गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

असित कुमार पटनायक की दिल्ली में प्रदर्शनी

असित कुमार पटनायक अपनी प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर कलाकार व लेखक डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज, राम ओंकार, रमेश नायर, जस्टिन कोंचिरा व अन्य लोगों के साथ। 


असित कुमार पटनायक की कला की पहचान मुख्यतः मानव आकृतियों और विशेषकर स्त्री-पुरुष के बीच मौजूद भावनात्मक संबंधों के चित्रण से होती है। पहली दृष्टि में उनके चित्र पारंपरिक फिगरेटिव कला की परिचित दुनिया का हिस्सा दिखाई देते हैं—अंतरंग आकृतियाँ, संकेतपूर्ण मुद्राएँ और सावधानी से संयोजित रंग। लेकिन उनकी कला को केवल इसी आधार पर देखना उनके कलात्मक विकास की जटिलता को सीमित करना होगा। आकृतियों की सतही सरलता के पीछे ड्रॉइंग, अमूर्तन, टेक्सचर, लैंडस्केप, स्मृति और मानवीय संबंधों की मनोवैज्ञानिक अस्पष्टता के प्रति एक दीर्घकालिक रुचि दिखाई देती है। उनकी तीन दशक लंबी कलायात्रा का एक प्रतिनिधि रूप इन दिनों नई दिल्ली के बीकानेर हाउस स्थित एलटीसी गैलरी में देखने को मिल रहा है। चावल आर्ट गैलरी द्वारा आयोजित यह विहंगावलोकन प्रदर्शनी उनके विविध कलात्मक प्रयोगों को समझने का अवसर देती है।



पटनायक की कलायात्रा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि वह आधुनिक भारतीय कला में प्रचलित सामान्य दिशा का अनुसरण नहीं करती। जहाँ अनेक कलाकार फिगरेटिव कला से शुरू होकर धीरे-धीरे अमूर्तन की ओर जाते हैं, वहीं पटनायक की यात्रा लगभग उलटी रही। बीएफए के दिनों में उन्होंने अमूर्त संरचनाओं, टेक्सचर, इम्पास्टो और मिश्रित माध्यमों के साथ व्यापक प्रयोग किए। उनकी शुरुआती कृतियों में कैनवास की भौतिक सतह के प्रति गहरी जिज्ञासा दिखाई देती है। बाद में मानव आकृति उनके काम का केंद्र बनी, लेकिन सतह और टेक्सचर में उनकी रुचि कभी समाप्त नहीं हुई।



उनकी परिपक्व कृतियों में पृष्ठभूमि केवल सजावटी स्थान नहीं होती। उसमें मौजूद रेखाएँ, टेक्सचर और सतही संरचनाएँ उनके शुरुआती अमूर्त प्रयोगों की निरंतरता हैं। आकृति रचना के केंद्र में होते हुए भी उसके आसपास अमूर्तन सक्रिय रहता है और एक मनोवैज्ञानिक वातावरण निर्मित करता है। यह बात उस बड़े अमूर्त चित्र में विशेष रूप से दिखाई देती है, जो कैनवास तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान लगभग अनायास विकसित हुआ। सतह पर काम करते हुए पटनायक को एक ऐसी संरचना दिखाई दी जो उन्हें अपने आप में पूर्ण लगी। उन्होंने उसे फिगरेटिव चित्र में बदलने के बजाय अमूर्त रूप में ही रहने दिया। यह कृति बताती है कि अमूर्तन उनके अभ्यास से कभी पूरी तरह अनुपस्थित नहीं हुआ, भले ही बाद में वह उनकी कला का प्रमुख विषय न रहा हो।


उनकी ड्रॉइंग में भी इसी निरंतरता को देखा जा सकता है। बनारस में बिताए समय के दौरान उन्होंने घाटों, स्थानीय लोगों और रोजमर्रा के जीवन के अनेक चित्र बनाए। ये केवल दृश्य-अवलोकन के अभ्यास नहीं थे, बल्कि रेखा को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में समझने की प्रक्रिया का हिस्सा थे। पटनायक के लिए ड्रॉइंग अनुशासन और खोज का माध्यम होने के साथ-साथ एक स्वतंत्र कला-विधा भी है।

यह अनुभव उनके बाद के चित्रों में शरीर की अभिव्यक्तिगत क्षमता के रूप में सामने आता है। उनकी आकृतियाँ सामान्यतः शारीरिक रूप से विकृत नहीं होतीं; उनमें भावनात्मक तनाव मुख्यतः मुद्रा, हावभाव और स्थानिक संबंधों से पैदा होता है। सिर का हल्का झुकाव, हाथ की स्थिति, दो शरीरों के बीच की दूरी या किसी आकृति की दृष्टि की दिशा पूरे चित्र का मनोवैज्ञानिक वातावरण बदल सकती है। इसीलिए उनकी कला का प्रत्यक्ष विषय भले ही मानवीय संबंध हों, उसका गहरा विषय उन संबंधों के भीतर सक्रिय मनोविज्ञान है।



पटनायक के स्त्री-पुरुष अक्सर परस्पर विरोधी भावनात्मक अवस्थाओं के बीच दिखाई देते हैं। प्रेम के साथ आशंका, आकर्षण के साथ संकोच और निकटता के साथ दूरी मौजूद हो सकती है। दो आकृतियाँ शारीरिक रूप से करीब होने के बावजूद मानसिक स्तर पर एक-दूसरे से दूर या अनिश्चित दिखाई दे सकती हैं। यही तनाव उनके चित्रों को रोमांटिक संबंधों के सीधे चित्रण तक सीमित नहीं होने देता।



लाल रंग का प्रयोग इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। अनेक चित्रों में वह प्रेम, जीवन-ऊर्जा और भावनात्मक तीव्रता का संकेत बनता है। लेकिन रंग उनके यहाँ केवल प्रतीक नहीं हैं। रंगों का सामंजस्य और उनके बीच के विरोध मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जिसमें भावनाएँ मानो फैलती हुई प्रतीत होती हैं। एक्रिलिक रंगों की पारदर्शिता और कोमलता चित्रों में नाजुकता पैदा करती है, जबकि तीखे रंग भावनात्मक दबाव और नाटकीयता को बढ़ाते हैं।

बनारस में रहने के दौरान के अनुभवों ने असित की कला को एक आयाम दिया है।


उनके अर्ध-वस्त्रधारी स्त्री-पुरुषों को भी इसी दृष्टि से देखना चाहिए। इन चित्रों को केवल कामुक या इरॉटिक रचनाओं के रूप में देखना उनके अर्थ को सीमित कर देगा। यहाँ शारीरिक अनावृत्ति से अधिक महत्त्व भावनात्मक अनावृत्ति का है। असुरक्षा, निर्भरता, आकर्षण और अनिश्चितता शरीर की दृश्य उपस्थिति से आगे जाकर अर्थ ग्रहण करते हैं। इस तरह शरीर स्वयं एक मनोवैज्ञानिक भू-दृश्य बन जाता है।


इन संबंधों में शक्ति-संतुलन का सूक्ष्म उलटाव भी दिखाई देता है। पटनायक के चित्रों में पुरुष हमेशा प्रभावशाली या प्रभुत्वशाली स्थिति में नहीं होता। कई रचनाओं में वह भावनात्मक रूप से समर्पित या असुरक्षित दिखाई देता है, जबकि स्त्री अधिक दृढ़ मनोवैज्ञानिक स्थिति में होती है। यहाँ किसी स्थायी लैंगिक सत्ता-क्रम को स्थापित करने के बजाय अंतरंग संबंधों के भीतर शक्ति की धारणाओं पर प्रश्न उठता है।


बार-बार दिखाई देने वाली गोलाकार, मुलायम और भरे हुए शरीरों की संरचना इस जटिलता को और बढ़ाती है। ये आकृतियाँ आधुनिकतावादी कला के कठोर, कोणीय और वीरतापूर्ण शरीर-आदर्श से अलग हैं। इनमें गर्माहट और असुरक्षा है। वे स्मारकीय शरीर नहीं, बल्कि संवेदनशील और जीवंत देहें हैं। उनकी शारीरिक कोमलता ही भावनात्मक जटिलता व्यक्त करने का माध्यम बनती है।

शुरुआती दौर के कुछ काम

पटनायक की कला की एक बड़ी ताकत यह है कि वह अपने अर्थों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं करती। उनके चित्र किसी संपूर्ण कथा के बजाय एक परिस्थिति निर्मित करते हैं। दर्शक समझ सकता है कि दो लोग किसी भावनात्मक संबंध में हैं, लेकिन उस संबंध का वास्तविक स्वरूप निश्चित नहीं होता। वह प्रेम, आकर्षण, निर्भरता, चिंता, मेल-मिलाप या बिछड़ाव कुछ भी हो सकता है। चित्र दर्शक को किसी एक अर्थ तक सीमित नहीं करता।


आज के दृश्य-संसार में, जहाँ छवियों से तत्काल और स्पष्ट संदेश देने की अपेक्षा की जाती है, यह खुलापन विशेष महत्त्व रखता है। पटनायक के चित्रों को देखने के लिए समय चाहिए। उनका अर्थ किसी एक संदेश से नहीं, बल्कि आकृति, रंग, टेक्सचर और संरचना के पारस्परिक संबंधों से धीरे-धीरे निर्मित होता है।

बनारस 

फिर भी उनकी कला की आलोचनात्मक समीक्षा करते समय एक संभावित सीमा को स्वीकार करना आवश्यक है। यदि स्त्री-पुरुष संबंध लगातार केंद्रीय विषय बने रहें, तो भावनात्मक भाषा के परिचित हो जाने और शैली के दोहराव में बदलने का खतरा रहता है। अंतरंग आकृतियाँ, प्रेम का तनाव और नियंत्रित संवेदनशीलता यदि कमजोर रचनाओं में बार-बार दोहराई जाएँ, तो कला सूत्रबद्ध लग सकती है। इस संदर्भ में अमूर्तन, प्रिंटमेकिंग, टेक्सचर और संरचना में उनके प्रयोग महज शैलीगत बदलाव नहीं, बल्कि अपने स्थापित दृश्य-व्याकरण की सीमाओं को परखने के प्रयास भी हैं।

असित कुमार के रिलीफ वर्क

प्रिंटमेकिंग की ओर उनकी वापसी विशेष रूप से दिलचस्प है। यह माध्यम कलाकार और अंतिम छवि के बीच एक अलग संबंध स्थापित करता है। चित्रकला में कलाकार सतह को लगातार बदल सकता है, जबकि प्रिंटमेकिंग में तकनीकी प्रक्रिया और अंतिम छाप के बीच एक दूरी बनी रहती है। इस माध्यम में लौटना संकेत देता है कि पटनायक अपनी स्थापित कलात्मक आदतों को चुनौती देने में अब भी रुचि रखते हैं।


उनके व्यापक दृश्य-संसार पर भी ध्यान देना चाहिए। बनारस के घाट, ओडिशा के गाँव, भैंस, बैल, गाय और घोड़े, लैंडस्केप, वॉटरकलर तथा ड्रॉइंग उनके अभ्यास के दूसरे महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। ये विषय बताते हैं कि उनकी कल्पना केवल मानवीय अंतरंगता तक सीमित नहीं है। इनके माध्यम से गति, वातावरण, ग्रामीण जीवन, स्मृति और स्थान को समझने के नए रास्ते खुलते हैं।

फिर भी उनकी विविध कलात्मक गतिविधियों के बीच मानव आकृति सबसे सुसंगत धागे के रूप में सामने आती है। रेखा और टेक्सचर के शुरुआती प्रयोगों से लेकर भावनात्मक रूप से उलझी आकृतियों वाले बाद के चित्रों तक, पटनायक लगातार इस प्रश्न से जूझते दिखाई देते हैं कि बाहरी रूप के माध्यम से आंतरिक अवस्था को किस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है।

इसलिए उनकी उपलब्धि केवल प्रेम को चित्रित करने में नहीं है। उनकी वास्तविक दिलचस्पी शायद इस बात में है कि प्रेम स्वयं एक अस्थिर मनोवैज्ञानिक क्षेत्र है, जहाँ खुशी और चिंता, आकर्षण और समर्पण, कोमलता और संघर्ष एक साथ मौजूद हो सकते हैं। उनके चित्र सबसे प्रभावशाली तब लगते हैं, जब वे इस अस्पष्टता को बनाए रखते हैं। वे यह नहीं बताते कि आकृतियाँ वास्तव में क्या महसूस कर रही हैं, बल्कि ऐसी दृश्य परिस्थिति निर्मित करते हैं जिसमें भावना लगभग स्पर्शनीय हो जाती है। टेक्सचर, रंगों की कोमलता, शरीर की मुद्रा और दो दृष्टियों के बीच का मौन मिलकर ऐसी भावनात्मक भाषा बनाते हैं, जो यथार्थवादी चित्रण और अमूर्तन के बीच स्थित है।

तीन दशकों की कलायात्रा में आकृति और अमूर्तन के बीच बना यह तनाव किसी एक शैलीगत पहचान से अधिक महत्त्वपूर्ण है। आकृति उनके चित्रों को पहचान देती है, जबकि अमूर्तन, टेक्सचर और ड्रॉइंग उस पहचान को स्थिर होने से रोकते हैं। एक परिपक्व कलाकार के लिए चुनौती अपनी भाषा को खुला रखना और नए माध्यमों, विषयों तथा संरचनाओं को उसमें प्रवेश करने देना है। पटनायक के हालिया प्रयोग संकेत देते हैं कि यह प्रक्रिया अभी जारी है।

असित कुमार पटनायक की कला हमें चित्रित आकृतियों की स्पष्ट अंतरंगता से आगे देखने के लिए प्रेरित करती है। पहली नजर में दो लोगों का चित्र दिखाई दे सकता है, लेकिन वह वास्तव में उन दोनों के बीच अनकही रह गई हर चीज का चित्र भी हो सकता है। निकटता और दूरी, कोमलता और तनाव तथा आकृति और अमूर्तन के बीच की यही जगह उनकी कला को उसकी विशिष्ट आवाज देती है।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

सुनील वागले : प्रकृति के उत्सव और संभावनाओं के चित्रकार




किसी भी कलाकार के जीवन में वह समय भी रचनात्मक महत्त्व रखता है, जब वह कुछ रच नहीं रहा होता या अपनी रचनाओं को प्रदर्शित नहीं कर रहा होता। तीन दशक तक निरंतर कला-सृजन करते रहने के बावजूद अपनी कृतियों को प्रदर्शित करने की कोई हड़बड़ी न होना सुनील वागले की विशिष्टता है। प्राकृतिक स्थितियों और सौंदर्य के यथार्थ को भाव के स्तर पर संश्लेषित करते हुए उसे अमूर्तन की ओर ले जाना और फिर उसी अमूर्तन में वास्तविकता का बोध जाग्रत करना उनकी कला का मूलमंत्र है। पहाड़, पेड़, नदी, आसमान में चाँद और पृथ्वी पर मानव-निर्मित संरचनाओं की जटिलता—ये सब मिलकर सुनील वागले के कला-संसार को बहुआयामी बनाते हैं। पहाड़ और पेड़ उनकी पेंटिंग्स के प्रमुख आकार हैं, जिन्हें वे बाह्य आकृतियों की सीमाओं के भीतर रखते हुए अमूर्त रूप प्रदान करते हैं।



पहाड़ों की भव्यता और सौंदर्य को चित्रित करने के साथ-साथ वागले उनकी संरचनाओं में अमूर्तन की संभावनाओं की तलाश भी करते हैं। उनकी पेंटिंग्स में पेड़ भी आकार और रंग-योजना, दोनों स्तरों पर अमूर्तन की ओर अग्रसर दिखाई देते हैं। सफेद रंग के पेड़ और हरे, लाल, नीले आदि रंगों में उभरते पहाड़ जीवन को विविधवर्णी दृष्टि से देखने की कलाकार की आकांक्षा को अभिव्यक्त करते हैं। अमूर्त संरचनाओं के साथ रंगों की उज्ज्वलता का संयोजन उनकी कला में जीवन के उत्सव का बोध जगाता है। ऐसा लगता है, मानो कलाकार प्रकृति के उत्सव को अपने रंगों में पुनर्सृजित कर रहा हो। उनकी पेंटिंग्स के रंग आभायुक्त हैं और दर्शकों के भीतर आनंद की अनुभूति जगाते हैं।



वागले की पेंटिंग्स में अक्सर पहाड़ों के समूह के बीच एक अकेला पेड़ दिखाई देता है। यह संयोजन उनकी रचनाओं में रहस्य और उत्सुकता के भाव एक साथ उत्पन्न करता है। एक ओर पेड़ जीवन की जीवटता, जिजीविषा और संभावनाओं का प्रतीक बन जाता है, तो दूसरी ओर उसका अकेलापन प्रकृति के संतुलन में आए विचलन की ओर भी संकेत करता है। पेड़ की संरचना पर ध्यान दें तो पत्तियों की न्यूनता भी अर्थपूर्ण प्रतीत होती है। आकृति में यह संयम चित्र के अर्थ-विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रकृति का चित्रण करते हुए वागले केवल उसके बाह्य सौंदर्य तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसकी संरचनाओं और उनके भीतर निहित अर्थ-संभावनाओं को भी उद्घाटित करते हैं।

उनके नए चित्रों में चाँदनी रात के दृश्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सामान्यतः रात के परिदृश्य को चित्रित करने के लिए कलाकार काले रंग की अधिकता, अँधेरे के प्रभाव और कैनवास के कुछ हिस्सों पर केंद्रित प्रकाश का सहारा लेते हैं। इसके विपरीत, सुनील वागले रंगों से सराबोर उजली रातों की रचना करते हैं। उनकी रातें अँधेरे की सघनता से अधिक प्रकाश की संभावनाओं को सामने लाती हैं। इन चित्रों में चंद्रमा भी अलग-अलग अवस्थाओं में दिखाई देता है। इस प्रकार उनकी रचनाएँ केवल रात्रि-दृश्यों का चित्रण नहीं करतीं, बल्कि एक ऐसे संसार की रचना करती हैं, जहाँ उजास, आशा और संभावनाएँ केंद्रीय महत्त्व रखती हैं। उनके कला-संसार में अस्तित्व का होना ही महत्त्वपूर्ण है। सुनील वागले प्रकृति में जो कुछ उपस्थित है, उसे सकारात्मक दृष्टि से देखते और रचते हैं।



वागले की पेंटिंग्स को एक तरह की दृश्य कविताएँ कहा जा सकता है। वे स्वयं कवि भी हैं। मराठी में उनका कविता-संग्रह *‘मन माझे’* अर्थात् ‘मेरा मन’ प्रकाशित हो चुका है। उनकी कविताओं में प्रेम के अनेक भाव और रंग दिखाई देते हैं, जिनमें प्रकृति के प्रति अनुराग भी शामिल है। कविता और चित्रकला, दोनों माध्यमों में प्रकृति तथा संवेदना की उपस्थिति उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के दो ऐसे पक्ष हैं, जो एक-दूसरे के निकट दिखाई देते हैं। उनकी पेंटिंग्स में रंग, आकार और रिक्त स्थान जिस तरह अर्थ का निर्माण करते हैं, उसे देखते हुए दृश्य और काव्यात्मक संवेदना के बीच का संबंध सहज ही अनुभव किया जा सकता है।



सुनील वागले की कला-यात्रा में कई मोड़ आए हैं। नागपुर चित्रकला महाविद्यालय से 1984 में बी.एफ़.ए. की शिक्षा पूरी करने के बाद वे वहीं कला-शिक्षक नियुक्त हुए। कला की औपचारिक शिक्षा और समय के साथ अर्जित अनुभवों ने उन्हें एक शिक्षक तथा कलाकार के रूप में आगे बढ़ने का मार्ग दिया। बच्चों को कला सिखाते हुए वे अपनी कला की खोज में भी निरंतर लगे रहे। उनका कला-सृजन जारी रहा, लेकिन अपनी कृतियों को प्रदर्शित करने के अवसर उन्हें नहीं मिल सके। एक तरह से वे अपने लिए ही चित्र रचते रहे।



इस लंबी यात्रा ने उन्हें यह सिखाया कि एक कलाकार को जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। हालाँकि, धैर्य के इस विचार ने उनकी गति को इतना धीमा कर दिया कि एक समय उनकी कला में ठहराव-सा आ गया। एक कलाकार के रूप में यह उनके लिए कठिन स्थिति थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे चुपचाप काम करते रहे और इस दौरान कला को लेकर अनेक प्रयोग किए। माध्यमों से लेकर विषयों तक, उन्होंने अपनी संभावनाओं को लगातार परखा। इन प्रयोगों का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि चित्र-रचना के विभिन्न आयामों को तलाशने और समझने का अवसर उन्हें मिला। इस प्रक्रिया में उनका कला-अनुभव विस्तृत हुआ और उनकी रचनात्मक दृष्टि को नए सिरे से विकसित होने का अवसर मिला। सुनील वागले की कला-साधना का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव उनका शिक्षक-जीवन रहा, जबकि दूसरा पड़ाव सेवानिवृत्ति के बाद शुरू हुआ। वर्ष 2021 में नौकरी को अलविदा कहकर वे पूरी तरह कला-सृजन में जुट गए। 

-डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

कंचन मेहरा की कला में प्रकृति, मनुष्य और अध्यात्म के रंग


एक स्टूडियो मुलाकात, जिसने एक परिचित कलाकार के रचनात्मक संसार के नए आयाम खोले

कंचन मेहरा के साथ डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज उनकी कला पर चर्चा करते हुए। 


 

एक कलाकार के तौर पर मैं कंचन मेहरा को लंबे समय से जानता हूँ। उनकी रचनाओं को देखने और उनके साथ संवाद करने के अवसर भी मिले हैं। लेकिन 10 अक्टूबर 2026 की दोपहर गुरुग्राम स्थित विमला आर्ट फोरम के उनके स्टूडियो में मुलाकात का अनुभव कुछ अलग था। लगा, जैसे इस बार उनके भीतर के कलाकार से पहली बार पूरी तरह परिचित होने का अवसर मिला हो।



कंचन मेहरा विमला आर्ट फोरम की संस्थापक ट्रस्टी हैं। उनके कैनवास चित्रों से मेरा पहले भी परिचय रहा है, लेकिन इस बार उनके जलरंग देखने का अवसर मिला। इन कृतियों ने उनकी कला के ऐसे पक्ष से परिचित कराया, जिसमें प्रकृति के प्रति अनुराग, मानवीय संवेदनाओं की समझ और जीवन को अनेक दृष्टियों से देखने की ललक एक साथ दिखाई देती है।



लगभग पंद्रह वर्षों के कला-सफर में कंचन मेहरा ने अभिव्यक्ति के कई आयाम तलाशे हैं। उनकी आगामी एकल प्रदर्शनी में इन विविधताओं को देखने का अवसर मिलेगा। उनके लिए कला किसी एक विषय या विचार तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन को उसकी बहुलता में समझने और अभिव्यक्त करने का माध्यम है।

प्रकृति से मनुष्य तक

प्रकृति कंचन मेहरा की कला का केंद्रीय विषय है, लेकिन उसका अर्थ केवल पेड़-पौधों, पहाड़ों, जल और आकाश के दृश्यों तक सीमित नहीं है। वह सजीव प्रकृति में अधिक रुचि रखती हैं, जिसमें मनुष्य और उसका संसार भी शामिल है। उनके लिए जीवन के सामाजिक और पारिवारिक संबंध, भावनाएँ तथा अनुभव भी प्रकृति के ही विविध रूप हैं।



उनके चित्रों में प्राकृतिक सौंदर्य की अनेक दृश्यावलियाँ हैं। कहीं प्रकृति की सहजता आकर्षित करती है, तो कहीं उसके माध्यम से जीवन की संवेदनात्मक उपस्थिति महसूस होती है। उनकी कला में एक तरह की मासूमियत भी है—चीजों को सहज दृष्टि से देखने और परिचित दृश्यों में भी सौंदर्य तलाशने की मासूमियत।



विषयों की यह विविधता जीवन को कई स्तरों पर देखने की उनकी प्रवृत्ति से जुड़ी है। मनुष्य उनके लिए केवल किसी दृश्य का हिस्सा नहीं, बल्कि भावनाओं, स्मृतियों और संबंधों से निर्मित एक स्वतंत्र संसार है। उनकी रचनात्मक रुचि इस संसार के सामाजिक और पारिवारिक पक्षों के साथ उसकी आंतरिक संवेदनाओं तक जाती है।

अध्यात्म की आंतरिक उपस्थिति

कंचन मेहरा की कला में अध्यात्म भी एक महत्त्वपूर्ण आयाम है। उनकी रचनाओं में यह प्रकृति और मानवीय संवेदना से अलग-थलग नहीं, बल्कि उनके साथ विभिन्न संयोजनों में उभरता है। बाहरी संसार को देखने के साथ-साथ भीतर के अनुभवों को समझने की आकांक्षा उनकी कला को व्यापक अर्थ देती है।





प्रकृति, मनुष्य और अध्यात्म के बीच बनने वाले संबंध उनके चित्रों को केवल दृश्य-सौंदर्य तक सीमित नहीं रहने देते। वे जीवन को अनुभव करने और उसके अर्थ तलाशने की संभावनाएँ खोलते हैं। यही वजह है कि उनकी कला में विषयों की विविधता के साथ संवेदना के अलग-अलग स्तर भी दिखाई देते हैं।



जलरंगों में एक नया परिचय

इस स्टूडियो मुलाकात का सबसे खास पक्ष उनके जलरंग चित्रों को देखना था। जलरंग की पारदर्शिता, प्रवाह और सहजता कलाकार से माध्यम के प्रति विशेष संवेदनशीलता की अपेक्षा करती है। कंचन मेहरा के जलरंगों ने उनके रचनात्मक व्यक्तित्व का एक नया पक्ष सामने रखा। उनके काम को देखते हुए यह समझने का अवसर मिला कि कलाकार एक ही जीवनानुभव को अलग-अलग माध्यमों में किस तरह अभिव्यक्त कर सकता है।



उनकी कला को समझने के लिए केवल विषयों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं; यह देखना भी जरूरी है कि वे अपने अनुभवों को किस तरह रंगों और आकृतियों में रूपांतरित करती हैं। कैनवास और जलरंग, दोनों माध्यमों में उनकी सक्रियता उनके रचनात्मक विस्तार का संकेत देती है।

एक प्रदर्शनी, अनेक दृष्टियाँ

कंचन मेहरा की आगामी एकल प्रदर्शनी उनके लगभग पंद्रह वर्षों के कला-सफर के विविध पक्षों को देखने का अवसर होगी। प्रकृति, मानवीय संबंधों, भावनात्मक अनुभवों और अध्यात्म से जुड़े उनके विषय जीवन को किसी एक निष्कर्ष में बाँधने के बजाय उसकी बहुलता को सामने लाते हैं।



10 अक्टूबर की उस दोपहर स्टूडियो में हुआ अनुभव मेरे लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण था कि एक परिचित कलाकार की कला को नए सिरे से देखने का अवसर मिला। कभी-कभी कुछ अनदेखी कृतियाँ और एक आत्मीय संवाद किसी कलाकार के रचनात्मक संसार की ऐसी परतें खोल देते हैं, जो पहले हमारी दृष्टि से ओझल रही हों।



कंचन मेहरा की कला से यह मुलाकात इसी अर्थ में उल्लेखनीय रही। उनके चित्रों में प्रकृति का सौंदर्य, मनुष्य की संवेदना और अध्यात्म की आंतरिक खोज एक विस्तृत रचनात्मक संसार के रूप में सामने आते हैं। उनकी आगामी एकल प्रदर्शनी इस संसार से रूबरू होने का अवसर देगी।

-डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज 

सोमवार, 10 अगस्त 2026

पूर्वावलोकनः प्रवाह प्रदर्शनीः वेद प्रकाश भारद्वाज



कला क्या है—यदि वह केवल किसी दृश्य, अनुभव या विचार को रूप देना नहीं, बल्कि स्वयं से आगे जाने की एक निरंतर कोशिश है?

चित्र, कविता, संगीत, नृत्य, शिल्प, छायाचित्र—कला के रूप अनेक हैं, उनके माध्यम अलग-अलग हैं, उनकी भाषाएँ भी अलग हैं; लेकिन इन सबके भीतर एक अदृश्य धारा निरंतर बहती रहती है। यह धारा मनुष्य के अनुभव, उसकी संवेदना, उसकी स्मृति, उसके प्रश्नों और उसकी आकांक्षाओं से निर्मित होती है। कला इसी प्रवाह को किसी रूप में दृश्य, श्रव्य या अनुभव्य बनाती है।




शीमिता वात्सायन की रचना

पंकज निगम द्वारा क्यूरेट की गई समूह प्रदर्शनी, "प्रवाह - जीवन के प्रवाह का उत्सव" में पेंटर्स, मूर्तिकारों और फ़ोटोग्राफ़र्स की अभिव्यक्तियाँ माध्यमों और शैली की भिन्नता के बावजूद जीवन के जिस सतत प्रवाह को उजागर करती हैं, वह कलात्मक खोज की भावना को सामने लाती हैं। इस प्रदर्शनी में आदर्श मिश्रा, खुशबू शर्मा, प्रांजलि चौधरी, दीपक, पारुल कुमार, मनोजकुमार एम. साकले, आनंदा गुप्ता, सौरभ मजूमदार, अजब सिंह, सोनिया सरीन, संजीव कुमार सिन्हा, विनय कुमार, समीर मजूमदार, डिंपल चावला डांग, विकास बैजल, स्मिता घोष दत्ता, अजय रावत, डॉ. गुरदीप नागर, शीमिता वात्स्यायन, बासु कुमार, सेबी ऑगस्टीन, विनय विक्रम सिंह, जयंती बनर्जी, ज़ैद और पंकज निगम की रचनाएँ शामिल हैं। 4 से 10 सितंबर 2026 तक नई दिल्ली की आईफैक्स की गैलरियों में इस प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा।





जीवन के प्रवाह के उत्सव की प्रतीक इस प्रदर्शनी में शामिल कलाकारों की रचनाएँ देखने वालों को दृश्य में बांधती हैं तो मुक्त भी करती हैं। कला का एक आयाम, एक उद्देश्य दर्शक की मुक्ति भी है। एक कलाकार अपनी रचना के माध्यम से स्वयं को मुक्त करता है, और साथ ही दर्शक के लिए भी मुक्ति का एक मार्ग संभव करता है। यह मुक्ति है वर्तमान से, जड़ता से, पूर्वनिर्धारित अर्थों से और कभी-कभी स्वयं अपने बनाए हुए रूपों से भी। यह मुक्ति हमेशा प्रत्यक्ष नहीं होती। कभी वह रूप को तोड़ती है, कभी रूप के भीतर ही एक नया अर्थ खोजती है। कभी वह दिखाई देती है और कभी केवल महसूस की जा सकती है। कला में मुक्ति का यह अनुभव रूप और अरूप, दृश्य और अदृश्य, स्थिरता और गति के बीच लगातार घटित होता रहता है।





सौरभ मजूमदार, दीपक, अजब सिंह, सोनिया सरिन आदि के शिल्प अपने संरचनात्मक विन्यास से अधिक अंतर्गुंफित अर्थ छवियों के कारण जीवन के प्रवाह को सामने लाते हैं। कोई भी रचना शून्य से जन्म नहीं लेती। उसके पीछे कलाकार का देखा हुआ संसार, जिया हुआ समय, स्मृतियाँ, असफलताएँ, प्रश्न और पूर्ववर्ती रचनाएँ उपस्थित रहती हैं। इस अर्थ में प्रत्येक रचना अपनी पिछली रचना का विस्तार है—उसका अगला पड़ाव, उसका परिवर्तन, उसका विकास। कलाकार जब दोबारा उसी विषय की ओर लौटता है, तब भी वह वास्तव में उसी जगह नहीं लौटता। 





किसी भी रचना में कलाकार मनुष्य के आगे बढ़ने के साथ ही उसके वापस लौटने को भी दर्ज करता है। इस संदर्भ में मनोजकुमार एम. सकाले, बासु कुमार, संजीव कुमार सिन्हा, खुशबू शर्मा, जैद आदि की रचनाओं में देखा जा सकता है। समय बदल चुका होता है, देखने वाला बदल चुका होता है और स्वयं विषय भी अपने अर्थों में बदल चुका होता है। इसलिए एक ही विषय में भी अनंत संभावनाएँ जन्म लेती रहती हैं, और इस बात को इस प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं में देखा जा सकता है। डॉ. गुरुदीप नागर और अजय रावत के शिल्प, और जयंति बनर्जी, समीर मजूमदार, पारुल कुमार, पंकज निगम आदि के चित्र जीवन के प्रवाह को अपनी तरह से सामने लाते हैं।





इस तरह ‘प्रवाह’ प्रदर्शनी जीवन की निरंतरता को देखने और अनुभव करने का एक अवसर सामने लाने वाली साबित होगी, इसकी पूरी संभावना है। विभिन्न माध्यमों और शैलियों में काम कर रहे कलाकारों की रचनाएँ यहाँ एक ऐसी साझा धारा में दिखाई देती हैं, जहाँ भिन्नताएँ अपनी जगह रहते हुए भी एक-दूसरे से संवाद करती हैं। एक रचना दूसरी तक पहुँचती है, एक अनुभव दूसरे अनुभव को छूता है और एक दृष्टि किसी दूसरी दृष्टि में अपना विस्तार खोजती है।





यह प्रवाह केवल कलाकृतियों के बीच नहीं है। यह कलाकार और दर्शक के बीच भी है। रचना कलाकार के भीतर से निकलकर दर्शक के अनुभव में प्रवेश करती है और वहाँ जाकर एक नए अर्थ, नई संवेदना और नए प्रश्न को जन्म देती है। इस तरह कलाकृति पूर्ण होकर भी पूर्ण नहीं होती; उसका अर्थ उसके बनने के बाद भी बहता रहता है।





आज जब निजी और सार्वजनिक जीवन, दोनों ही स्तरों पर अनेक प्रकार के विचलन, अस्थिरता और विखंडन हमारे अनुभव का हिस्सा बन चुके हैं, तब रचनात्मकता का यह प्रवाह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ठहराव और जड़ता के विरुद्ध कला का होना अपने आप में एक सक्रिय प्रतिरोध है। वह हमें याद दिलाती है कि मनुष्य केवल परिस्थितियों का परिणाम नहीं है; वह उन्हें देखने, बदलने और नए अर्थों में रचने की क्षमता भी रखता है।





‘प्रवाह’ इसलिए केवल एक समूह प्रदर्शनी नहीं, बल्कि मनुष्य के रचनात्मक अस्तित्व की एक बुनियादी अवस्था है। एक ऐसी अवस्था जो निरंतर बहती है, बदलती है, और हमेशा नये की संभावना को जिंदा रखती है।