Saturday, April 4, 2026

माटी-।।। प्रदर्शनी में लोक व समकालीन कला का समन्वय


प्रदर्शनी रपट- डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज


दीपोत्सव के अवसर पर श्रीमती शांति देवी, श्री विनोद नारायण इंदुकर, 
श्री  विनोद भारद्वाज, श्री  संतोष श्रीवास्तव और श्री  जय त्रिपाठी।


विमला आर्ट फोरम की वार्षिक प्रदर्शनी माटी-।।। का उद्घाटन 3 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली की अर्पणा आर्ट गैलरी में हुआ। इस प्रदर्शनी में समकालीन कलाकारों के साथ ही लोक कलाकारों की कृतियों का प्रदर्शन भी किया गया है। इसके साथ ही इस प्रदर्शनी में कई देशों के कलाकारों के काम भी शामिल हैं। इस प्रदर्शनी की संयोजक श्रीमती कंचन मेहरा हैं और इसे क्यूरेट किया है कलाकार दिलीप शर्मा ने। यह प्रदर्शनी 9 अप्रैल तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी।

श्रीमती कंचन मेहरा व श्री जय त्रिपाठी दीप जलाते हुए। 


प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर मुख्य अतिथि विनोद नारायण इंदुकर ने भारतीय कला परम्परा का उल्लेख करते हुए 'रूपभेदः प्रमाणानि भावलावण्ययोजनम। सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्रं षडंगकम्।।' श्लोक के उदाहरण और उसकी व्याख्या के माध्यम से भारतीय कला दृष्टि का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय परम्परा में रूपभेद, प्रमाण, भाव, लावण्ययोजना, सादृश्य और वर्णिकाभंग यह षडंग दृश्य कला के शाश्वत आधार हैं। इस श्लोक की व्याख्या करने के साथ उन्होंने प्रदर्शनी के अवलोकन के अपने अनुभव को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। कला की इस प्रदर्शनी को देखते हुए उन्होंने पाया है कि इसमें कला के सभी छह अंग समाहित हैं। प्रत्येक कलाकार ने जिस सुंदरता और प्रभावशाली तरीके से रूप, प्रमाण, रंग, भाव, संयोजन आदि का पालन करते हुए अपने भावों और विचारों को प्रस्तुत किया है, वह प्रशंसनीय है। उन्होंने कला कि कला में कलाकार की अभिव्यक्ति के साथ ही देखने वालों की अनुभूति और प्रतिक्रिया को भी महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक दर्शक कला को देखते हुए उसे अपनी तरह से समझने और उस अनुभव को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होता है। उन्होंने एक तरह से इस बात को प्रमाणित किया कि कला में कलाकार के साथ ही दर्शक की सक्रिय भूमिका भी समान महत्व रखती है।







केएसकेटी के डायरेक्टर संतोष श्रीवास्तव ने अपने सम्बोधन में कहा कि कला ही मनुष्य को सभी जीवों में श्रेष्ठ व अलग प्रमाणित करती है। उन्होंने प्रदर्शनी के लिए विमला आर्ट फोरम को बधाई देते हुए कहा कि इसमें कलाकारों ने बहुत प्रभावशाली काम किए हैं। पदम् श्री शांति देवी ने अपनी कला यात्रा का वर्णन करते हुए बताया कि किसी तरह उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में काम करते राष्ट्रीय पुरस्कार और पदम् श्री तक का सफर पूरा किया। उन्होंने कहा कि पहली बार मुझे अपनी पेंटिंग के लिए 20 रुपए मिले थे। उन्होंने गाँव की दूसरी महिलाओं और लड़कियों को लोक कला करना सिखाया। 




वरिष्ठ आलोचक, कवि व फिल्मकार विनोद भारद्वाज ने प्रदर्शनी में लोक व आधुनिक कला को एक साथ प्रदर्शित करने की प्रशंसा करते हुए विमला आर्ट फोरम को इसके लिए बधाई दी। कला में सौन्दर्य की भूमिका और समकालीन कला की चर्चा करते हुए उन्होंने कई उदाहरणों देते हुए दोनों तरह की कला के बीच संबंध पर बल दिया। कलाकार व आलोचक जय त्रिपाठी ने एक अच्छे आयोजन के साथ वक्ताओं को कला पर सरगर्भित वक्तव्य के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि विमला आर्ट फोरम और इसकी संस्थापक ट्रस्टी कंचन मेहरा ने महत्वपूर्ण काम किया है। इस अवसर पर श्रीमती कंचन मेहरा ने सभी अतिथियों और कलाकारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विमला आर्ट फोरम की कोशिश रहती है कि सभी कलाओं को एक मंच पर लाया जाए। उन्होंने इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर व कलाकार दिलीप शर्मा की प्रशंसा करते हुए कहा कि सबके सहयोग से यह आयोजन हो सका है।

कलाकार रवि , अरबिंद कुमार, रागिनी सिन्हा, जय त्रिपाठी और बिपिन कुमार।



प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर इसमें शामिल कलाकारों के साथ ही अन्य वरिष्ठ कलाकार भी उपस्थित थे। इन अतिथियों में वरिष्ठ कलाकार धर्मेंद्र राठौर, नीरज शर्मा, रितु सिंह, रागिनी सिन्हा, नरेंद्र पाल सिंह, कलाकार व क्यूरेटर अनूप कामत, राजेश चंद, स्मिता जैन, शिखा गुप्ता अग्रवाल, कविता राजपूत, मीतू कपूर आदि शामिल थे। 



श्री विनोद भारद्वाज और श्रीमती कंचन मेहरा



“Space Between” - a space that is less seen and more felt

Exhibition Review/Dr Ved Prakash Bhardwaj




The exhibition “Space Between” presents, in a compelling and nuanced manner, the idea that within every work of art there exists a space between colour and form—a space that is less seen and more felt, less visible and more experiential. This is not merely a physical emptiness but a realm of meaning, sensation, and perception, where art reveals itself in its most intimate and essential form. Space Between is presented by Matters of Art and curated by Anoop Kamath. The exhibition is opened on 4th April and will continue until 9th April 2026 at The Stainless gallery, New Delhi.



paintings by Shobha Nagar



Paintings by Dr Vikram Kumar


Painting by Ritu Kamath

Paintings by Dr Ved Prakash Bhardwaj



Sculpture by Ashish Arora




In this intermediate space, all that remains unexpressed through colour, line, and form begins to find articulation. This is the domain of the unspoken—where the artist’s sensibility and the viewer’s experience enter into a subtle dialogue. In this sense, the space is not an absence but an active presence—a field charged with possibilities of meaning.

Paintings by Somya Satsangi


The 'empty' spaces between forms and compositions on canvas or paper are never truly vacant; they hold infinite potential, just as the void is never truly empty and silence resonates with unheard echoes. What transpires within them is not immediately visible; it must be perceived through sensitivity, intuition, and inner awareness.

Dr Ved Prakash Bhardwaj with his paintings.


In poetry, the intervals between words play a crucial role in the construction of meaning—pauses, silences, and moments of stillness themselves become a form of language. A similar phenomenon occurs in visual art, as well as in theatre and music, where silence and pause carry expressive weight. Thus, the space between is not merely a structural element; it is also a powerful medium of meaning and experience. Often, it is this very space that becomes more profound and evocative than the areas that appear visibly occupied.



The works included in this exhibition—both figurative and abstract—explore and articulate these interstitial spaces in diverse and distinctive ways. Each artist, through their own sensibility and artistic vision, lends a unique dimension and interpretation to this 'space'.

Shobha Nagar’s works engage with layers of memory, filling these intervals in a way that suggests a dialogue between past and present, evoking a sense of wholeness in lived experience. Soumya Sugandhi’s paintings reflect an attempt to bridge emotional voids, where colour itself becomes a carrier of feeling.



Ritu Kamath, through her renderings of natural landscapes, especially flowers, presents visual beauty and seems to bridge the subtle gap between emotion and the material world. In Dr. Ved Prakash Bhardwaj's work, what is not said or heard in the expression resonates like an echo, suggesting that the image continues to speak even when it is silent.

Dr Vikram Kumar creates a unique space through the confluence of folk and contemporary artistic traditions, transforming cultural intervals into sites of creative energy. Ashish Arora’s sculptural works appear to bridge the distance between history and the present, where time itself becomes a medium of expression.

Sculpture by Ashish Arora

The works of Dolly Dhillon, Sangam Peshawaria, and Vandana Krishna seek to articulate that which remains unexpressed between the physical and emotional dimensions of human existence. In their practice, the 'space between' emerges as a site of complex human experience—where both word and form fall short, and yet meaning persists.

Ultimately, “Space Between” is not merely an exhibition but a proposition for a new way of seeing, understanding, and experiencing art—one that invites us to engage not only with what is visible but also with the silent, the empty, and the unseen dimensions that lie in between.

Thursday, April 2, 2026

बिकाश भट्टाचार्जी और उनकी गुड़िया श्रृंखलाः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज



 

बिकाश भट्टाचार्जी (1940-2006) का जन्म कोलकाता में हुआ था। पश्चिम बंगाल शुरु से ही राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र रहा, जिनमें पूंजीवादी और साम्यवादी राजनीति केंद्र में थी। 1960 का दशक, जब बिकाश भट्टाचार्जी का कला जीवन शुरु होता है, वैचारिक और राजनीतिक सक्रियता का दशक था। कई तरह के राजनीतिक मोहभंग के साथ ही इसी कालखंड में नक्सलवादी आंदोलन का उभार और किसान आंदोलन ऐसी घटनाएँ थीं जिन्होंने सामान्य जीवन को प्रभावित किया। इन सबका बिकाश भट्टाचार्जी की कला पर गहरा प्रभाव पड़ा। मध्यवर्गीय विचलन, अपसंस्कृति, वैचारिक अस्थिरता, और इसी तरह की दूसरी विरोधाभासी स्थितियों के बीच व्यक्ति के अस्तित्व और व्यक्तित्व के संकट ने उनकी कला को नया आयाम दिया। गहरे अंधेरे और विरोधाभासी चित्रण का उनकी कला में विशेष स्थान रहा। उनकी कला में गुडिया सीरिज का विशेष स्थान है।

बिकाश भट्टाचार्जी
 

बिकाश बाबू के नाम से मशहूर इस कलाकार एक राजनीतिक रूप से तनावपूर्ण वातावरण में विकास हुआ, जिसका उनकी कला पर गहरा प्रभाव पड़ा। कम उम्र में ही अपने पिता को खोने के बाद, वे उत्तरी कोलकाता में अपने चाचा के साथ रहने चले गए - जहाँ की गलियाँ और निवासी उनके जीवन के अंत तक उनकी रचनाओं का आधार बने रहे। अपने बचपन के संघर्षों ने उन्हें अपने आसपास के लोगों के संघर्षों के प्रति संवेदनशील बना दिया।



1970 के दशक की शुरुआत में उन्होंने 'गुड़िया श्रृंखला' नामक एक श्रृंखला चित्रित की। यह बंगाल में राजनीतिक उथल-पुथल के चरम पर था, जहाँ नक्सलवादी आंदोलन ने राज्य को जकड़ रखा था। इन चित्रों में, एक गुड़िया को केंद्रीय प्रतीक के रूप में उपयोग किया गया है, जो एक बच्चे के खिलौने की मासूमियत को कलकत्ता की सड़कों पर व्याप्त हिंसा और आतंक के साथ जोड़ती है। गुड़िया को दराजों वाली अलमारियों में कुछ ढूंढते हुए देखा जा सकता है, जिसके एक तरफ छोटी लाल किताब रखी हुई है, जैसा कि उस समय के कई बंगाली घरों में होता था। बंगाल की शांत सड़कों पर, यह बेजान चीज़ जीवंत हो उठती हैकभी सड़क के कोनों से झाँकती हुई, कभी कपड़ों की रस्सियों पर लटकी हुई, या फिर दूसरी गुड़ियों के साथ ढेर में पड़ी हुई। इन चित्रों में एक बेचैन करने वाला माहौल और उदास, धुंधले बैकग्राउंड के साथ एक अजीब सी घबराहट दिखाई देती है। अधिकांश कला समीक्षक इस सीरिज को बंगाल के उस समय के राजनीतिक माहौल का प्रतीक मानते हैं, पर देखा जाए तो उसी तरह के हालात देश में बाकी हिस्सों में भी थे। 1970 के दशक के उत्तरार्ध्द तक आम लोगों के बीच डर, अशांति और खौफ़ आम बात थी।



माना जाता है कि इस सीरीज़ की प्रेरणा उन्हें तब मिली, जब एक छोटी बच्ची ने भट्टाचार्जी से अपनी टूटी हुई गुड़िया को फिर से रंगने और ठीक करने के लिए कहा। उन्होंने उस खिलौने का इस्तेमाल कलकत्ता के निवासियों की दुर्दशा को दिखाने के एक माध्यम के तौर पर किया। इस बेजान चीज़ का इस्तेमाल करके इंसानी भावनाओं को दिखाना और देखने वाले को झकझोर देना ही इस सीरीज़ को इतनी तारीफ़ और शोहरत दिलाने की वजह बना।

 


बिकाश बाबू की कला यात्रा को देखें तो 1060 के दशक तक, उन्होंने अमूर्त चित्र बनाए और कोलकाता की छतों के रेखाचित्र रचे। 1960 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 1970 के दशक के मध्य तक, उनकी रचनाओं में अतियथार्थवादी श्रृंखलाएँ प्रमुख थीं, जिनमें अमानवीय और/या राक्षसी परिवेश की झलक मिलती थी। उनकी बाद की रचनाओं में, फोटो यथार्थवाद प्रमुख हो गया, जैसे कि चित्र 'भोर' में। उन्हें भारतीय कला जगत में यथार्थवाद को पुनर्जीवित करने का श्रेय दिया जाता है, ऐसे समय में जब कलाकार अमूर्तता और विकृति की ओर अग्रसर थे। वे जलरंग, कॉन्टे और ऐक्रेलिक जैसे विभिन्न माध्यमों का उपयोग करने वाले एक बहुमुखी चित्रकार थे, लेकिन वे मुख्य रूप से अपने तेल चित्रों के लिए जाने जाते हैं।



भट्टाचार्जी ने अपने दृश्य और बौद्धिक विचार कोलकाता की सड़कों और लोगों से प्राप्त किए। गरीबी, हिंसा और लोगों के दयनीय जीवन को देखने के उनके अनुभव ने उन्हें एक अनूठा दृष्टिकोण दिया और उन्हें दूसरों से अलग पहचान दिलाई। वे सार्वजनिक और निजी स्थानों में पुरुषों, बच्चों और विशेष रूप से मध्यम वर्ग की महिलाओं के साथ-साथ वेश्याओं के चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके चित्र उस समय व्याप्त राजनीतिक उथल-पुथल और लोगों पर इसके प्रभाव को दर्शाते हैं, जिससे उनमें बेचैनी का भाव तो आता है, लेकिन साथ ही एक परिचितता का भी एहसास होता है।

नोट- सभी चित्र गूगल से साभार। इन कलाकृतियों पर लेखक का किसी तरह का अधिकार और दावा नहीं है। इनका इस्तेमाल किसी तरह के व्यावसायिक हित के लिए नहीं, केवल संदर्भ के लिए किया गया है। 

Sunday, March 29, 2026

मोहन सामंत


मोहन सामंत अपनी एक रचना के साथ


भारत की स्वतंत्रता के बाद मुंबई में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के रूप में आधुनिक भारतीय कला का एक नया रूप उभर कर सामने आया था। इस ग्रुप के ज्यादातर सदस्य जहाँ पेरिस के कला जगत से प्रभावित थे वहीं मोहन सामंत और एमएफ हुसेन ने भारतीय चित्रकला परंपरा से प्रेरणा लेकर अपनी अलग कला भाषा विकसित की थी। मोहन सामंत का जन्म मुंबई के एक ज़मींदार परिवार में हुआ था। उन्होंने 1952 में सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स से ग्रेजुएशन किया। उन्हें भारत के दो सबसे प्रतिष्ठित कला सम्मान मिलेकलकत्ता की एकेडमी ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स का स्वर्ण पदक और बॉम्बे आर्ट सोसाइटी का स्वर्ण पदक। उन्होंने इटली सरकार की स्कॉलरशिप पर दो साल (1957-58) इटली में काम किया। उन्होंने एम. पालसिकर के सानिध्य में बसोहली लघु चित्रकला का अध्ययन किया। जनवरी 1959 में, वे रॉकफ़ेलर ग्रांट पर न्यूयॉर्क आए। 2004 में न्यूयॉर्क में उनका निधन हुआ।



प्रसिद्ध कला इतिहासकार और आलोचक जॉन रिचर्डसन ने 1963 में इस कलाकार को दुनिया के 100 सर्वश्रेष्ठ कलाकारों में शामिल किया था। पॉल क्ली और पिकासो जैसे चित्रकारों से प्रभावित सामंत अपनी खुद की शैली और रूप गढ़ने को महत्व देते थे। वह पश्चिमी कलाकारों से प्रभावित अवश्य हुए परंतु उन्होंने भारतीय कला परंपरा को अधिक महत्वपूर्ण माना। सामंत ने कहा था, "आप जिस चीज़ को लगातार रचते रहते हैं, उसी में आपका विकास होता है।" और "चित्रकला के 25 अलग-अलग तरीके हैं, और कैनवस के सामने आने पर 15 अलग-अलग तरीकों से कोई रूप उभरता है। आप खुद को दोहराते नहीं हैं।"



50 के दशक की शुरुआत में, सामंत 'प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप' (PAG) में शामिल हो गए। जहाँ उनके साथी सदस्यों ने अपनी प्रेरणा मुख्य रूप से पेरिस से ली, वहीं सामंत ने मिस्र के समाधि-चित्रों, अजंता की भित्ति-चित्रों और राजपूती लघु-चित्रों की छवियों को खंगाला, और अपने काम में आदिम छवियों की एक श्रृंखला स्थापित की। बसोहली लघुचित्र कला के गहन अध्ययन ने उन्हें एक ऐसी चित्रभाषा विकसित करने में सहायता की जिसमें बाहरी रुप में पश्चिमी कला की तकनीक दिखाई देती है पर चित्रों की आत्मा भारतीय रही। घनवाद का प्रभाव उनके कामों में दिखाई देता है पर उसे उन्होंने अलग तरह से इस्तेमाल किया। उनके चित्रों की संरचना को देखें तो उनमें घनवाद का आंशिक प्रयोग ही है। उन्होंने चित्र में कभी मानव आकृतियों में तो कभी पूरक संरचनाओं में घनवादी संरचनाओं का इस्तेमाल करते हुए भारतीय विषयों को रचा।





सामंत 1968 में न्यूयॉर्क में स्थाई रुप से बस गये। एक इंटरव्यू में, वे मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट में घंटों बिताने का ज़िक्र करते हैं, जहाँ उन्हें दुनिया भर की सांस्कृतिक धरोहरों के संग्रह में आज भी शक्तिशाली प्रतीक मिलते रहते हैं। वे अपनी कला का वर्णन लगभग 'इंस्टॉलेशन आर्ट' (स्थापना कला) जैसा करते हैं; "बस फ़र्क इतना है कि मेरा इंस्टॉलेशन मेरे फ़्रेम के अंदर होता है।" इस तरह की रचनाओं के पीछे अंजता-एलेरा के भित्ति चित्रों की प्रेरणा मुख्य दिखाई देती है। क्योंकि उनके चित्रों को देखें तो उनमें एक विषय को विस्तार देते हुए किया गया चित्रण दिखाई देता है। एकल आकृतियों की जगह वह आकृतियों का समूह अधिक रचते थे।



सामंत की कला में शुरुआत से ही अनेक माध्यमों को मिलाकर काम करना शामिल रहा है। उन्होंने अलंकारिक और अमूर्त कला को मिलाकर तो काम किया ही, 1960 के दशक में उन्होंने रेत औरल गोंद के साथ रंगों को मिलकार अलग तरह के टैक्सचर के साथ काम किया। 1970 के दशक में उन्होंने कैनवास पर कागज के टुकड़ों को चिपकार काम किया। 1980 के दशक में उन्होंने तार से आकृतियां बनाना शुरु किया। वह तार से आकृतियाँ बनाते और उन्हें कैनवास परल चिपकाकर चित्र को पूरा करते। इस तरह उन्होंने अनेक माध्यमों को मिलाते हुए अपनी अभिव्यक्ति को अलग रूप दिया। अमूर्तन उनकी रचनाओं में मुख्य आकारों के साथ ही पृष्ठभूमि में भी मिलता है जिसके माध्यम से वह अपनी रचनाओं को बहुकोणीय बना देते थे।



सामंत एक चित्रकार के साथ ही संगीत में भी गहरी रुचि रखते थे। सारंगी उनका प्रिय वाद्य था जिसपर वह नियमित रियाज करते थे। इस संदर्भ में भी उन्होंने कहा था कि मैं सारंगी का रियाज़ नहीं करता। मैं इसे हर दिन ऐसे बजाता हूँ जैसे मैं किसी कॉन्सर्ट में हूँकभी बहुत अच्छा, तो कभी बहुत बुरा। इसी तरह, मैं ड्रॉइंग और स्केचिंग के ज़रिए पेंटिंग का रियाज़ नहीं करता। मैं बस पेंट करता हूँ, और अगर मुझे वह पसंद नहीं आता, तो मैं उसी कैनवस पर दो- तीन बार, या कई बार पेंट कर देता हूँ। मैं पेंटिंग की तैयारी के लिए ड्रॉइंग और स्केच का इस्तेमाल नहीं करता; वे पूरी तरह से अलग काम होते हैं। 18 मई, 2003 को उन्होंने अपने मैनहैटन स्टूडियो में, संगीत और कला से भरी एक दोपहर का आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने अपनी पेंटिंग्स से घिरे हुए, सारंगी पर भारतीय शास्त्रीय राग बजाए थे।



उनके प्रमुख एकल शो में जहांगीर आर्ट गैलरी, मुंबई (2000), बिड़ला एकेडमी ऑफ आर्ट, कोलकाता (1998), बिड़ला एकेडमी ऑफ आर्ट एंड कल्चर, मुंबई (1997), गैलरी बी.ए.आई., न्यूयॉर्क (1994, 1995), बर्थडे बुक, न्यूयॉर्क ( 1973 और 1975), सिलेक्टेड आर्टिस्ट्स गैलरी, न्यूयॉर्क (1972), पंडोल गैलरी, मुंबई (1967), गैलरी केमोल्ड, मुंबई और दिल्ली (1966), ताज आर्ट गैलरी, मुंबई (1966), ताज आर्ट गैलरी, मुंबई (1965), वर्ल्ड हाउस गैलरीज, न्यूयॉर्क (1961 और 1965),  और रोम इंस्टीट्यूट ऑफ ओरिएंटल स्टडीज, इटली (1958) शामिल हैं। 


Saturday, March 28, 2026

कला जीवन की पुनर्व्याख्याः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज








ए. रामाचंद्रन की पेंटिंग ययाति

ला जीवन को फिर से लिखने का एक माध्यम है, एक ऐसी भाषा में जो प्रतिकात्मक है, और जीवन को देखने की अलग दृष्टि देती है। कला एक तरह से दृष्टि का विस्तार है, अनुभूति की बहुलता है। यह अनुभूति की बहुलता व्यक्ति सापेक्ष होती है। कलाकार की और दर्शक की अनुभूति एक ही हो, यह जरुरी नहीं है। इसीलिए कला में जीवन को लिखना एक तरह से लोकतांत्रिक दृष्टि का विस्तार है जो दर्शक को भी उतनी ही स्वतंत्रता देती है, जितनी स्वतंत्रता कलाकार को होती है। इसीलिए कला केवल सृजन करना नहीं, बल्कि पुनर्व्याख्या करना हैजो कुछ जिया गया है, और उस जिये गये को भौतिक व मानसिक स्तर पर जिस-जिस प्रकार से अनुभव किया गया है, उसे एक नया रूप देना है। जीवन, अपने कच्चे रूप में, अक्सर बिना किसी संपादन के हमारे सामने आता है। वह उथल-पुथल, अनिश्चितता और ऐसे पलों से भरा होता है जिन्हें समझना मुश्किल होता है। कला एक शांत, फिर भी शक्तिशाली शक्ति के रूप में सामने आती है, जो हमें इन पलों को संशोधित करने, उन्हें कोई अर्थ देने और उन्हें ऐसी कहानियों में बदलने का अवसर देती है जिनके साथ हम जी सकें।

अतुल डोडिया की एक पेंटिंग


इस संदर्भ में हमें पहले से हो चुकी कला के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जैसे पिकासो की गुएर्निका। भारतीय कला में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं। ए रामाचंद्रन की ययाति, तैयब मेहता की सेलिब्रेशन, एमएफ हुसेन की कई रचनाएँ के साथ ही बिकास भट्टाचार्यजी, गणेश पाइन, सोमनाथ होर, चित्तोप्रसाद, हक्कू शाह, अमित अम्बालाल, केजी सुब्रमण्यन, सुधीर पटवर्धन, अतुल डोडिया सहित कितने की कलाकार हैं जिनकी रचनाओं में हमें अपने जिये गये जीवन के अनेक अनुभव याद आते रहते हैं। इन कलाकारों के साथ ही दूसरे कलाकारों की रचनाओं को देखते समय हम जीवन को अलग तरह से देखने और पढ़ने लगते हैं। यही कला की विशेषता है, कि वह हमें देखे हुए को नयी तरह से देखना सिखाती है, और कलाकार को उसे अलग तरह से लिखने की शक्ति देती है।

गणेश पाइन की पेंटिंग


कला के माध्यम से जीवन को फिर से लिखना, अपने जीवन की बागडोर (रचयिता होने का अधिकार) वापस अपने हाथों में लेना है। मनुष्य लगातार परिस्थितियों द्वारा गढ़ा जाता हैलाभ और हानि, खुशी, संघर्ष और बदलाव द्वारा। ये अनुभव हमें अक्सर ऐसा महसूस कराते हैं, मानो हम किसी ऐसी कहानी के पात्र मात्र हैं जिसे हमने खुद नहीं चुना है। 

जीवन का चुनाव जीव के नियंत्रण में नहीं है, वह विभिन्न परिस्थितियों में, ज्ञात-अज्ञात शक्तियों द्वारा निरयंत्रित होता है। एक कलाकार इस नियंत्रण को चुनौती देता है, जीवन को अलग तरह से देखने और अभिव्यक्त करने के माध्यम से। चित्रकला, लेखन, संगीत, नृत्य या किसी भी रचनात्मक कार्य के माध्यम से, हम अपनी कहानी को फिर से लिखना शुरू करते हैं। एक दर्दनाक याद कविता बन जाती है; एक क्षणिक भावना मधुर धुन बन जाती है; एक बिखरी हुई पहचान एक सुसंगत कहानी का रूप ले लेती है। इस प्रक्रिया में, हम अब केवल अनुभवों के विषय मात्र नहीं रह जातेबल्कि हम उन अनुभवों के व्याख्याकार बन जाते हैं।

एमएफ हुसेन की पेंटिंग ग्राम यात्रा


कला बहुआयामी होने की गुंजाइश भी देती है। किसी एक घटना के कई अर्थ हो सकते हैं, और कला हमें उन सभी को खंगालने की स्वतंत्रता देती है। यह किसी एक 'सत्य' की मांग नहीं करती, बल्कि इसमें विभिन्न परतें, विरोधाभास और अस्पष्टताएँ भी समाहित होती हैं। जहाँ जीवन अक्सर स्थिर और अपरिवर्तनीय प्रतीत हो सकता है, वहीं कला तरल और प्रवाहमान होती है। यह हमें अतीत में झाँकने का अवसर देती हैइसलिए नहीं कि जो घटित हो चुका है उसे बदल सकें, बल्कि इसलिए कि वह घटना हमारे भीतर किस रूप में जीवित है, उसे बदल सकें। ऐसा करने से, यह यादों के तीखेपन को नरम करती है और घावों को भरने के लिए एक नया स्थान बनाती है।

चित्तोप्रसाद का एक चित्र


इसके साथ ही, कला व्यक्तिगत अनुभवों को सार्वभौमिक अनुभवों से जोड़ती है। जब हम रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से अपने जीवन को फिर से लिखते हैं, तो हम अक्सर पाते हैं कि हमारी कहानियाँ दूसरों के जीवन से भी मेल खाती हैं। जो कार्य एक व्यक्तिगत प्रयास के रूप में शुरू होता है, वह धीरे-धीरे एक साझा अनुभव बन जाता है। एक चित्र किसी और के मौन दुख की प्रतिध्वनि बन सकता है; एक गीत उन भावनाओं को व्यक्त कर सकता है जिन्हें केवल शब्द पूरी तरह से बयाँ नहीं कर पाते। इस आदान-प्रदान के माध्यम से, कला अलग-थलग पड़े जीवन के बीच सेतु का निर्माण करती है, और हमें यह याद दिलाती है कि हमारे संघर्ष और हमारी खुशियाँ केवल हमारी अपनी ही नहीं हैं।

सोमनाथ होर का शिल्प


जीवन को फिर से लिखने के इस कार्य में अदम्य साहस भी निहित है। सृजन करने का अर्थ हैसाहसपूर्वक सामना करना; अपने अनुभवों को सीधे-सीधे देखना और उनसे मुँह मोड़ने के बजाय, उनके साथ जुड़ने का चुनाव करना। दर्द को सौंदर्य में, भ्रम को स्पष्टता में और मौन को एक सशक्त आवाज़ में बदलने के लिए अत्यंत संवेदनशीलता और साहस की आवश्यकता होती है। और ठीक यही साहस है, जो कला को इतना शक्तिशाली और प्रभावशाली बनाता है। यह जीवन की मुश्किलों को मिटा नहीं देता, बल्कि उन्हें एक नया रूप देता हैउन्हें देखने का एक नया नज़रिया देता है और कभी-कभी, उनसे मुक्ति भी दिलाता है।

केजी सुब्रमण्यन की रचना


कला जीवन की जगह नहीं लेतीबल्कि वह जीवन की फिर से कल्पना करती है। यह हमें वह भाषा देती है जहाँ पहले कोई भाषा नहीं थी; वह ढाँचा देती है जहाँ पहले केवल अव्यवस्था थी; और वह नियंत्रण का एहसास देती है जहाँ पहले केवल अनिश्चितता थी। यह कहना कि कला जीवन को फिर से लिखने का एक माध्यम है, मानव अस्तित्व में उसकी गहरी भूमिका को स्वीकार करना है। यह एक ही साथ दर्पण भी है और कलम भी: यह जो 'है' उसे दर्शाती है, और साथ ही हमें वह उसे अभिव्यक्त करने की आज़ादी देती है जो जो महसूस किया गया है, और जो 'हो सकता है'

अमित अम्बालाल की एक पेंटिंग


कला के माध्यम से, हम जीवन से भागते नहीं हैंबल्कि हम उसे फिर से लिखते हैं, एक-एक पंक्ति करके।