किसी भी कलाकार के जीवन में वह समय भी रचनात्मक महत्त्व रखता है, जब वह कुछ रच नहीं रहा होता या अपनी रचनाओं को प्रदर्शित नहीं कर रहा होता। तीन दशक तक निरंतर कला-सृजन करते रहने के बावजूद अपनी कृतियों को प्रदर्शित करने की कोई हड़बड़ी न होना सुनील वागले की विशिष्टता है। प्राकृतिक स्थितियों और सौंदर्य के यथार्थ को भाव के स्तर पर संश्लेषित करते हुए उसे अमूर्तन की ओर ले जाना और फिर उसी अमूर्तन में वास्तविकता का बोध जाग्रत करना उनकी कला का मूलमंत्र है। पहाड़, पेड़, नदी, आसमान में चाँद और पृथ्वी पर मानव-निर्मित संरचनाओं की जटिलता—ये सब मिलकर सुनील वागले के कला-संसार को बहुआयामी बनाते हैं। पहाड़ और पेड़ उनकी पेंटिंग्स के प्रमुख आकार हैं, जिन्हें वे बाह्य आकृतियों की सीमाओं के भीतर रखते हुए अमूर्त रूप प्रदान करते हैं।
पहाड़ों की भव्यता और सौंदर्य को चित्रित करने के साथ-साथ वागले उनकी संरचनाओं
में अमूर्तन की संभावनाओं की तलाश भी करते हैं। उनकी पेंटिंग्स में पेड़ भी आकार
और रंग-योजना, दोनों स्तरों पर अमूर्तन की ओर अग्रसर दिखाई देते
हैं। सफेद रंग के पेड़ और हरे, लाल, नीले आदि रंगों में उभरते पहाड़ जीवन को विविधवर्णी दृष्टि से देखने की कलाकार
की आकांक्षा को अभिव्यक्त करते हैं। अमूर्त संरचनाओं के साथ रंगों की उज्ज्वलता का
संयोजन उनकी कला में जीवन के उत्सव का बोध जगाता है। ऐसा लगता है, मानो कलाकार प्रकृति के उत्सव को अपने रंगों में पुनर्सृजित कर रहा हो। उनकी
पेंटिंग्स के रंग आभायुक्त हैं और दर्शकों के भीतर आनंद की अनुभूति जगाते हैं।
वागले की पेंटिंग्स में अक्सर पहाड़ों के समूह के बीच एक अकेला पेड़ दिखाई देता
है। यह संयोजन उनकी रचनाओं में रहस्य और उत्सुकता के भाव एक साथ उत्पन्न करता है।
एक ओर पेड़ जीवन की जीवटता, जिजीविषा और संभावनाओं का
प्रतीक बन जाता है, तो दूसरी ओर उसका अकेलापन
प्रकृति के संतुलन में आए विचलन की ओर भी संकेत करता है। पेड़ की संरचना पर ध्यान
दें तो पत्तियों की न्यूनता भी अर्थपूर्ण प्रतीत होती है। आकृति में यह संयम चित्र
के अर्थ-विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रकृति का चित्रण करते हुए
वागले केवल उसके बाह्य सौंदर्य तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसकी संरचनाओं
और उनके भीतर निहित अर्थ-संभावनाओं को भी उद्घाटित करते हैं।
उनके नए चित्रों में चाँदनी रात के दृश्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सामान्यतः रात के परिदृश्य को चित्रित करने के लिए कलाकार काले रंग की अधिकता, अँधेरे के प्रभाव और कैनवास के कुछ हिस्सों पर केंद्रित प्रकाश का सहारा लेते हैं। इसके विपरीत, सुनील वागले रंगों से सराबोर उजली रातों की रचना करते हैं। उनकी रातें अँधेरे की सघनता से अधिक प्रकाश की संभावनाओं को सामने लाती हैं। इन चित्रों में चंद्रमा भी अलग-अलग अवस्थाओं में दिखाई देता है। इस प्रकार उनकी रचनाएँ केवल रात्रि-दृश्यों का चित्रण नहीं करतीं, बल्कि एक ऐसे संसार की रचना करती हैं, जहाँ उजास, आशा और संभावनाएँ केंद्रीय महत्त्व रखती हैं। उनके कला-संसार में अस्तित्व का होना ही महत्त्वपूर्ण है। सुनील वागले प्रकृति में जो कुछ उपस्थित है, उसे सकारात्मक दृष्टि से देखते और रचते हैं।
वागले की पेंटिंग्स को एक तरह की दृश्य कविताएँ कहा जा सकता है। वे स्वयं कवि
भी हैं। मराठी में उनका कविता-संग्रह *‘मन माझे’* अर्थात् ‘मेरा मन’ प्रकाशित हो चुका
है। उनकी कविताओं में प्रेम के अनेक भाव और रंग दिखाई देते हैं, जिनमें प्रकृति के प्रति अनुराग भी शामिल है। कविता और चित्रकला, दोनों माध्यमों में प्रकृति तथा संवेदना की उपस्थिति उनके रचनात्मक व्यक्तित्व
के दो ऐसे पक्ष हैं, जो एक-दूसरे के निकट दिखाई
देते हैं। उनकी पेंटिंग्स में रंग, आकार और रिक्त स्थान जिस तरह
अर्थ का निर्माण करते हैं, उसे देखते हुए दृश्य और काव्यात्मक
संवेदना के बीच का संबंध सहज ही अनुभव किया जा सकता है।
सुनील वागले की कला-यात्रा में कई मोड़ आए हैं। नागपुर चित्रकला महाविद्यालय
से 1984 में बी.एफ़.ए. की शिक्षा पूरी करने के बाद वे वहीं कला-शिक्षक नियुक्त
हुए। कला की औपचारिक शिक्षा और समय के साथ अर्जित अनुभवों ने उन्हें एक शिक्षक तथा
कलाकार के रूप में आगे बढ़ने का मार्ग दिया। बच्चों को कला सिखाते हुए वे अपनी कला
की खोज में भी निरंतर लगे रहे। उनका कला-सृजन जारी रहा, लेकिन अपनी कृतियों को प्रदर्शित करने के अवसर उन्हें नहीं मिल सके। एक तरह से
वे अपने लिए ही चित्र रचते रहे।
इस लंबी यात्रा ने उन्हें यह सिखाया कि एक कलाकार को जल्दबाजी नहीं करनी
चाहिए। हालाँकि, धैर्य के इस विचार ने उनकी गति को इतना धीमा कर
दिया कि एक समय उनकी कला में ठहराव-सा आ गया। एक कलाकार के रूप में यह उनके लिए
कठिन स्थिति थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे चुपचाप काम करते
रहे और इस दौरान कला को लेकर अनेक प्रयोग किए। माध्यमों से लेकर विषयों तक, उन्होंने अपनी संभावनाओं को लगातार परखा। इन प्रयोगों का एक महत्त्वपूर्ण
परिणाम यह हुआ कि चित्र-रचना के विभिन्न आयामों को तलाशने और समझने का अवसर उन्हें
मिला। इस प्रक्रिया में उनका कला-अनुभव विस्तृत हुआ और उनकी रचनात्मक दृष्टि को नए
सिरे से विकसित होने का अवसर मिला। सुनील वागले की
कला-साधना का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव उनका शिक्षक-जीवन रहा, जबकि दूसरा पड़ाव सेवानिवृत्ति के बाद शुरू हुआ। वर्ष 2021 में नौकरी को
अलविदा कहकर वे पूरी तरह कला-सृजन में जुट गए।
-डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
















































