जोसेफ मैलॉर्ड विलियम टर्नर (1775-1851) की ख्याति ऐसे कलाकार के रूप में रही है जिन्होंने जल के शांत और उद्विग्न प्रवाह, हवा की मंथर व तीव्र गति के साथ ही विस्तृत परिदृश्य अवलोकन में आकाश और पृथ्वी की परिवर्तित रूपाकार स्थिति और विभिन्न संरचनाओं पर वातावरण के प्रभाव को रचा। उनके परिदृश्य चित्र, जिनमें जड़ और चेतन, दोनों की उपस्थिति रही है, स्थिर होते हुए भी गति का प्रभाव उत्पन्न करते हैं। लगभग अमूर्त की तरह दिखाई देने वाली उनकी रचनाओं में यथार्थ की गहन छवि के दृश्यात्मक प्रभाव की गहरी खोज दिखाई देती है। टर्नर को उनके तैल चित्रों के लिए जाना जाता है परंतु उनमें भी उन चित्रों का अत्यधिक महत्व है जिनमें तैल रंग को उन्होंने जल रंग जैसे प्रभाव के साथ इस्तेमाल किया है। भूदृश्य चित्रण में यह उनकी अलग पहल थी जिसे उनके जलरंग प्रेम ने नया आयाम दिया।
टर्नर ने अपनी कला यात्रा की शुरुआत में इंग्लैंड
के भूदृश्यों, विशेषरूप से ऐतिहासिक स्थलों, भवन संरचनाओं पर केंद्रित चित्र रचने
पर अधिक ध्यान दिया। 29 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी खुद की आर्ट गैलरी स्थापित
कर ली थी। टर्नर की कला शुरु में मानव रचित
संरचनाओं, वास्तुकला आदि पर केंद्रित रही पर जल्दी ही उन्होंने यह निष्कर्ष निकाल
लिया था कि मनुष्य के जीवन में प्रकृति सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसीलिए उन्होंने
प्रकृति की शक्ति और उसके रहस्य को अपनी रचनाओं में खोजना शुरु किया। रोशनी, आग,
पानी की शांत व चंचल लहरें, वायु के शीतल व तीब्र झोंके, कोहरा, तूफान आदि उनकी
कला के विषय बन गये। वह मानते थे कि प्रकृति दिव्य भी है और भयानक भी। शुरु में वह
बारीक से बारीक विवरण पर ध्यान देते थे पर धीरे-धीरे उन्होंने सूक्ष्म विवरणों की
जगह वातावरण के चरित्र में अधिक दिलचस्पी दिखानी शुरु की। इससे उनकी रचनाओं में
अमूर्तन जैसा प्रभाव मुख्य होता चला गया। वह चित्र में रौशनी के विभिन्न प्रभावों और चटख रंगों को अधिक महत्व देने लगे।
हम जिस दुनिया में रहते हैं, वह बहुअयामी है। इसके सभी आयामों को देख और समझ पाना अभी भी मनुष्य के लिए एक चुनौती है। एक ही वस्तु या दृश्य को लेकर मानवीय अनुभूतियों और अभिव्यक्ति में विविधता यह प्रमाणित करती है कि इस संसार को, और उसमें मानव जीवन को समग्रता में एक रेखीय परिप्रेक्ष्य में समझना असम्भव है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि कला की दुनिया में एक ही दृश्य को, एक ही स्थिति को कलाकारों ने अलग अलग तरह से अभिव्यक्त किया है। समुद्र या नदी का कोई दृश्य एक कलाकार के लिए अलग है तो दूसरे के लिए अलग। कलाकार की अपनी दृष्टि, अपने अनुभव उसकी रचना की दिशा और दशा तय करते हैं। जेएमडबल्यू टर्नर की कला में भी हमें यह देखने को मिलता है। वास्तुशास्त्रीय संरचनाओं से शुरुआत करते समय वह देखे हुए प्रत्यक्ष अनुभव के संरचनात्मक रूप तक सीमित थे। इस सीमित रूप में उन्होंने जीवन को रेखांकित किया। पर बाद में उनकी कला दृष्टि रूप से अरुप की तरफ चली गई। जो दिखाई दे रहा है से अधिक वह जो दिखाई नहीं दे रहा है, वायु, प्रकाश का प्रभाव, जल का अस्थिर चरित्र, परिप्रेक्ष्य के अनुसार पदार्थ जगत का बदलता रूप, और उसके बदलते प्रभाव को उन्होंने आत्मसात किया।
एक नई खोज यहाँ से शुरू हुई
जिसमें वह यथार्थ के जड़ रूप की जगह चेतन रूप को देखने और दिखाने लगे। इस चेतन रूप
में मनुष्य पूरी तरह अनुपस्थित नहीं हुआ। बहुसंख्यक रचनाओं में वह हमें संघर्ष
करता दिखाई देता है, कभी नाविक के रूप में तो कभी यात्री के रूप में, तट पर इंतजार करते, कुछ खोजते से प्रतीत होते मानव आकार। यह आकार टर्नर की चित्र भाषा में
परिदृश्य का, वातावरण का हिस्सा बन जाते हैं, उसमें घुलते प्रतीत होते हैं। यहाँ मानवीय संघर्ष
और सपने प्रकृति के संघर्ष के साथ एक हो जाते हैं। शांत और तीव्र हवा हो या पानी
का भाव, कोहरा हो या धुंधला होता जाता कोई रूप, यह सब टर्नर के काम को उस समय के भौतिक जगत से
जोड़ता है। उनके समय में औद्योगिक क्रांति के कारण उपजे सामाजिक और सांस्कृतिक
संकटों का कोई कथात्मक चित्र नहीं है। पर जो है, वह यथार्थ से अलग नहीं है।
उनकी रचनाओं में दूर से आती प्रकाश की किरण, पानी पर उसकी झिलमिलाती छवि, सूर्य की उपस्थिति, दूर से आते, हिचकोले खाते जहाज यह सब उस समय के यथार्थ के कुछ आयामों की तरफ संकेत करते
हैं।
चालीस वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते, टर्नर ने खुद को एक ऐसे कलाकार के रूप में स्थापित कर लिया था जो नव-शास्त्रीय
शैली के उस्ताद होने के साथ-साथ नए रोमांटिक आंदोलन के एक प्रमुख प्रतिनिधि भी थे—परिदृश्यों, समुद्री दृश्यों, रूपकात्मक और ऐतिहासिक दृश्यों के एक शानदार चित्रकार। 1819 में, टर्नर ने वेनिस की अपनी कई यात्राओं में से एक के दौरान, जलरंग चित्रों की एक ऐसी
श्रृंखला पर काम किया जिसने उनकी कला पर दूरगामी प्रभाव डाला। इस चित्र श्रृंखला
के रचने के दौरान उन्हें अहसास हुआ कि जलरंग जैसा प्रभाव तैलरंग में भी प्राप्त
किया जा सकता है।
कला इतिहासकारों के अनुसार टर्नर ने तैलरंग में जलरंग वाले प्रभाव को अर्जित तो कर लिया था परंतु कला प्रेमी उसे स्वीकार करेंगे या नहीं, इसे लेकर वह दुविधा में थे। परिणाम यह हुआ कि उन्होंने अपने जलरंग चित्रों सहित बाद के चित्रों की रॉयल एकेजमी में प्रदर्शनी लगाना बंद कर दिया था। इसका उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ा।
-डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज











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