकारी करते हैं। रितिका आनंद की रचनाओं में भूदृश्य के साथ ही प्राकृतिक संरचनाएं और जीवन प्रक्रिया का आरम्भ अंकुरण मुख्य विषय है। सूरज गोराई पॉटरी की संरचनाओं को आधार बनाते हुए उन्हें शिल्प में बदल कर कला प्रेमियों को अलग अनुभव संसार में ले जाते हैं।
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| सूरज गोराई की रचनाएं |
इस प्रदर्शनी में शामिल जया रावल के काम पूरी तरह शिल्प
कहे जा सकते हैं जिनकी रचना सेरामिक माध्यम में की गई है। जया ने पहले भोपाल में
काम किया है पर इन दिनों मुंबई में रहती हैं और सेरामिक में काम करने के लिए
खुर्जा जाती हैं। ज़हीर अहमद परम्परागत पॉटर हैं जो अपने कामों में हमेशा कुछ नए
प्रयोग करते रहते हैं। इस प्रदर्शनी में शामिल उनके कामों में खिलौनों जैसी
संरचनाएं हैं पर उन्हें वह सजावटी वस्तुओं के दायरे से आगे ले जाते हुए कलात्मक
बना देते हैं।
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| रितिका आनंद की रचनाएं |






























