Tuesday, April 14, 2026

प्रेम सिंह की ड्राइंगः डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज


प्रेम सिंह


प्रेम सिंह की कला-यात्रा की जड़ें पंजाब के उनके गाँव और घरेलू परिवेश में गहराई से निहित हैं। यह प्रारंभिक अनुभव-संसार उनके कार्यों में केवल विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनात्मक आधार-भूमि के रूप में उपस्थित रहता है। उनके शुरुआती चित्रों में ग्रामीण स्त्रियाँ, उनके श्रम, उनकी दिनचर्या और उनके आसपास का सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण एक जीवंत यथार्थ के रूप में उभरता है। यह यथार्थवादी दृष्टि समय के साथ केवल दृश्य-चित्रण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक संरचनाओं की अंतर्ध्वनियों को भी अभिव्यक्त करने लगती है। इसे उनकी बाद की अमूर्त पेंटिंग्स में भी देखा जा सकता है जिनमें अमूर्तन को अपनाते हुए उन्होंने रौशनी की चपल छवियों को रंगों में व्यक्त किया। रौशनी की इन चपल छवियों का एक संबंध पंजाब के ग्रामीण परिवेश में खेतों में लहलहाती फसलों और हवा के साथ बिखती उनकी चमक से भी देखा जा सकता है।



पेंटिंग के समानांतर प्रेम सिंह ने ड्रॉइंग को एक स्वतंत्र और स्वायत्त अभिव्यक्ति-माध्यम के रूप में विकसित किया है। उनकी लगभग साठ वर्षों की सतत साधना में रची गई हजारों ड्रॉइंग्स इस बात का प्रमाण हैं कि उनके लिए ड्रॉइंग केवल प्रारूप (स्केच ) नहीं, बल्कि विचार और संवेदना की एक पूर्ण और परिपक्व अभिव्यक्ति है। इन ड्रॉइंग्स में एक प्रकार की तात्कालिकता, सहजता और आंतरिक आवेग दिखाई देता है, जो कई बार पेंटिंग्स की अपेक्षा अधिक प्रत्यक्ष और तीव्र हो उठता है। उनकी चुनिंदा ड्राइंग्स की एक महत्वपूर्ण प्रदर्शनी 15 अप्रैल 2026 को दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम स्थित आर्ट पिलग्रिम गैलरी में हो रही है। इस प्रदर्शनी में उनकी 1984 के दंगों की त्रासदी पर अनेक ड्राइंग्स हैं जिनमें दंगों में स्त्रियों की वेदना के माध्यम से वह मानवीय वेदना को स्वर देते हैं। इन ड्राइंग्स में राजनीतिक और प्रशासनिक विफलताओं पर कटाक्ष भी है। इस प्रदर्शनी में उनकी शुरुआती दौर से लेकर वर्तमान तक की ड्राइंग्स शामिल हैं।



उनकी ड्रॉइंग्स का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्त्री-संसार का निरंतर और बहुस्तरीय चित्रण है। यहाँ स्त्री केवल एक दृश्य आकृति नहीं, बल्कि एक सामाजिक उपस्थिति है—जिसकी भूमिका, सीमाएँ, संघर्ष और मौन, सभी एक साथ प्रकट होते हैं। विशेष रूप से चेहरों को ओझल रखना एक महत्त्वपूर्ण औपचारिक और वैचारिक रणनीति के रूप में उभरता है। यह ओझलपन स्त्री की व्यक्तिगत पहचान के मिट जाने का संकेत भी हो सकता है, और साथ ही उसे एक सार्वभौमिक प्रतीक में रूपांतरित करने का प्रयास भी। इस तरह कलाकार व्यक्तिगत और सामूहिक के बीच एक जटिल संवाद स्थापित करता है।



उनकी रेखाओं का स्वरूप—गहरी, मोटी और गतिशील—केवल आकृति-निर्माण का साधन नहीं, बल्कि भाव और ऊर्जा का वाहक है। इन रेखाओं में एक प्रकार की बेचैनी, तनाव और गति है, जो चित्रित विषय की आंतरिक स्थिति को उजागर करती है। स्त्रियों के वस्त्रों पर दिया गया विशेष ध्यान केवल सौंदर्यपरक नहीं, बल्कि सामाजिक संकेतों से भी जुड़ा हुआ है—वस्त्र यहाँ पहचान, स्थिति और सांस्कृतिक संदर्भों के प्रतीक बन जाते हैं।



स्त्री-केंद्रित रचनाओं के साथ-साथ प्रेम सिंह की ड्रॉइंग्स में व्यापक सामाजिक, राजनीतिक और व्यवस्थागत संकटों का भी सशक्त और तीखा चित्रण मिलता है। यहाँ कलाकार एक सजग साक्षी के रूप में सामने आता है, जो अपने समय की विडंबनाओं, विसंगतियों और असंतुलनों को दर्ज करता है। कई रचनाओं में व्यंग्य का स्वर उभरता है, जो न केवल आलोचनात्मक दृष्टि को प्रखर बनाता है, बल्कि दर्शक को भी आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित करता है।



कोविड लॉकडाउन के दौरान निर्मित उनकी इंक और कोलाज आधारित ड्रॉइंग्स इस बात का उदाहरण हैं कि कलाकार बदलती परिस्थितियों के साथ अपने माध्यम और भाषा को भी रूपांतरित करता है। इन कार्यों में मनुष्य की मानसिक और भावनात्मक अवस्थाओं—एकांत, भय, अनिश्चितता और विखंडन—का गहन और संवेदनशील चित्रण मिलता है। कोलाज का प्रयोग यहाँ विखंडित यथार्थ को व्यक्त करने का एक सशक्त उपकरण बन जाता है।



प्रेम सिंह स्वयं कहते हैं—“मेरे लिए कला अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह मेरे भीतर की आवाज़ को एक दृश्य रूप देती है।” इस ‘भीतर की आवाज़’ की संरचना बहुस्तरीय है—इसमें उनके बचपन का पंजाब, ग्रामीण जीवन के अनुभव, और साथ ही 1984 के दंगों की त्रासद स्मृतियाँ भी शामिल हैं, जब सिख समुदाय को हिंसा का सामना करना पड़ा था। इस प्रकार उनकी कला केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि स्मृति, इतिहास और सामाजिक यथार्थ के अंतर्संबंधों का एक जटिल ताना-बाना बन जाती है।



इस परिप्रेक्ष्य में प्रेम सिंह की ड्रॉइंग्स को एक ऐसी दृश्य-भाषा के रूप में देखा जा सकता है, जो अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु का कार्य करती है। यह सेतु केवल स्मरण का नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन, पुनर्समीक्षा और पुनर्निर्माण का भी है—जहाँ कलाकार अपने अनुभवों को पुनः देखता, परखता और उन्हें एक नए अर्थ-क्षेत्र में रूपांतरित करता है। 





Monday, April 13, 2026

International Painters’ Camp: Negotiating Space, Memory, and Material



In the shifting terrain of contemporary art practices, artist camps have increasingly emerged as sites of critical exchange—spaces where artistic production extends beyond the solitude of the studio into a shared, discursive environment. The International Painters’ Camp 2026, hosted by the Krishna Setty Foundation, Bengaluru, from March 28 to April 1 at Nature Knots, exemplified such a convergence. Bringing together eighteen artists across diverse geographies, the camp unfolded within a temporally bound yet conceptually expansive framework.

Jatin Das


Set amidst the serene and verdant surroundings of Nature Knots, the venue itself became a vital collaborator. Its natural beauty offered a befitting context, enabling artists to engage deeply with space, materials, and the environment, transforming the camp into an evolving creative ecosystem.



Artistic Dialogue and Participation

At the core of this constellation was Jatin Das, the Padma Bhushan awardee, whose presence functioned as both anchor and axis. His engagement extended beyond the creation of significant works to a form of embodied knowledge transmission, where process, discipline, and intuition intersected.

Krishna Shetty, Jatin Das, Mamta Bora, Ganapathi S. Hegde and other artists


Equally significant was the participation of veteran artist Krishna Setty C.S., who, in addition to being an active artist in the camp, played a pivotal role as the organiser. His vision and professional approach ensured that the camp unfolded seamlessly, fostering both artistic freedom and structural coherence.



The international dimension of the camp was articulated through artists such as Clemens B. Sou (Austria), Julia Chubutkina (Kazakhstan), Achala Gunawardhana, Sudath Abeysekara (SriLanka), and P. Gnana (Singapore). Alongside them, artists including Kariyappa Hanchinamani, Basuki Dasgupta, Rama Suresh, Vijay Dhore, K.K. Gandhi, Praveen Kumar, Mintu Deka, Prabhu Harasur, Madan Lal, Kandan G., G. Subramanian and Krishna Setty contributed to a diverse and dynamic field of practices. Together, they engaged with questions of memory, materiality, identity, and spatial negotiation.

Chitra Parishe and Public Engagement

The convergence expanded further during the one-day Art Mela, Chitra Parishe, held on March 29 and inaugurated by Jatin Das. With the participation of over 120 artists from Karnataka and other states, the event dissolved boundaries between the camp and the public, creating a vibrant and inclusive space for artistic exchange.



Live art interventions by Dimple B. Shah, Jeetin Ranger, Monica Nanjunda, Shivaprasad K.T., Smitha Cariappa, and Sridhara T. Gangolli activated the landscape through performative gestures. An added attraction was the graceful dance performance by Roopa Ravindran, which inspired spontaneous sketching sessions by artists at the camp site, creating a dynamic interplay between movement and visual expression.

Interdisciplinary Evenings and Exhibition

The evenings further enriched the camp’s interdisciplinary spirit. The world fusion music performance Svara, led by Martin Dubois from France and his ensemble, offered an immersive sonic experience, complemented by contemporary fusion dance performances by Shweta Vinyas and Niranjan.

The works created during the camp were later exhibited at Dwija Art Gallery, Bengaluru, from April 17 to 26, extending the dialogue into a public exhibition format and attracting significant engagement from visitors.

Closing Ceremony and Acknowledgements

The camp concluded with a closing ceremony on April 1, where all participating artists were felicitated and presented with a beautifully crafted bronze memento, marking the culmination of an enriching artistic journey.

The successful coordination of the camp was ensured by Ganapathi S. Hegde, Ganesh Doddamani, and Mamta Bora, whose dedicated efforts facilitated the smooth execution of the event.

In its totality, the International Painters’ Camp 2026 resisted closure. It remained open-ended—an accumulation of encounters, negotiations, and transformations—proposing not unity, but coexistence as its central ethos: a field where difference is not resolved, but sustained. ---

Mamta Bora

Saturday, April 11, 2026

गोरा प्रदर्शनीः लोक की आभा और आधुनिकता

 प्रदर्शनी विचार- डॉ.  वेद प्रकाश भारद्वाज


प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर कलाकारों को संबोधित करते डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज

कलाकारों को संबोधिक करते डॉ. चिंतामनी कर


समकालीन कला परिदृश्य में हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति उभरकर सामने आई हैलोक परंपराओं और आधुनिकता के बीच एक नए संवाद का निर्माण। यह सहभागिता केवल शैलीगत समन्वय नहीं है, बल्कि संवेदनाओं, प्रतीकों और सांस्कृतिक स्मृति की गहरी पुनर्व्याख्या है। आधुनिक कलाजिसे कभी उसकी शहरी और वैश्विक प्रवृत्तियों के कारण लोक जीवन से दूर माना जाता थाअब उन्हीं जड़ों से पुनः ऊर्जा और प्रेरणा प्राप्त कर रही है। यह परिवर्तन केवल भारत तक सीमित नहीं है; विश्वभर में पारंपरिक लोक रूपों का पुनरावलोकन और पुनर्पाठ किया जा रहा है, जिससे आधुनिक कलात्मक प्रक्रियाओं को नया अर्थ और दृष्टि मिल रही है।


राखी गुप्ता की रचना


भारतीय संदर्भ में यह संवाद विशेष महत्व रखता है। देश की लोक परंपराएँ न केवल प्राचीन हैं, बल्कि अत्यंत विविधतापूर्ण भी हैं, जो सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की एक जीवंत निरंतरता प्रस्तुत करती हैं। इसी समृद्ध विरासत के आधार पर छत्तीसगढ़ प्रगतिशील कलाकार समूह द्वारा आयोजित गोराप्रदर्शनी एक सशक्त पहल के रूप में सामने आती है। यह केवल कलाकृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि एक सक्रिय मंच है जहाँ लोक परंपराएँ और समकालीन कलात्मक अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं और विकसित होती हैं। इसका प्रमाण प्रदर्शनी में शामिल कुछ रचनाओं में मिलता है जिनमें कलाकारों ने लोक कलाओं की परंपरा से संवाद किया है, साथ ही अपनी रचनाओं में लोक संस्कृति को स्थान दिया है। इस दृष्टि से सुनीता वर्मा, केशव राम, डॉली सर्वा, प्रीति सोनी, सुभांगी सिंह ठाकुर, पूनम चक्रधारी आदि के काम उल्लेखनीय हैं।

डॉली सर्वा की रचना 

डॉ. तरुणा माथुर की रचना


श्यामा शर्मा की रचना


गोराशीर्षक स्वयं अनेक अर्थों से परिपूर्ण है। यह एक ओर दिव्य स्त्री शक्ति (शक्ति) का आह्वान करता है, तो दूसरी ओर भगवान शिव की आदिम शक्ति का संकेत भी देता है। छत्तीसगढ़ की जनजातीय समुदायों का गोरा-गोरी पर्वजिसमें शिव और पार्वती के अमूर्त रूप गोबर से निर्मित कर पूजा की जाती हैइस प्रदर्शनी की अवधारणा का केंद्र है। यह परंपरा एक महत्वपूर्ण तथ्य को उजागर करती है कि अमूर्तन केवल आधुनिकतावाद की देन नहीं, बल्कि लोक अभिव्यक्ति का एक प्राचीन और स्वाभाविक अंग है।

केशव राम की रचना


अनिल खोबरगड़े की रचना


पोडियाम रवि का शिल्प


देशभर से करीब एक सौ कलाकारों की भागीदारी इस प्रदर्शनी की व्यापकता को दर्शाती है। इस प्रदर्शनी का विचार अवश्य स्थानीय है पर छत्तीसगढ़ प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संस्थापक कलाकार जितेन साहू और प्रदर्शनी के क्यूरेटर कलाकार डॉ. ध्रुव तिवारी ने इस प्रदर्शनी को व्यापक बनाते हुए देशभर से कलाकारों को आमंत्रित किया है। प्रदर्शनी में चित्रकला, ग्राफिक, रेखांकन और मूर्तिकला जैसे विविध माध्यमों के माध्यम से प्रस्तुत कृतियाँ एक उत्सवधर्मी दृश्य भाषा का निर्माण करती हैं। रूप, रंग और बनावट का समृद्ध संयोजन एक उत्सव का वातावरण रचता है, जबकि प्रतीकात्मकता इन सभी को जोड़ने वाला सूत्र बनती है। यही प्रतीकात्मक भाषा आधुनिक कला की अभिव्यक्ति और लोक परंपराओं की सहजता के बीच सेतु का कार्य करती है। यह उत्सव का वातावरण और संबंधों की ऊर्जा प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर 10 अप्रैल 2026 को देखने को मिली। प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार चिंतामनी कर और कलाकार डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज अतिथि थे। श्री कर ने अपने संबोधन में कला में संवेदना, अनुभूति और अभिव्यक्ति की बात करते हुए कहा कि कला एक कलाकार व्यक्तिगत रुप से करता अवश्य है पर उसकी कला सबके लिए होती है। कला सबसे संवाद करती है, और सबकी हो जाती है। कला एक तरह से व्यष्टि से समष्टि में रूपांतरित हो जाती है। कलाकृति में प्रत्येक दर्शक स्वयं को तलाश करता है। इस अवसर पर डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज ने कला में देखने के महत्व पर बल देते हुए कहा कि प्रत्येक कलाकार की कला का समाज बनाने, उसका वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कला को देखने के लिए, उसे आत्मसात करने के लिए दृश्य में जो दिख रहा है, उससे हट कर जो नहीं दिख रहा है, उसे देखना चाहिए। इस अवसर पर कलाकारों के अलावा बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित थे।

डॉ. ध्रुव तिवारी की रचना

जितेन साहू की रचना

रविकांत झा की रचना


प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं से यह स्पष्ट हो गया है कि संयोजक डॉ. ध्रुव तिवारी ने वैचारिक एकता और कलात्मक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित किया है। प्रदर्शनी में शामिल रचनाकारों में रविकांत झा, राजीव सेमवाल, शैलेंद्र साहू, ड़ा, वेद प्रकाश भारद्वाज, राजेश रावत, मोहन बराल, रीना, चौधरी, रत्ना शिवयोगी आदि का काम बहुआयामी भारतीय कला के वर्तमान परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करता कहा जा सकता है। गोराकी थीम को बनाए रखते हुए, प्रत्येक कलाकार को अपनी तरह से इस विचार को आत्मसात और व्यक्त करने की स्वतंत्रता दी गई है। परिणामस्वरूप, कृतियाँ मूर्त और अमूर्त, व्यक्तिगत और सामूहिक के बीच विचरण करती हुई एक बहुस्तरीय और गहन दृश्य अनुभव प्रस्तुत करती हैं। यह विविधता इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। प्रदर्शनी में राहुल रुंजे के टेराकोटा के शिल्प और पोडियाम रवि के लकड़ी के शिल्प एक नया अनुभव जोड़ते हैं।

राहुल रुंजे के शिल्प

हर्षिता नामदेव की रचना

पूनम चक्रधारी की रचना


इस प्रदर्शनी के मूल में शिवत्व का दार्शनिक तत्व निहित हैशिव का वह स्वरूप जो साकार और निराकार, सृजन और संहार, रूप और अरूपसभी का समावेश करता है। जनजातीय मान्यताओं में गोराकेवल एक रक्षक ही नहीं, बल्कि जीवन्तता और आनंद का प्रतीक भी है। लोक मान्यताओं में ग्राम देवता की अवधारणा भी इसी प्रकार की है जिसे कलाकार केशव राम ने अपनी पेंटिंग्स में प्रस्तुत किया। लोक परिदृश्य में छत्तीसगढ़ के नैसर्गिक सौंदर्य का अपना महत्व है जिसे जितेन साहू, डॉ. ध्रुव शुक्ल, डॉ. तरुणा माथुर, प्रीति सोनी सहित कई कलाकारों के काम में देखा जा सकता है। सुनीता वर्मा ने गोरी-गोरा की अवधारणा बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है। इस तरह हम पाते हैं कि प्रदर्शनी में लोक परंपराओं और आधुनिकता में सहअस्तित्व को प्रभावशाली तरीके से व्यक्त किया गया है। प्रदर्शित रचनाएँ इस बात को प्रभावी तरीके से सामने रखती हैं कि कला जीवन की बहुआयामी संरचनात्मक विशेषताओं को प्रभावशाली तरीके से सामने लाती है।

अभिकल्प यदु की रचना

सरिता साहू की रचना 



प्रदर्शित सभी रचनाओं के बारे में लिखना संभव नहीं है। प्रदर्शनी के उदघाटन के अवसर पर अनेक कलाकारों से उनके काम, उनकी रचना प्रक्रिया आदि के बारे में बातचीत करने का अवसर मिला। यह देखकर खुशी हुई की प्रदर्शनी में शामिल युवा कलाकार अपनी कला और विचारों को लेकर बहुत स्पष्ट हैं। कई युवा महिला कलाकारों ने जिस तरह की सामाजिक चेतना का परिचय दिया वह भारतीय कला के भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। इस दृष्टि से पूनम चक्रधारी, डॉली सर्वा, शुभांगी सिंह ठाकुर, श्यामा शर्मा, श्वेता इंदोरिया जैन आदि का उल्लेख करना उचित होगा। अपने परिवेश और समकालीन संकटों को लेकर अनिल खोबरगड़े, शांति टिर्की, दियांशु देवांगन जैसे कलाकार नई संभावनाएं जगाते हैं। प्रदर्शनी में स्त्री चेतना की वाहक रचनाकारों में डॉ. तरुणा माथुर, वंदना परगानिहा, सरिता साहू, जयश्री भागवानानी, प्रियांशि वर्मा आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। इन रचनाकारों के काम की विशेषता यह है कि कि यह मानवीय आकारों के साथ ही अमूर्तन के माध्यम से स्त्री अस्मिता को उजागर करती हैं।   

श्वेता इंदोरिया जैन की रचना

शांति टिर्की की रचना


यह प्रदर्शनी इस बात को स्थापित करती है कि लोक परंपराएँ अतीत के जड़ अवशेष नहीं हैं, बल्कि जीवंत और सृजनात्मक शक्तियाँ हैं जो आज भी समकालीन कला को प्रभावित और समृद्ध कर रही हैं। लोक की इस शाश्वत आभा को आधुनिकता में उजागर करते हुए, यह प्रदर्शनी एक विकसित होती कलात्मक दिशा की ओर संकेत करती हैजहाँ परंपरा और नवाचार मिलकर एक जीवंत सांस्कृतिक निरंतरता का निर्माण करते हैं।