Saturday, April 11, 2026

गोरा प्रदर्शनीः लोक की आभा और आधुनिकता

 प्रदर्शनी विचार- डॉ.  वेद प्रकाश भारद्वाज


प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर कलाकारों को संबोधित करते डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज

कलाकारों को संबोधिक करते डॉ. चिंतामनी कर


समकालीन कला परिदृश्य में हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति उभरकर सामने आई हैलोक परंपराओं और आधुनिकता के बीच एक नए संवाद का निर्माण। यह सहभागिता केवल शैलीगत समन्वय नहीं है, बल्कि संवेदनाओं, प्रतीकों और सांस्कृतिक स्मृति की गहरी पुनर्व्याख्या है। आधुनिक कलाजिसे कभी उसकी शहरी और वैश्विक प्रवृत्तियों के कारण लोक जीवन से दूर माना जाता थाअब उन्हीं जड़ों से पुनः ऊर्जा और प्रेरणा प्राप्त कर रही है। यह परिवर्तन केवल भारत तक सीमित नहीं है; विश्वभर में पारंपरिक लोक रूपों का पुनरावलोकन और पुनर्पाठ किया जा रहा है, जिससे आधुनिक कलात्मक प्रक्रियाओं को नया अर्थ और दृष्टि मिल रही है।


राखी गुप्ता की रचना
















                                                                                                        शुभांगी सिंह की रचना

भारतीय संदर्भ में यह संवाद विशेष महत्व रखता है। देश की लोक परंपराएँ न केवल प्राचीन हैं, बल्कि अत्यंत विविधतापूर्ण भी हैं, जो सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की एक जीवंत निरंतरता प्रस्तुत करती हैं। इसी समृद्ध विरासत के आधार पर छत्तीसगढ़ प्रगतिशील कलाकार समूह द्वारा आयोजित गोराप्रदर्शनी एक सशक्त पहल के रूप में सामने आती है। यह केवल कलाकृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि एक सक्रिय मंच है जहाँ लोक परंपराएँ और समकालीन कलात्मक अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं और विकसित होती हैं। इसका प्रमाण प्रदर्शनी में शामिल कुछ रचनाओं में मिलता है जिनमें कलाकारों ने लोक कलाओं की परंपरा से संवाद किया है, साथ ही अपनी रचनाओं में लोक संस्कृति को स्थान दिया है। इस दृष्टि से सुनीता वर्मा, केशव राम, डॉली सर्वा, प्रीति सोनी, सुभांगी सिंह ठाकुर, पूनम चक्रधारी आदि के काम उल्लेखनीय हैं।

डॉली सर्वा की रचना 

डॉ. तरुणा माथुर की रचना


श्यामा शर्मा की रचना


गोराशीर्षक स्वयं अनेक अर्थों से परिपूर्ण है। यह एक ओर दिव्य स्त्री शक्ति (शक्ति) का आह्वान करता है, तो दूसरी ओर भगवान शिव की आदिम शक्ति का संकेत भी देता है। छत्तीसगढ़ की जनजातीय समुदायों का गोरा-गोरी पर्वजिसमें शिव और पार्वती के अमूर्त रूप गोबर से निर्मित कर पूजा की जाती हैइस प्रदर्शनी की अवधारणा का केंद्र है। यह परंपरा एक महत्वपूर्ण तथ्य को उजागर करती है कि अमूर्तन केवल आधुनिकतावाद की देन नहीं, बल्कि लोक अभिव्यक्ति का एक प्राचीन और स्वाभाविक अंग है।

केशव राम की रचना


अनिल खोबरगड़े की रचना


पोडियाम रवि का शिल्प


देशभर से करीब एक सौ कलाकारों की भागीदारी इस प्रदर्शनी की व्यापकता को दर्शाती है। इस प्रदर्शनी का विचार अवश्य स्थानीय है पर छत्तीसगढ़ प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संस्थापक कलाकार जितेन साहू और प्रदर्शनी के क्यूरेटर कलाकार डॉ. ध्रुव शुक्ल ने इस प्रदर्शनी को व्यापक बनाते हुए देशभर से कलाकारों को आमंत्रित किया है। प्रदर्शनी में चित्रकला, ग्राफिक, रेखांकन और मूर्तिकला जैसे विविध माध्यमों के माध्यम से प्रस्तुत कृतियाँ एक उत्सवधर्मी दृश्य भाषा का निर्माण करती हैं। रूप, रंग और बनावट का समृद्ध संयोजन एक उत्सव का वातावरण रचता है, जबकि प्रतीकात्मकता इन सभी को जोड़ने वाला सूत्र बनती है। यही प्रतीकात्मक भाषा आधुनिक कला की अभिव्यक्ति और लोक परंपराओं की सहजता के बीच सेतु का कार्य करती है। यह उत्सव का वातावरण और संबंधों की ऊर्जा प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर 10 अप्रैल 2026 को देखने को मिली। प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार चिंतामनी कर और कलाकार डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज अतिथि थे। श्री कर ने अपने संबोधन में कला में संवेदना, अनुभूति और अभिव्यक्ति की बात करते हुए कहा कि कला एक कलाकार व्यक्तिगत रुप से करता अवश्य है पर उसकी कला सबके लिए होती है। कला सबसे संवाद करती है, और सबकी हो जाती है। कला एक तरह से व्यष्टि से समष्टि में रूपांतरित हो जाती है। कलाकृति में प्रत्येक दर्शक स्वयं को तलाश करता है। इस अवसर पर डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज ने कला में देखने के महत्व पर बल देते हुए कहा कि प्रत्येक कलाकार की कला का समाज बनाने, उसका वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कला को देखने के लिए, उसे आत्मसात करने के लिए दृश्य में जो दिख रहा है, उससे हट कर जो नहीं दिख रहा है, उसे देखना चाहिए। इस अवसर पर कलाकारों के अलावा बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित थे।

डॉ. ध्रुव तिवारी की रचना

जितेन साहू की रचना

रविकांत झा की रचना


प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं से यह स्पष्ट हो गया है कि संयोजक डॉ. ध्रुव तिवारी ने वैचारिक एकता और कलात्मक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित किया है। प्रदर्शनी में शामिल रचनाकारों में रविकांत झा, राजीव सेमवाल, शैलेंद्र साहू, ड़ा, वेद प्रकाश भारद्वाज, राजेश रावत, मोहन बराल, रीना, चौधरी, रत्ना शिवयोगी आदि का काम बहुआयामी भारतीय कला के वर्तमान परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करता कहा जा सकता है। गोराकी थीम को बनाए रखते हुए, प्रत्येक कलाकार को अपनी तरह से इस विचार को आत्मसात और व्यक्त करने की स्वतंत्रता दी गई है। परिणामस्वरूप, कृतियाँ मूर्त और अमूर्त, व्यक्तिगत और सामूहिक के बीच विचरण करती हुई एक बहुस्तरीय और गहन दृश्य अनुभव प्रस्तुत करती हैं। यह विविधता इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। प्रदर्शनी में राहुल रुंजे के टेराकोटा के शिल्प और पोडियाम रवि के लकड़ी के शिल्प एक नया अनुभव जोड़ते हैं।

राहुल रुंजे के शिल्प

हर्षिता नामदेव की रचना

पूनम चक्रधारी की रचना


इस प्रदर्शनी के मूल में शिवत्व का दार्शनिक तत्व निहित हैशिव का वह स्वरूप जो साकार और निराकार, सृजन और संहार, रूप और अरूपसभी का समावेश करता है। जनजातीय मान्यताओं में गोराकेवल एक रक्षक ही नहीं, बल्कि जीवन्तता और आनंद का प्रतीक भी है। लोक मान्यताओं में ग्राम देवता की अवधारणा भी इसी प्रकार की है जिसे कलाकार केशव राम ने अपनी पेंटिंग्स में प्रस्तुत किया। लोक परिदृश्य में छत्तीसगढ़ के नैसर्गिक सौंदर्य का अपना महत्व है जिसे जितेन साहू, डॉ. ध्रुव शुक्ल, डॉ. तरुणा माथुर, प्रीति सोनी सहित कई कलाकारों के काम में देखा जा सकता है। सुनीता वर्मा ने गोरी-गोरा की अवधारणा बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है। इस तरह हम पाते हैं कि प्रदर्शनी में लोक परंपराओं और आधुनिकता में सहअस्तित्व को प्रभावशाली तरीके से व्यक्त किया गया है। प्रदर्शित रचनाएँ इस बात को प्रभावी तरीके से सामने रखती हैं कि कला जीवन की बहुआयामी संरचनात्मक विशेषताओं को प्रभावशाली तरीके से सामने लाती है।

अभिकल्प यदु की रचना

सरिता साहू की रचना 



प्रदर्शित सभी रचनाओं के बारे में लिखना संभव नहीं है। प्रदर्शनी के उदघाटन के अवसर पर अनेक कलाकारों से उनके काम, उनकी रचना प्रक्रिया आदि के बारे में बातचीत करने का अवसर मिला। यह देखकर खुशी हुई की प्रदर्शनी में शामिल युवा कलाकार अपनी कला और विचारों को लेकर बहुत स्पष्ट हैं। कई युवा महिला कलाकारों ने जिस तरह की सामाजिक चेतना का परिचय दिया वह भारतीय कला के भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। इस दृष्टि से पूनम चक्रधारी, डॉली सर्वा, शुभांगी सिंह ठाकुर, श्यामा शर्मा, श्वेता इंदोरिया जैन आदि का उल्लेख करना उचित होगा। अपने परिवेश और समकालीन संकटों को लेकर अनिल खोबरगड़े, शांति टिर्की, दियांशु देवांगन जैसे कलाकार नई संभावनाएं जगाते हैं। प्रदर्शनी में स्त्री चेतना की वाहक रचनाकारों में डॉ. तरुणा माथुर, वंदना परगानिहा, सरिता साहू, जयश्री भागवानानी, प्रियांशि वर्मा आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। इन रचनाकारों के काम की विशेषता यह है कि कि यह मानवीय आकारों के साथ ही अमूर्तन के माध्यम से स्त्री अस्मिता को उजागर करती हैं।   

श्वेता इंदोरिया जैन की रचना

शांति टिर्की की रचना


यह प्रदर्शनी इस बात को स्थापित करती है कि लोक परंपराएँ अतीत के जड़ अवशेष नहीं हैं, बल्कि जीवंत और सृजनात्मक शक्तियाँ हैं जो आज भी समकालीन कला को प्रभावित और समृद्ध कर रही हैं। लोक की इस शाश्वत आभा को आधुनिकता में उजागर करते हुए, यह प्रदर्शनी एक विकसित होती कलात्मक दिशा की ओर संकेत करती हैजहाँ परंपरा और नवाचार मिलकर एक जीवंत सांस्कृतिक निरंतरता का निर्माण करते हैं।

Thursday, April 9, 2026

जहांगीर आर्ट गैलरी मुंबई में कामिनी बघेल की एकल प्रदर्शनी

  


कामिनी बघेल की एकल प्रदर्शनी हयूज़ और ऑफ़ वुमनहुड मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में 6 अप्रैल 2026 को शुरू हुई है जो 12 अप्रैल तक रहेगी। प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर ज्येष्ठ चित्रकार श्री प्रकाश भिसे मुख्य अतिथि रहे। साथ ही राम अवस्थी, डॉ. श्री शिरीष आंबेकर, श्री विनोद दांडगे (संचालक, कला शिक्षण मंडल, महाराष्ट्र राज्य), प्रा. शशिकांत काकडे (कुलसचिव, डिनोवा यूनिवर्सिटी), चित्रकार श्री तुषार शिंदे, प्रा. निलेश पालव, चित्रकार सोनाली अय्यर, चित्रकार मिलिंद ठाकूर, चित्रकार रमेश पाचपांडे, नीता देसाई,शुभ्रा गुप्ता एवं बॉलीवुड कलाकार अशोक कुमार सरोज,ब्रजेश मौर्या एवं सिमरन कौर की गरिमामयी उपस्थिति रही। प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं को सभी अब्रजेश तिथियों ने सराहते हुए कामिनी बघेल को इस प्रदर्शनी के लिए बधाई दी। 


कामिनी बघेल, रमेश पचपांडे और राम अवस्थी 



बॉलीवुड कलाकार अशोक कुमार सरोज, ब्रजेश मौर्य, सिमरन कौर व अन्य अतिथि 





कामिनी बघेल और श्रीमती मेनन 


कामिनी बघेल की कला मुलरूप से स्त्रियों के संसार की कथा कहती है। इन कथाओं में स्त्रियों का पारिवारिक संसार है, उनकी रागात्मकता है, और साथ ही अपने परिवेश के साथ जुड़ाव बनाते हुए अपनी स्वतंत्र पहचान का संघर्ष भी है। वह ज्यादातर तेल रंग में काम करती हैं पर उसमें वह जिस तरह से पारदर्शिता और टैक्सचर का प्रयोग करती हैं वह उनकी कला को गहराई देता है। उनके यहाँ स्त्री अकेली कम दिखाई देती है। इसकी जगह वह उन्हें भरे पूरे संसार के साथ प्रस्तुत करती हैं। इस भरे पूरे संसार में मानवीय संबंधों के साथ ही वह पशु व पक्षियों के साथ उसके संबंध को भी रचती हैं। 




रचना शैली उनकी आकृति प्रधान है पर कहीं कहीं वह आकृतियों को धुंधला रखते हुए एक रहस्य की स्थापना करती हैं। आकृति को अस्पष्ट रखते हुए वह स्त्री की सामाजिक स्थिति की तरफ संकेत करती हैं।

कामिनी बघेल का काम इंसानी रिश्तों की एक संवेदनशील और लगातार खोज पर आधारित है, जिसे प्रकृति, परिवार और समाज के बड़े दायरे में देखा जाता है। उनकी पेंटिंग्स ज़िंदा अनुभव से निकलती हैं, जहाँ माँ और बच्चे, आदमी और औरत और दोस्ती के बीच के गहरे रिश्ते हमेशा रहने वाले दृश्य रूपक में बदल जाते हैं। इन रिश्तों को सिर्फ़ दिखाया ही नहीं जाता बल्कि महसूस भी किया जाता है, जिससे रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बनाने वाले भावनात्मक टेक्सचर का पता चलता है। कामिनी की प्रैक्टिस छोटे शहरों और ग्रामीण भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने में गहराई से जुड़ी हुई है। उनके चरित्र अक्सर औरतें होती हैं, जिन्हें शांत मज़बूती और खुद को समझने के साथ दिखाया जाता है। उनके ज़रिए, वह आज के समाज में औरतों की पहचान, अपनेपन और बदलती भूमिका पर सोचती हैं। उनके नज़रिए में ईमानदारी है - वह महानगर की मुश्किलों को दिखाने की कोशिश नहीं करतीं, बल्कि अपने माहौल के प्रति वफ़ादार रहना चुनती हैं। यह जुड़ाव उनके काम को असलीपन और इमोशनल क्लैरिटी देता है। सामान्य तौर पर, उनकी पेंटिंग्स सादगी और संयम से पहचानी जाती हैं। शानदार कलर हारमनी और छूने में अच्छी लगने वाली सतहें शांति का एहसास कराती हैं, जबकि संयोजन अक्सर यथार्थ और अमूर्तन के बीच संतुलन बनाता है । आकृति प्रधान रूपों के साथ अमूर्त या अमूर्त समान तत्वों की मौजूदगी एक उलझन की परत लाती है, जो देखी और अनदेखी चीज़ों के बीच एक हल्का अंतरसंबंध पैदा करती है। यह दोहरापन उनके काम को एक शांत रहस्य का एहसास देता है, जिससे देखने वाले को गहरा जुड़ाव मिलता है।

Saturday, April 4, 2026

माटी-।।। प्रदर्शनी में लोक व समकालीन कला का समन्वय


प्रदर्शनी रपट- डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज


दीपोत्सव के अवसर पर श्रीमती शांति देवी, श्री विनोद नारायण इंदुकर, 
श्री  विनोद भारद्वाज, श्री  संतोष श्रीवास्तव और श्री  जय त्रिपाठी।


विमला आर्ट फोरम की वार्षिक प्रदर्शनी माटी-।।। का उद्घाटन 3 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली की अर्पणा आर्ट गैलरी में हुआ। इस प्रदर्शनी में समकालीन कलाकारों के साथ ही लोक कलाकारों की कृतियों का प्रदर्शन भी किया गया है। इसके साथ ही इस प्रदर्शनी में कई देशों के कलाकारों के काम भी शामिल हैं। इस प्रदर्शनी की संयोजक श्रीमती कंचन मेहरा हैं और इसे क्यूरेट किया है कलाकार दिलीप शर्मा ने। यह प्रदर्शनी 9 अप्रैल तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी।

श्रीमती कंचन मेहरा व श्री जय त्रिपाठी दीप जलाते हुए। 


प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर मुख्य अतिथि विनोद नारायण इंदुकर ने भारतीय कला परम्परा का उल्लेख करते हुए 'रूपभेदः प्रमाणानि भावलावण्ययोजनम। सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्रं षडंगकम्।।' श्लोक के उदाहरण और उसकी व्याख्या के माध्यम से भारतीय कला दृष्टि का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय परम्परा में रूपभेद, प्रमाण, भाव, लावण्ययोजना, सादृश्य और वर्णिकाभंग यह षडंग दृश्य कला के शाश्वत आधार हैं। इस श्लोक की व्याख्या करने के साथ उन्होंने प्रदर्शनी के अवलोकन के अपने अनुभव को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। कला की इस प्रदर्शनी को देखते हुए उन्होंने पाया है कि इसमें कला के सभी छह अंग समाहित हैं। प्रत्येक कलाकार ने जिस सुंदरता और प्रभावशाली तरीके से रूप, प्रमाण, रंग, भाव, संयोजन आदि का पालन करते हुए अपने भावों और विचारों को प्रस्तुत किया है, वह प्रशंसनीय है। उन्होंने कला कि कला में कलाकार की अभिव्यक्ति के साथ ही देखने वालों की अनुभूति और प्रतिक्रिया को भी महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक दर्शक कला को देखते हुए उसे अपनी तरह से समझने और उस अनुभव को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होता है। उन्होंने एक तरह से इस बात को प्रमाणित किया कि कला में कलाकार के साथ ही दर्शक की सक्रिय भूमिका भी समान महत्व रखती है।







केएसकेटी के डायरेक्टर संतोष श्रीवास्तव ने अपने सम्बोधन में कहा कि कला ही मनुष्य को सभी जीवों में श्रेष्ठ व अलग प्रमाणित करती है। उन्होंने प्रदर्शनी के लिए विमला आर्ट फोरम को बधाई देते हुए कहा कि इसमें कलाकारों ने बहुत प्रभावशाली काम किए हैं। पदम् श्री शांति देवी ने अपनी कला यात्रा का वर्णन करते हुए बताया कि किसी तरह उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में काम करते राष्ट्रीय पुरस्कार और पदम् श्री तक का सफर पूरा किया। उन्होंने कहा कि पहली बार मुझे अपनी पेंटिंग के लिए 20 रुपए मिले थे। उन्होंने गाँव की दूसरी महिलाओं और लड़कियों को लोक कला करना सिखाया। 




वरिष्ठ आलोचक, कवि व फिल्मकार विनोद भारद्वाज ने प्रदर्शनी में लोक व आधुनिक कला को एक साथ प्रदर्शित करने की प्रशंसा करते हुए विमला आर्ट फोरम को इसके लिए बधाई दी। कला में सौन्दर्य की भूमिका और समकालीन कला की चर्चा करते हुए उन्होंने कई उदाहरणों देते हुए दोनों तरह की कला के बीच संबंध पर बल दिया। कलाकार व आलोचक जय त्रिपाठी ने एक अच्छे आयोजन के साथ वक्ताओं को कला पर सरगर्भित वक्तव्य के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि विमला आर्ट फोरम और इसकी संस्थापक ट्रस्टी कंचन मेहरा ने महत्वपूर्ण काम किया है। इस अवसर पर श्रीमती कंचन मेहरा ने सभी अतिथियों और कलाकारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विमला आर्ट फोरम की कोशिश रहती है कि सभी कलाओं को एक मंच पर लाया जाए। उन्होंने इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर व कलाकार दिलीप शर्मा की प्रशंसा करते हुए कहा कि सबके सहयोग से यह आयोजन हो सका है।

कलाकार रवि , अरबिंद कुमार, रागिनी सिन्हा, जय त्रिपाठी और बिपिन कुमार।



प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर इसमें शामिल कलाकारों के साथ ही अन्य वरिष्ठ कलाकार भी उपस्थित थे। इन अतिथियों में वरिष्ठ कलाकार धर्मेंद्र राठौर, नीरज शर्मा, रितु सिंह, रागिनी सिन्हा, नरेंद्र पाल सिंह, कलाकार व क्यूरेटर अनूप कामत, राजेश चंद, स्मिता जैन, शिखा गुप्ता अग्रवाल, कविता राजपूत, मीतू कपूर आदि शामिल थे। 



श्री विनोद भारद्वाज और श्रीमती कंचन मेहरा



“Space Between” - a space that is less seen and more felt

Exhibition Review/Dr Ved Prakash Bhardwaj




The exhibition “Space Between” presents, in a compelling and nuanced manner, the idea that within every work of art there exists a space between colour and form—a space that is less seen and more felt, less visible and more experiential. This is not merely a physical emptiness but a realm of meaning, sensation, and perception, where art reveals itself in its most intimate and essential form. Space Between is presented by Matters of Art and curated by Anoop Kamath. The exhibition is opened on 4th April and will continue until 9th April 2026 at The Stainless gallery, New Delhi.



paintings by Shobha Nagar



Paintings by Dr Vikram Kumar


Painting by Ritu Kamath

Paintings by Dr Ved Prakash Bhardwaj



Sculpture by Ashish Arora




In this intermediate space, all that remains unexpressed through colour, line, and form begins to find articulation. This is the domain of the unspoken—where the artist’s sensibility and the viewer’s experience enter into a subtle dialogue. In this sense, the space is not an absence but an active presence—a field charged with possibilities of meaning.

Paintings by Somya Satsangi


The 'empty' spaces between forms and compositions on canvas or paper are never truly vacant; they hold infinite potential, just as the void is never truly empty and silence resonates with unheard echoes. What transpires within them is not immediately visible; it must be perceived through sensitivity, intuition, and inner awareness.

Dr Ved Prakash Bhardwaj with his paintings.


In poetry, the intervals between words play a crucial role in the construction of meaning—pauses, silences, and moments of stillness themselves become a form of language. A similar phenomenon occurs in visual art, as well as in theatre and music, where silence and pause carry expressive weight. Thus, the space between is not merely a structural element; it is also a powerful medium of meaning and experience. Often, it is this very space that becomes more profound and evocative than the areas that appear visibly occupied.



The works included in this exhibition—both figurative and abstract—explore and articulate these interstitial spaces in diverse and distinctive ways. Each artist, through their own sensibility and artistic vision, lends a unique dimension and interpretation to this 'space'.

Shobha Nagar’s works engage with layers of memory, filling these intervals in a way that suggests a dialogue between past and present, evoking a sense of wholeness in lived experience. Soumya Sugandhi’s paintings reflect an attempt to bridge emotional voids, where colour itself becomes a carrier of feeling.



Ritu Kamath, through her renderings of natural landscapes, especially flowers, presents visual beauty and seems to bridge the subtle gap between emotion and the material world. In Dr. Ved Prakash Bhardwaj's work, what is not said or heard in the expression resonates like an echo, suggesting that the image continues to speak even when it is silent.

Dr Vikram Kumar creates a unique space through the confluence of folk and contemporary artistic traditions, transforming cultural intervals into sites of creative energy. Ashish Arora’s sculptural works appear to bridge the distance between history and the present, where time itself becomes a medium of expression.

Sculpture by Ashish Arora

The works of Dolly Dhillon, Sangam Peshawaria, and Vandana Krishna seek to articulate that which remains unexpressed between the physical and emotional dimensions of human existence. In their practice, the 'space between' emerges as a site of complex human experience—where both word and form fall short, and yet meaning persists.

Ultimately, “Space Between” is not merely an exhibition but a proposition for a new way of seeing, understanding, and experiencing art—one that invites us to engage not only with what is visible but also with the silent, the empty, and the unseen dimensions that lie in between.