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| असित कुमार पटनायक अपनी प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर कलाकार व लेखक डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज, राम ओंकार, रमेश नायर, जस्टिन कोंचिरा व अन्य लोगों के साथ। |
असित कुमार पटनायक की
कला की पहचान मुख्यतः मानव आकृतियों और विशेषकर स्त्री-पुरुष के बीच मौजूद
भावनात्मक संबंधों के चित्रण से होती है। पहली दृष्टि में उनके चित्र पारंपरिक
फिगरेटिव कला की परिचित दुनिया का हिस्सा दिखाई देते हैं—अंतरंग आकृतियाँ, संकेतपूर्ण
मुद्राएँ और सावधानी से संयोजित रंग। लेकिन उनकी कला को केवल इसी आधार पर देखना
उनके कलात्मक विकास की जटिलता को सीमित करना होगा। आकृतियों की सतही सरलता के पीछे
ड्रॉइंग, अमूर्तन, टेक्सचर, लैंडस्केप, स्मृति
और मानवीय संबंधों की मनोवैज्ञानिक अस्पष्टता के प्रति एक दीर्घकालिक रुचि दिखाई
देती है। उनकी तीन दशक लंबी कलायात्रा का एक प्रतिनिधि रूप इन दिनों नई दिल्ली के
बीकानेर हाउस स्थित एलटीसी गैलरी में देखने को मिल रहा है। चावल आर्ट गैलरी द्वारा
आयोजित यह विहंगावलोकन प्रदर्शनी उनके विविध कलात्मक प्रयोगों को समझने का अवसर देती
है।
पटनायक की कलायात्रा
इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि वह आधुनिक भारतीय कला में प्रचलित सामान्य दिशा का
अनुसरण नहीं करती। जहाँ अनेक कलाकार फिगरेटिव कला से शुरू होकर धीरे-धीरे अमूर्तन
की ओर जाते हैं, वहीं पटनायक की यात्रा लगभग उलटी रही। बीएफए के दिनों में
उन्होंने अमूर्त संरचनाओं, टेक्सचर, इम्पास्टो और मिश्रित माध्यमों के साथ
व्यापक प्रयोग किए। उनकी शुरुआती कृतियों में कैनवास की भौतिक सतह के प्रति गहरी
जिज्ञासा दिखाई देती है। बाद में मानव आकृति उनके काम का केंद्र बनी, लेकिन
सतह और टेक्सचर में उनकी रुचि कभी समाप्त नहीं हुई।
उनकी परिपक्व कृतियों में पृष्ठभूमि केवल सजावटी स्थान नहीं होती। उसमें मौजूद रेखाएँ, टेक्सचर और सतही संरचनाएँ उनके शुरुआती अमूर्त प्रयोगों की निरंतरता हैं। आकृति रचना के केंद्र में होते हुए भी उसके आसपास अमूर्तन सक्रिय रहता है और एक मनोवैज्ञानिक वातावरण निर्मित करता है। यह बात उस बड़े अमूर्त चित्र में विशेष रूप से दिखाई देती है, जो कैनवास तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान लगभग अनायास विकसित हुआ। सतह पर काम करते हुए पटनायक को एक ऐसी संरचना दिखाई दी जो उन्हें अपने आप में पूर्ण लगी। उन्होंने उसे फिगरेटिव चित्र में बदलने के बजाय अमूर्त रूप में ही रहने दिया। यह कृति बताती है कि अमूर्तन उनके अभ्यास से कभी पूरी तरह अनुपस्थित नहीं हुआ, भले ही बाद में वह उनकी कला का प्रमुख विषय न रहा हो।
उनकी ड्रॉइंग में भी
इसी निरंतरता को देखा जा सकता है। बनारस में बिताए समय के दौरान उन्होंने घाटों, स्थानीय
लोगों और रोजमर्रा के जीवन के अनेक चित्र बनाए। ये केवल दृश्य-अवलोकन के अभ्यास
नहीं थे, बल्कि
रेखा को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में समझने की प्रक्रिया का हिस्सा थे। पटनायक
के लिए ड्रॉइंग अनुशासन और खोज का माध्यम होने के साथ-साथ एक स्वतंत्र कला-विधा भी
है।
यह अनुभव उनके बाद के
चित्रों में शरीर की अभिव्यक्तिगत क्षमता के रूप में सामने आता है। उनकी आकृतियाँ
सामान्यतः शारीरिक रूप से विकृत नहीं होतीं; उनमें भावनात्मक तनाव मुख्यतः मुद्रा, हावभाव
और स्थानिक संबंधों से पैदा होता है। सिर का हल्का झुकाव,
हाथ की स्थिति, दो
शरीरों के बीच की दूरी या किसी आकृति की दृष्टि की दिशा पूरे चित्र का
मनोवैज्ञानिक वातावरण बदल सकती है। इसीलिए उनकी कला का प्रत्यक्ष विषय भले ही
मानवीय संबंध हों, उसका गहरा विषय उन संबंधों के भीतर
सक्रिय मनोविज्ञान है।
पटनायक के
स्त्री-पुरुष अक्सर परस्पर विरोधी भावनात्मक अवस्थाओं के बीच दिखाई देते हैं।
प्रेम के साथ आशंका, आकर्षण के साथ संकोच और निकटता के साथ
दूरी मौजूद हो सकती है। दो आकृतियाँ शारीरिक रूप से करीब होने के बावजूद मानसिक
स्तर पर एक-दूसरे से दूर या अनिश्चित दिखाई दे सकती हैं। यही तनाव उनके चित्रों को
रोमांटिक संबंधों के सीधे चित्रण तक सीमित नहीं होने देता।
लाल रंग का प्रयोग इस
संदर्भ में उल्लेखनीय है। अनेक चित्रों में वह प्रेम, जीवन-ऊर्जा और भावनात्मक तीव्रता का
संकेत बनता है। लेकिन रंग उनके यहाँ केवल प्रतीक नहीं हैं। रंगों का सामंजस्य और
उनके बीच के विरोध मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जिसमें भावनाएँ मानो फैलती हुई प्रतीत
होती हैं। एक्रिलिक रंगों की पारदर्शिता और कोमलता चित्रों में नाजुकता पैदा करती
है, जबकि
तीखे रंग भावनात्मक दबाव और नाटकीयता को बढ़ाते हैं।
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| बनारस में रहने के दौरान के अनुभवों ने असित की कला को एक आयाम दिया है। |
उनके अर्ध-वस्त्रधारी स्त्री-पुरुषों को भी इसी दृष्टि से देखना चाहिए। इन चित्रों को केवल कामुक या इरॉटिक रचनाओं के रूप में देखना उनके अर्थ को सीमित कर देगा। यहाँ शारीरिक अनावृत्ति से अधिक महत्त्व भावनात्मक अनावृत्ति का है। असुरक्षा, निर्भरता, आकर्षण और अनिश्चितता शरीर की दृश्य उपस्थिति से आगे जाकर अर्थ ग्रहण करते हैं। इस तरह शरीर स्वयं एक मनोवैज्ञानिक भू-दृश्य बन जाता है।
इन संबंधों में
शक्ति-संतुलन का सूक्ष्म उलटाव भी दिखाई देता है। पटनायक के चित्रों में पुरुष
हमेशा प्रभावशाली या प्रभुत्वशाली स्थिति में नहीं होता। कई रचनाओं में वह
भावनात्मक रूप से समर्पित या असुरक्षित दिखाई देता है, जबकि स्त्री अधिक दृढ़ मनोवैज्ञानिक
स्थिति में होती है। यहाँ किसी स्थायी लैंगिक सत्ता-क्रम को स्थापित करने के बजाय
अंतरंग संबंधों के भीतर शक्ति की धारणाओं पर प्रश्न उठता है।
बार-बार दिखाई देने
वाली गोलाकार, मुलायम और भरे हुए शरीरों की संरचना इस जटिलता को और बढ़ाती
है। ये आकृतियाँ आधुनिकतावादी कला के कठोर, कोणीय और वीरतापूर्ण शरीर-आदर्श से अलग
हैं। इनमें गर्माहट और असुरक्षा है। वे स्मारकीय शरीर नहीं, बल्कि
संवेदनशील और जीवंत देहें हैं। उनकी शारीरिक कोमलता ही भावनात्मक जटिलता व्यक्त
करने का माध्यम बनती है।शुरुआती दौर के कुछ काम
पटनायक की कला की एक बड़ी ताकत यह है कि वह अपने अर्थों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं करती। उनके चित्र किसी संपूर्ण कथा के बजाय एक परिस्थिति निर्मित करते हैं। दर्शक समझ सकता है कि दो लोग किसी भावनात्मक संबंध में हैं, लेकिन उस संबंध का वास्तविक स्वरूप निश्चित नहीं होता। वह प्रेम, आकर्षण, निर्भरता, चिंता, मेल-मिलाप या बिछड़ाव कुछ भी हो सकता है। चित्र दर्शक को किसी एक अर्थ तक सीमित नहीं करता।
आज के दृश्य-संसार
में, जहाँ
छवियों से तत्काल और स्पष्ट संदेश देने की अपेक्षा की जाती है, यह
खुलापन विशेष महत्त्व रखता है। पटनायक के चित्रों को देखने के लिए समय चाहिए। उनका
अर्थ किसी एक संदेश से नहीं, बल्कि आकृति, रंग, टेक्सचर और संरचना के पारस्परिक संबंधों
से धीरे-धीरे निर्मित होता है।बनारस
फिर भी उनकी कला की
आलोचनात्मक समीक्षा करते समय एक संभावित सीमा को स्वीकार करना आवश्यक है। यदि
स्त्री-पुरुष संबंध लगातार केंद्रीय विषय बने रहें, तो भावनात्मक भाषा के परिचित हो जाने और
शैली के दोहराव में बदलने का खतरा रहता है। अंतरंग आकृतियाँ, प्रेम
का तनाव और नियंत्रित संवेदनशीलता यदि कमजोर रचनाओं में बार-बार दोहराई जाएँ, तो
कला सूत्रबद्ध लग सकती है। इस संदर्भ में अमूर्तन, प्रिंटमेकिंग, टेक्सचर और संरचना में उनके प्रयोग महज
शैलीगत बदलाव नहीं, बल्कि अपने स्थापित दृश्य-व्याकरण की
सीमाओं को परखने के प्रयास भी हैं।असित कुमार के रिलीफ वर्क
प्रिंटमेकिंग की ओर उनकी वापसी विशेष रूप से दिलचस्प है। यह माध्यम कलाकार और अंतिम छवि के बीच एक अलग संबंध स्थापित करता है। चित्रकला में कलाकार सतह को लगातार बदल सकता है, जबकि प्रिंटमेकिंग में तकनीकी प्रक्रिया और अंतिम छाप के बीच एक दूरी बनी रहती है। इस माध्यम में लौटना संकेत देता है कि पटनायक अपनी स्थापित कलात्मक आदतों को चुनौती देने में अब भी रुचि रखते हैं।
उनके व्यापक
दृश्य-संसार पर भी ध्यान देना चाहिए। बनारस के घाट, ओडिशा के गाँव,
भैंस, बैल, गाय
और घोड़े, लैंडस्केप, वॉटरकलर
तथा ड्रॉइंग उनके अभ्यास के दूसरे महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। ये विषय बताते हैं कि
उनकी कल्पना केवल मानवीय अंतरंगता तक सीमित नहीं है। इनके माध्यम से गति, वातावरण, ग्रामीण
जीवन, स्मृति
और स्थान को समझने के नए रास्ते खुलते हैं।
फिर भी उनकी विविध
कलात्मक गतिविधियों के बीच मानव आकृति सबसे सुसंगत धागे के रूप में सामने आती है।
रेखा और टेक्सचर के शुरुआती प्रयोगों से लेकर भावनात्मक रूप से उलझी आकृतियों वाले
बाद के चित्रों तक, पटनायक लगातार इस प्रश्न से जूझते दिखाई
देते हैं कि बाहरी रूप के माध्यम से आंतरिक अवस्था को किस प्रकार व्यक्त किया जा
सकता है।
इसलिए उनकी उपलब्धि
केवल प्रेम को चित्रित करने में नहीं है। उनकी वास्तविक दिलचस्पी शायद इस बात में
है कि प्रेम स्वयं एक अस्थिर मनोवैज्ञानिक क्षेत्र है, जहाँ खुशी और चिंता, आकर्षण
और समर्पण, कोमलता और संघर्ष एक साथ मौजूद हो सकते हैं। उनके चित्र सबसे
प्रभावशाली तब लगते हैं, जब वे इस अस्पष्टता को बनाए रखते हैं।
वे यह नहीं बताते कि आकृतियाँ वास्तव में क्या महसूस कर रही हैं, बल्कि
ऐसी दृश्य परिस्थिति निर्मित करते हैं जिसमें भावना लगभग स्पर्शनीय हो जाती है।
टेक्सचर, रंगों
की कोमलता, शरीर की मुद्रा और दो दृष्टियों के बीच का मौन मिलकर ऐसी
भावनात्मक भाषा बनाते हैं, जो यथार्थवादी चित्रण और अमूर्तन के बीच
स्थित है।
तीन दशकों की
कलायात्रा में आकृति और अमूर्तन के बीच बना यह तनाव किसी एक शैलीगत पहचान से अधिक
महत्त्वपूर्ण है। आकृति उनके चित्रों को पहचान देती है, जबकि अमूर्तन, टेक्सचर और ड्रॉइंग उस पहचान को स्थिर
होने से रोकते हैं। एक परिपक्व कलाकार के लिए चुनौती अपनी भाषा को खुला रखना और नए
माध्यमों, विषयों
तथा संरचनाओं को उसमें प्रवेश करने देना है। पटनायक के हालिया प्रयोग संकेत देते
हैं कि यह प्रक्रिया अभी जारी है।
असित कुमार पटनायक की
कला हमें चित्रित आकृतियों की स्पष्ट अंतरंगता से आगे देखने के लिए प्रेरित करती
है। पहली नजर में दो लोगों का चित्र दिखाई दे सकता है, लेकिन वह वास्तव में उन दोनों के बीच
अनकही रह गई हर चीज का चित्र भी हो सकता है। निकटता और दूरी, कोमलता
और तनाव तथा आकृति और अमूर्तन के बीच की यही जगह उनकी कला को उसकी विशिष्ट आवाज
देती है।














































