कला विचारः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
परमजीत सिंह आधुनिक भारतीय कला के प्रमुख कलाकार हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकृति के सौंदर्य और उसके देखे-अनदेखे पहलुओं को देखने व खोजने की एक नई दृष्टि दी है। वडेहरा आर्ट गैलरी द्वारा आयोजित उनकी एकल प्रदर्शनी भौगोलिक सीमांत (𝘓𝘪𝘮𝘪𝘯𝘢𝘭 𝘎𝘦𝘰𝘨𝘳𝘢𝘱𝘩𝘪𝘦𝘴) 27 फरवरी से 3 मार्च, 2026 तक नई दिल्ली के बीकानेर हाउस की मेन गैलरी में हुई। यह प्रदर्शनी वडेहरा आर्ट गैलरी, डिफेंस कालोनी, नई दिल्ली में 6 मार्च 2026 से उपलब्ध रहेगी।
प्रकृति अपने
स्वभाव में विविधता और रूपगत पूर्णता के साथ उपस्थित रहती है। वह एक साथ दृश्य और
अदृश्य, ठोस और तरल, प्रकाश और छाया, विस्तार और
रिक्ति का संगम है। प्रकृति के दो सीमांतों के बीच स्थिर दृश्य का चित्रण पेंटिंग
में होता है पर उस स्थिर दृश्य में भी एक गति होती है। स्थिरता में हलचल का यह
आभास परमजीत सिंह जैसे कलाकार के रचना संसार को महत्वपूर्ण बनाता है। अधिकांश
कलाकार जब भूदृश्य रचते हैं, तो वे प्रकृति के प्रत्यक्ष, दृश्य और भौतिक
रूप को केंद्र में रखते हैं—पेड़ों, आकाश, जल, क्षितिज और रंग-संयोजन के माध्यम से वे एक
स्थल-विशेष का आभास निर्मित करते हैं। किंतु परमजीत सिंह उन विरल कलाकारों में हैं
जो प्रकृति के सीमांत क्षेत्र को अपना विषय बनाते हैं। यह सीमांत क्षेत्र नहीं है,
कोई भौगोलिक सीमा नहीं है; यह दृश्य में उपस्थित भाव, स्मृति और
अनुभूति का वह प्रदेश है जहाँ दृश्यात्मक अनुभव आंतरिक स्पंदन में परिवर्तित हो
जाता है। स्थिर भू-दृश्य को रंगों के प्रत्यावर्तन और प्रकाश व छाया के खेल से वह
स्थिर नहीं रहने देते।
उनके चित्रों
में प्रकृति का उजास चकाचौंध पैदा नहीं करता, बल्कि एक मद्धिम, आत्मीय आलोक में प्रस्फुटित होता है। यहाँ
प्रकृति दृश्य-सौंदर्य का प्रदर्शन नहीं करती; वह आत्मसंवाद का माध्यम बनती है। दर्शक जब उनके
कैनवास के सामने खड़ा होता है, तो वह किसी विशिष्ट स्थल पर नहीं, बल्कि एक मानसिक
क्षेत्र में उपस्थित होता है। एक मानसित क्षेत्र जो कल्पना और यथार्थ से एकसाथ
संवाद करता है, जिसमें प्रकृति के सादृश्य रुपों की विपुलता के बोध के बीच एकांत
उपस्थित रहता है, जहां मौन एक संवाद है, और आंतरिक शांति जिसमें
अदृश्य हलचलें प्रकृति के निरंतर परिवर्तित स्वरूप को दर्शाती हैं। उनकी पेंटिंग्स
सिर्फ दृश्य नहीं हैं, एक संकेत है, एक मौन संवाद है।
प्रकाश और छाया
का आत्मीय व्याकरण
परमजीत सिंह की
कला में प्रकाश और छाया केवल तकनीकी तत्व नहीं हैं; वे संरचना के दार्शनिक आयाम हैं। प्रकाश यहाँ
किसी क्षणिक चमक का संकेत नहीं देता, बल्कि वह समय की गहराई का वाहक है। छाया दृश्य
को ढँकती नहीं, बल्कि उसे विस्तार देती है। यह अंतःक्रिया दृश्य को उसके प्रत्यक्ष यथार्थ से
अलग एक दूसरे स्तर पर स्थापित कर देती है—जहाँ बाह्य वस्तु का अस्तित्व उसके आंतरिक अर्थ
में रूपांतरित हो जाता है। इससे उनकी रचनाओं में एक तरह की नाटकीयता जन्म लेती है।
घने जंगलों की दुनिया में किसी एक जगह पर प्रकाश का प्रभाव या प्रकाशित मार्ग की
अनुभूति, या पेड़ों के बीच से झांकता प्रकाशित आकाश, कहीं घने पेड़ों के बीच से
आलोकित होता कोई एक अलग रंग, यह सब परमजीत सिंह की कला को रहस्यमय बनाता है, और
शायद यही उनकी कला का सौंदर्य है कि वह सिर्फ सुंदर नहीं है, अनुभव नहीं है, वह
चेतना का विस्तार भी है। उनकी एकल प्रदर्शनी, भौगोलिक सीमांत (𝘓𝘪𝘮𝘪𝘯𝘢𝘭 𝘎𝘦𝘰𝘨𝘳𝘢𝘱𝘩𝘪𝘦𝘴) में प्रकाश और छाया की चंचल गतिशीलता अपेक्षाकृत कम
है, उसकी जगह स्थिरता अधिक दिखाई देती है। वडेहरा आर्ट गैलरी द्वारा आयोजित यह
प्रदर्शनी 27 फरवरी से 3 मार्च 2026 तक बीकानेर हाउस में और उसके बाद 6 मार्च से
वडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली में रहेगी। उनकी नई रचनाओं में वैसा आलोड़न नहीं है
जो पहले हुआ करता था। इन चित्रों को देखकर किसी संत की संयमित और स्थिर साधना का
बोध होता है, जैसे कोई गायक एक सुर पर स्थिर हो गया है। यहाँ कोई तीव्र नाटकीयता नहीं, कोई आकस्मिक
झिलमिलाहट नहीं; बल्कि एक संयत, स्थिर और ध्यानपूर्ण आलोक है। यह स्थिरता दृश्य
को कालातीत बनाती है। ऐसा लगता है जैसे समय ने स्वयं को विराम दे दिया हो और दृश्य
किसी आंतरिक शांति में स्थिर हो गया हो।
परतों का शिल्प
और गहराई की संरचना
परमजीत सिंह की रचना-प्रक्रिया
बहुस्तरीय है। वे कैनवास पर अनेक परतों में कार्य करते हैं—रंग की
पारदर्शिता, अपारदर्शिता, मद्धिमता और उजास के सूक्ष्म संतुलन के साथ। यह
परत-दर-परत निर्मिति चित्रों में केवल भौतिक गहराई नहीं लाती; यह अनुभव की
गहराई भी रचती है। दर्शक जब चित्र को देखता है, तो उसकी दृष्टि सतह पर नहीं रुकती; वह भीतर उतरती
जाती है।
यह विधि स्मृति
की संरचना से मिलती-जुलती है। जैसे स्मृतियाँ एक-दूसरे पर आच्छादित होती हुई
वर्तमान अनुभव को आकार देती हैं, वैसे ही विभिन्न रंगों की परतें दृश्य को उसके
अंतिम रूप तक पहुँचाती हैं। परिणामस्वरूप, चित्र केवल एक दृश्य नहीं रहता—वह एक मानसिक
परिदृश्य (mental landscape) बन जाता है।
प्रकृति का
आध्यात्मिक आयाम
परमजीत सिंह की रचनाओं
में मानव की अनुपस्थित के बाद भी उसकी उपस्थिति का आभास बना रहता है। यह
अनुपस्थिति उनकी कला का एक महत्वपूर्ण वक्तव्य है। यहाँ मनुष्य प्रकृति पर आधिपत्य
स्थापित करने वाला प्राणी नहीं, बल्कि उसके मौन विस्तार में विलीन एक चेतना है।
यह दृष्टि समकालीन समय की प्रकृति में हस्तक्षेपकारी प्रवृत्तियों के विपरीत एक
संतुलित, विनम्र और
आत्मसंयत दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
उनकी रचनाएँ
किसी विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक वक्तव्य का प्रत्यक्ष उद्घोष नहीं करतीं, परंतु वे एक
गहरी सांस्कृतिक संवेदना का संकेत अवश्य देती हैं—जहाँ प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव की
भूमि माना जाता है।
परमजीत सिंह के
भूदृश्य दृश्य-यथार्थ के पुनरुत्पादन से आगे बढ़कर अनुभूति के आंतरिक भूगोल का
मानचित्र तैयार करते हैं। वे प्रकृति को देखने का एक ऐसा तरीका प्रस्तुत करते हैं, जिसमें दृश्य और
अदृश्य, प्रकाश और छाया, स्थिरता और
गतिशीलता, सतह और गहराई—सभी मिलकर एक ध्यानात्मक अनुभव रचते हैं।
उनकी कला हमें
यह याद दिलाती है कि प्रकृति का सीमांत बाहर नहीं, भीतर है। उसे देखने के लिए आँख से अधिक संवेदना
की आवश्यकता है। और शायद यही उनकी कृतियों की सबसे बड़ी उपलब्धि है—वे दर्शक को
केवल देखने नहीं, बल्कि ठहरकर अनुभव करने के लिए आमंत्रित करती
हैं।
सभी चित्र वडेहरा आर्ट गैलरी के सौजन्य से साभार।






































