Wednesday, May 13, 2026

कला पर्याप्त नहीं है

पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर आनंद मोय बनर्जी, जॉनी एमएल, रविंद्र मरडिया, राजीव लोचन, प्रयाग शुक्ल व उदय जैन। 

कला पर्याप्त नहीं है, दूसरे शब्दों में सिर्फ कला करना ही पर्याप्त नहीं है। सवाल उठता है कि फिर ऐसा क्या किया जाए कि कला पर्याप्त हो जाए। कला का पर्याप्त होना, यानी कला से वह सबकुछ हो जाना जिसकी आशा कलाकार करता है, पर यह अपने आप तो नहीं होगा। इसके लिए कलाकार को अलग तरह से सोचना होगा, कला से बाहर की दुनिया को समझना होगा।

कार्यक्रम का संचालन करतीं कलाकार रितु  सिंह।


एक कलाकार क्या कुछ कर सकता है, इस पर आधारित है रविंद्र मरडिया की पुस्तक 'कला पर्याप्त नहीं है।' यह पुस्तक हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। इस पुस्तक का लोकार्पण 12 मई 2026 को नई दिल्ली के बीकानेर हाउस में हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ कलाकार राजीव लोचन, आनंद मोय बनर्जी, कवि व लेखक प्रयाग शुक्ल, और धूमिमल गैलरी के उदय जैन अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

पुस्तक लोकार्पण के अवसर पर अपने विचार रखते रविंद्र मरडिया।


इस पुस्तक को लिखने का विचार कोई 15 साल से रविंद्र मरडिया के दिमाग़ में चल रहा था। पिछले कुछ महीने उन्होंने अपना पूरा समय इसपर लगाया। अंग्रेजी में लिखने के बाद कलाकार नीलम गौड़ ने इसका हिंदी में अनुवाद किया। यह पुस्तक कला की दुनिया में कलाकार की खोज, उसकी लगन, शैली, गैलरी की भूमिका, कलाकार का गैलरी के साथ संबंध कैसा हो, कला में दस्तावेज का क्या महत्व है, ऐसी तमाम बातों पर विचार किया गया है।

पुस्तक में कला के डॉक्यूमेटेशन का क्या महत्व है, गैलरियों के साथ कलाकार को किस प्रकार के संबंध रखने चाहिएं, कलाकार के विकास में गैलरी किस तरह भूमिका निभाती है, कलाकार को गैलरी के साथ अनुबंध के समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, कला प्रदर्शनी, कला संग्रहकर्ताओं के साथ संबंध, और ऐसी तमाम बातों पर विचार किया गया है जो किसी भी कलाकार के लिए आवश्यक है। 

पुस्तक कोई निर्णय नहीं देती, बस सुझाव देती है, और संकेत। कला में सफलता बहुअयामी होती है जिसमें कलाकार के रूप में पहचान, स्वीकृति, और आर्थिक सफलता शामिल है। रविंद्र मारडिया इस दिशा में कुछ कुछ बातें सामने रखते हैं।

Art is not enough—in other words, merely practicing art is insufficient. The question then arises: what must be done to render art truly sufficient? For art to be "sufficient" implies that it fulfills every aspiration the artist holds; however, this does not happen automatically. To achieve this, the artist must adopt a different mind-set and strive to understand the world that exists beyond the realm of art itself. 

Ravindra Mardia’s book, Art Is Not Enough, explores precisely this subject: the full scope of what an artist is capable of achieving. The book is available in both Hindi and English. It was formally launched on May 12, 2026, at Bikaner House in New Delhi. Distinguished guests present at the launch included senior artists Rajiv Lochan and Anand Moy Banerjee, poet and writer Prayag Shukla, and Uday Jain of the Dhoomimal Gallery.

The concept behind this book had been germinating in Ravindra Mardia’s mind for approximately fifteen years. He dedicated his entire time to this project over the final few months of its creation. Originally written in English, the book was subsequently translated into Hindi by artist Neelam Gaur.

The book delves into a wide array of topics pertinent to the art world—including the artist's quest for identity, their dedication and artistic style, the role of art galleries, the nature of the artist-gallery relationship, and the significance of documentation within the arts. Rather than offering definitive verdicts, the book provides suggestions and pointers. Success in the arts is a multifaceted concept, encompassing recognition as an artist, critical acceptance, and financial prosperity; in this regard, Ravindra Mardia presents several key insights and perspectives.


Tuesday, May 12, 2026

कला में प्रकृति की सुंदरताः डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज


क्लाउड मॉनेट की एक रचना


प्रकृति की सुंदरता को उजागर करना सदैव से भूदृश्य चित्रकारों (Landscape Painters) की प्रमुख चिंता रही है। विभिन्न कालखंडों और संस्कृतियों में कलाकारों ने केवल प्रकृति के दृश्य रूप को ही नहीं, बल्कि उसकी भावनात्मक गहराई, आध्यात्मिक अनुभूति और बदलते स्वभाव को भी अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अनेक कलात्मक शैलियों का अन्वेषण किया, जिनमें यथार्थवादी (Realistic) और अमूर्त (Abstract) शैली विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। ये दोनों दृष्टिकोण प्रकृति की व्याख्या के अलग-अलग तरीके प्रस्तुत करते हैं, जिनके माध्यम से कलाकार अपने अनुभव और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते हैं।



वसली कंडेंस्की की रचना


यथार्थवादी परिदृश्य चित्रकला का उद्देश्य प्रकृति को यथासंभव वास्तविक रूप में प्रस्तुत करना होता है। इस शैली में कार्य करने वाले कलाकार प्रकाश, छाया, रंग और बनावट जैसे सूक्ष्म विवरणों का गहन अध्ययन करते हैं, ताकि दृश्य को सटीकता के साथ चित्रित किया जा सके। परिदृश्य कला में यथार्थवाद का उत्कृष्ट उदाहरण क्लाउड मॉनेट Claude Monet की कृतियों में देखा जा सकता है। यद्यपि उन्हें प्रायः इम्प्रेशनिज़्म से जोड़ा जाता है, फिर भी उनकी प्रसिद्ध “Water Lilies” श्रृंखला प्रकृति के प्रकाश और वातावरण के सूक्ष्म अवलोकन को दर्शाती है। इसी प्रकार John Constable अंग्रेज़ी ग्रामीण परिवेश के विस्तृत चित्रण के लिए प्रसिद्ध हैं, जहाँ बादल, वृक्ष और नदियाँ अत्यंत सजीव रूप में दिखाई देती हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति The Hay Wain ग्रामीण जीवन और प्रकृति के सामंजस्य के प्रति गहरी संवेदना को व्यक्त करती है।



परमजीत सिंह की एक रचना


किन्तु केवल यथार्थवाद प्रकृति के सम्पूर्ण सार को अभिव्यक्त नहीं कर सकता, क्योंकि प्रकृति निरंतर परिवर्तनशील है और अक्सर व्यक्तिगत भावनाओं को जागृत करती है। यही वह स्थान है जहाँ अमूर्त परिदृश्य चित्रकला महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अमूर्त कलाकार प्रत्यक्ष दृश्य प्रस्तुति से आगे बढ़कर प्रकृति के वातावरण, ऊर्जा और आत्मा को व्यक्त करने का प्रयास करते हैं। उदाहरणस्वरूप विंसेंट वेन गॉग Vincent van Gogh ने अपनी प्रसिद्ध कृति स्टेरी नाइट Starry Night में गहरे रंगों और सशक्त ब्रश स्ट्रोक्स के माध्यम से रात्रि आकाश की भावनात्मक तीव्रता को अभिव्यक्त किया। उनका चित्रण प्रकृति को केवल दृश्य अनुभव न बनाकर एक गहन भावनात्मक अनुभूति में परिवर्तित कर देता है।

निकोलस रोरिख की रचना


बीसवीं शताब्दी में अमूर्तन और अधिक प्रभावशाली हो गया। वस्ली कंडेंस्की Wassily Kandinsky जैसे कलाकारों का मानना था कि कला का उद्देश्य बाहरी वास्तविकता का चित्रण करना नहीं, बल्कि आंतरिक अनुभूतियों को जागृत करना है। यद्यपि उनकी कृतियाँ पारंपरिक परिदृश्यों जैसी प्रतीत नहीं होतीं, फिर भी वे प्रकृति के रूपों, रंगों और लयों से प्रेरित हैं। आकृतियों और रंगों के माध्यम से कांडिंस्की ने प्रकृति के सार को आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करने का प्रयास किया।

राम कुमार की एक रचना


परिदृश्य चित्रकला में यथार्थवादी और अमूर्त शैलियों का सह-अस्तित्व यह दर्शाता है कि कलाकार प्रकृति को समझने और प्रस्तुत करने के लिए कितने विविध दृष्टिकोण अपनाते हैं। यथार्थवादी चित्र दर्शकों को परिचित दृश्यों से जोड़ते हैं, जबकि अमूर्त कृतियाँ उन्हें प्रकृति को अधिक गहन और व्यक्तिगत स्तर पर अनुभव करने के लिए प्रेरित करती हैं। दोनों ही दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे हमारी प्राकृतिक संसार के प्रति समझ और संवेदना को विस्तृत करते हैं।

https://artnewsindia.com/2026/05/12/beauty-of-nature-in-art/


सूर्य प्रकाश की एक रचना


भारतीय कला में भी लोककला से लेकर समकालीन कला तक, कलाकार सदैव प्रकृति की सुंदरता और उसकी आध्यात्मिकता को उजागर करने का प्रयास करते रहे हैं। निकोलस रोरिख जैसे कलाकारों ने प्रकृति में निहित सौंदर्य और आध्यात्मिक तत्वों पर विशेष ध्यान दिया। कलाकार भवेश सान्याल, परमजीत सिंह, सतीश चंद्रा तथा सूर्य प्रकाश अपनी परिदृश्य चित्रकला के माध्यम से प्रकृति की सुंदरता और रहस्यमयता का अन्वेषण करते हैं। राम कुमार ने अपने अमूर्त परिदृश्यों में बनारस की आध्यात्मिकता को अभिव्यक्त किया, जबकि विमल चंद ने अपनी चित्रकला में प्रकृति के रहस्य को खोजने का प्रयास किया। अनेक अन्य कलाकार भी अपने परिदृश्य चित्रों में प्रकृति के विविध आयामों की खोज कर रहे हैं।

विमल चंद की रचना


इस प्रकार, प्रकृति की सुंदरता आज भी परिदृश्य चित्रकला का एक केंद्रीय विषय बनी हुई है, जो कलाकारों को यथार्थवादी और अमूर्त दोनों शैलियों में निरंतर प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती है। यथार्थवाद के माध्यम से कलाकार प्रकृति के बाहरी स्वरूप को चित्रित करते हैं, जबकि अमूर्तन उन्हें उसकी भावनात्मक और आध्यात्मिक गहराइयों को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। ये दोनों शैलियाँ मिलकर परिदृश्य कला की परंपरा को समृद्ध बनाती हैं और हमारे आसपास की दुनिया के प्रति हमारी संवेदना को और अधिक गहरा करती हैं।

A\lso see: https://artnewsindia.com/2026/05/12/beauty-of-nature-in-art/


Wednesday, May 6, 2026

यदि कला अर्थ से मुक्त है तो......?

कला विचार

अर्पिता सिंह की एक रचना।

यदि कला अर्थ से मुक्त है तो फिर किसी कलाकृति के शीर्षक की क्या आवश्यकता है? और किसी प्रदर्शनी का कोई नाम देने या उसके लिए क्यूरेटर की और उसके लेखन की क्या जरुरत है? यदि कला अर्थ से मुक्त है, संदर्भ से मुक्त है, और उसे पढ़ने की आवश्यकता नहीं है तो कोई व्यक्ति किसी गैलरी में पेंटिंग या शिल्प देखने आए ही क्यों? क्योंकि जो कुछ वह पेंटिंग में देखेगा वह तो वैसे भी उसके दृश्य-अनुभव का हिस्सा है। नदी, पहाड़, पेड़, मनुष्य, पशु-पक्षी, इन सबको तो हम वैसे भी प्रत्यक्ष देखते ही रहते हैं, फिर उन्हें किसी चित्र या शिल्प के रूप में देखने कोई क्यों जाए?

डॉ तरुणा माथुर की एक पेंटिंग।


पिकासो ने एक बार इस बात पर आपत्ति की थी कि लोग उससे उसकी पेंटिंग का अर्थ क्यों पूछते हैं? पर उसने कभी खुद से यह सवाल किया होता कि वह अपनी रचनाओं को एक नाम क्यों देते हैं तो उन्हें अपनी बात का जवाब मिल जाता।

पिकासो अपनी एक पेंटिंग के साथ।


भारतीय कला में हम देखते हैं कि बहुत सारे कलाकार अपनी रचनाओं को कोई शीर्षक नहीं देते हैं, हालांकि ऐसा न करने का कारण कुछ और होता है, जैसे ज्यादातर को कोई ऐसा शीर्षक नहीं सूक्षता है जो उपयुक्त हो, या इसलिए कि एक ही जैसी रचनाओं के लिए अलग-अलग शीर्षक तय करना बहुत मुश्किल है। बहुत से कलाकार शीर्षक के लिए दूसरों से विचार-विमर्श भी करते हैं। कितने ही कलाकारों को उनकी रचनाओं के शीर्षक मैंने स्वयं दिये हैं। हालांकि शीर्षक हो यह बहुत जरुरी नहीं है, क्योंकि दर्शक के लिए कलाकृति के दृश्यात्मक तत्व ही पर्याप्त होते हैं जिनसे वह अपने दृश्यात्मक अनुभव को विस्तार देते हुए रचना के अपने अर्थ की खोज करता है। फिर भी उसके सामने एक शीर्षक होता है तो उसके लिए आसानी हो जाती है।

कला को देखने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। 


कला को देखना अपने आप में एक कला है, जो गैलरी में आने वाले सभी लोगों के पास नहीं होती है। कला प्रदर्शनी में बहुत से ऐसे लोग भी अचानक चले आते हैं जिन्हें पहले से कला को देखने का अनुभव नहीं होता है, या जिनके पास कला को लेकर बहुत समझ नहीं होती है। उनके पास रंगों, रेखाओं और विभिन्न रुपों को लेकर किसी तरह की अन्वेषणात्मक चेतना नहीं होती है। उनके लिए रंगों के अर्थ भी सीमित होते हैं। इसके बाद भी ऐसे लोग कला प्रदर्शनी में आते हैं और कला को देखने व समझने की कोशिश करते हैं, और इसमें अक्सर वह कलाकार की मदद भी चाहते हैं।

एक कला प्रदर्शनी के दौरान कलाकार से बात करते दर्शक।


दर्शक चाहते हैं कि जो कुछ वह देख रहे हैं, उसका कुछ अर्थ अवश्य है जिसे वह यदि समझ नहीं पा रहे हैं तो कोई ऐसा रास्ता हो जो उनकी मदद कर सके। रचनाओं के शीर्षक और क्यूरेटर का आलेख ऐसे रास्ते हैं। आजकल गैलरियाँ और कलाकार अपनी प्रदर्शनी में वॉकथ्रू का कार्यक्रम रखते हैं, या कला पर संवाद का कार्यक्रम रखते हैं। यदि कला में अर्थ की कोई आवश्यकता नहीं है तो ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता ही क्यूं है? आश्चर्य की बात नहीं कि ऐसे कई कार्यक्रमों में वह लो वक्ता के रूप में उपस्थित रहते हैं जो कला को सिर्फ देखने की वस्तु मानते हैं, विचार और अर्थ की नहीं। जो कहते हैं कि पेंटिंग पढ़ने की नहीं देखने की चीज है, पर मौका मिलते ही वह खुद पेंटिंग को पढ़ने और पढ़ाने लगते हैं।

एक कला प्रदर्शनी में कलाकार और दर्शक।


मेरी कला को सिर्फ देखकर उसका आनंद लीजिए कहने वाले कलाकार अक्सर अखबारों और पत्रिकाओं में अपनी कला पर कुछ न कुछ छपवाते रहते हैं। वह कला समीक्षकों को बुलाकर अपना काम दिखाते हैं, उनसे लिखने को कहते हैं, कुछ संपन्न कलाकार और गैलरियाँ किताबें लिखवातीं व प्रकाशित करती हैं, यह सब क्यों यदि कला में किसी प्रकार के अर्थ की तलाश की आवश्यकता नहीं है या कला को पढ़ने की जरूरत नहीं है। फिर कलाकार के जीवन, उसकी रचना प्रक्रिया, उसके माध्यम, उसके संघर्ष आदि के बारे में लोगों को बताने की जरुरत क्यों है? 

राशिद अहमद की एक पेंटिंग।


मनुष्य स्वभाव से ही दोहरी मानसिकता रखता है, एक तरफ वह अपने आपको विभिन्न माध्यमों से व्यक्त करना चाहता है, दूसरी तरफ चाहता है कि उसकी अभिव्यक्ति को लेकर उसे किसी तरह के सवालों का सामना न करना पड़े, वह रहस्यमय बनी रहे, कलाकारों पर भी यह बात लागू होती है। आज ऐसे कलाकारों की संख्या बढ़ती जा रही है जो इस बात को बड़े गर्व से कहते हैं कि उनका काम रचना है, रचना का अर्थ बताना नहीं, यदि उनकी रचना का कोई अर्थ लोगों की पकड़ में नहीं आ रहा है, उसे कोई समझ नहीं पा रहा है तो यह उनकी समस्या है। इसके लिए लोग समाज में कला चेतना के अभाव को भी दोषी देते हैं। पर, इसके लिए जिम्मेदार कौन है? और इस स्थिति को बदलने में क्या कलाकारों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए?

-डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

Sunday, May 3, 2026

बिंदु में समाहित संसार: राशिद अहमद की ‘बिंदुः डॉट्स सीरिज’”

राशिद अहमद अपनी पेंटिंग्स के साथ। फोटोः प्रवीण महतो


एक बिंदु में सब कुछ समाहित हैयहीं से सृष्टि का आरंभ होता है और अंत भी उसी में विलीन हो जाता है। विज्ञान के सुक्ष्मदर्शी विश्लेषण से लेकर अंतरिक्ष से सृष्टि के अवलोकन की सुक्ष्मता व उसका अनंत विस्तार इसी बिंदु का विस्तार है। इसी दार्शनिक अवधारणा को अपनी कला में विस्तार देते हैं कलाकार राशिद अहमद। उनकी एकल प्रदर्शनी बिंदुः डॉट्स सीरिजका उद्घाटन 2 मई 2026 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एनेक्सी गैलरी में हुआ।

प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर सुषमा बहल, राशिद खान, डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज, अनूप कामथ, पूर्व विधायक दुर्गेश पाठक और अन्य अतिथि।  


प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में क्यूरेटर एवं कला समीक्षक सुश्री सुषमा बहल उपस्थित थीं। इस अवसर पर क्यूरेटर अनूप कामथ, डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज और श्री दुर्गेश सहित अनेक कला-प्रेमी मौजूद रहे। कलाकार अरुण बोरा, उमाशंकर पाठक, इबरार अहमद, अनामिका एस और क्यूरेटर प्रवीण महतो सहित अनेक कलाकारों और कला प्रेमियों की उपस्थिति ने आयोजन को और समृद्ध बनाया।

प्रवीण महतो, राशिद अहमद, अरूण बोहरा, उमा शंकर पाठक, डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज और अनूप कामथ।


राशिद अहमद की कला में गहरे रंगोंविशेषकर काले और भूरेकी प्रधानता है, जिनके माध्यम से वे ऐसी दृश्यावली रचते हैं जिसमें एक ओर प्रत्यक्ष जगत का आभास होता है, तो दूसरी ओर रहस्य की गहराई भी बनी रहती है। उनकी कई रचनाओं में नीले रंग के साथ ही भूरे रंग की हल्की-गहरी रंगतों का प्रयोग भी है जो उनकी कला को विस्तार देता है। राशिद समस्त ब्रह्मांडजिसमें मनुष्य भी शामिल हैको एक बिंदुके रूप में देखते हैं, और इस दृष्टि से आकार के निराकार हो जाने की चेतना को व्यक्त करते हैं। कोई भी परिचित आकार उनकी रचनाओं में अनुभूति के स्तर पर ही जागृत होता है, उसे उसके भौतिक रूप के स्थान पर सार-तत्व के रुप में ही देखा-समझा जा सकता है। 



कैनवास पर गतिमान रेखाओं के साथ बिंदु का एक दिशा से दूसरी दिशा में विस्तार, उनके आकारों में भिन्नता सृष्टि की गतिशीलता की अभिव्यक्त है। वह कहते हैं कि कैनवास पर जो रेखाएँ हैं, वह यात्रा है। यदि यह कहा जाए कि उनके कैनवास पर जो रेखाएँ हैं, वह किसी नक्शे की तरह पृथ्वी को विभाजित करती हैं, तो कुछ गलत नहीं होगा। उनकी रचनाएँ इसी अनुभूति के साथ जीवंत होती हैं कि उनमें मानव सभ्यता की यात्रा समाहित है, और इस चराचर संसार की गति का प्रतिकात्मक अंकन भी है। उनकी रचनाओं में परतों का अत्यधिक महत्व है। अक्सर एक परत के पीछे से दूसरी परत झांकती दिखाई देती है। राशिद इसे जीवन के अनुभवों से जोड़ते हैं। उनके अनुसार व्यक्ति की जितनी उम्र होती है, उतने ही वर्ष की परतें उसके व्यक्तित्व का हिस्सा होती हैं। कई बार सतह पर जैसे कुछ खुरचा गया प्रतीत होता है, क्या यह जीवन की विकट स्थितियों की खरोंच हैं, कहना मुश्किल है।






उनकी कला किसी डिजाइन-प्रधान संरचना की बजाय भाव और विचार के स्तर पर संवाद करती है। उनकी रचनाएँ एकरेखीय दृश्यात्मक अनुभव को अस्वीकार करते हुए बहुस्तरीय अर्थों और व्याख्याओं की संभावना खोलती हैं। एक्रेलिक और ऑयल रंगों के साथ-साथ कपड़ा, पेपर और रेत जैसे माध्यमों का प्रयोग उनके कार्यों में गहराई और उभरे हुए टेक्सचर को जन्म देता है जो दर्शकों को आकर्षित करता है।


इस अवसर पर सुषमा बहल ने कहा कि राशिद की रचनाओं में पृथ्वी, जल, आकाश, पहाड़ और वृक्षसभी तत्व एक साथ आभासित होते हैं, मानो समूचा प्रकृति-तंत्र एक ही बिंदु में सिमट आया हो।



Wednesday, April 29, 2026

आर्ट स्पेक्ट्रा 2026 प्रदर्शनी Art Spectran 2026 exhibition




नई दिल्ली की आईफैक्स आर्ट गैलरी में 24 से 30 अप्रैल 2026 तक अमृता प्रकाश की क्यूरेट की हुई आर्ट स्पेक्ट्रा 2026 समूह प्रदर्शनी नई संभावनाओं को सामने लाती है। यह प्रदर्शनी इस बात को स्थापित करती है कि कला में क्या और कैसी कला से अधिक महत्वपूर्ण है होना। कला का होना अपने आप में मनुष्य के जीवन की ऐसी घटना है जिसका मूल्यांकन करना संभव नहीं है। कला का होना दरअसल मनुष्य के होने का एक आयाम है जिसे कलाकार अपने स्तर पर हमेशा पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। इस प्रदर्शनी में एकदम युवा कलाकार भी हैं और उम्रदराज कलाकार भी। यह देख कर सुखद अनुभूति होती है कि कितने ही ऐसे कलाकार हैं जिनका नाम ज्यादातर लोग नहीं जानते हैं पर वह अपने स्तर पर बहुत ही प्रभावशाली काम कर रहे हैं। इस प्रदर्शनी में रेजिन में नए प्रयोग भी देखने को मिले तो साथ ही चारकोल में प्रभावशाली व्यक्ति चित्र भी। 



प्रदर्शनी की क्यूरेटर अमृता प्रकाश इस बात के लिए बधाई की हक़दार हैं कि उन्होंने कई कलाकारों को प्रदर्शनी का अवसर देकर उनकी कला को संभावनाओं का नया आकाश दिया है। कला की उड़ान की कोई सीमा नहीं है, पर उसमें उड़ना पहली शर्त है। यह प्रदर्शनी इसी उड़ान को सामने लाने का काम करती है।



प्रदर्शनी में शामिल अरविद कुमार कृष्णन, प्रदीप लखेरा, शिखा वर्मा, शांति विंजमुरी, अनिमेश देबनाथ, सुनील कुमार, आरशी खानम, राहुल बसवाल, दीबा कुरैशी, आदि के काम प्रभावित करते हैं। प्रदर्शनी में शामिल अन्य कलाकारों में तान्या आनंद, सुरभी संद सुराना, आस्था बिदानी, प्रिया भारद्वाज, प्रेरणा सेन, कार्तिक, विशाखा भल्ला, योगिता श्रीवास्तव, रुचि गइराला, उदभाष मुखर्जी, कविता कटारिया, शालू खंडेलवाल, शुभम कौल, हशमित वर्मा, राकेश सोनकुसारे, अश्विन कुमार, विजया, शांति श्रीवास्तव का काम भी अच्छा है। 



कला में हमेशा कुछ बेहतर करने की संभावना बनी रहती है, जो इस प्रदर्शनी को देखकर साबित होता है। कोई भी रचना कभी भी पूर्ण नहीं होती, चाहे कोई कितना ही बड़ा और मशहूर कलाकार क्यों न हो। इस प्रदर्शनी में शामिल कलाकारों के साथ एक अच्छी बात यही है कि सभी कला में अपनी राह तलाश रहे हैं। कुछ का सफर अभी शुरु हुआ है तो कई इस सफर पर काफी आगे बढ़ चुके हैं। 





Monday, April 27, 2026

स्मृति, स्थापत्य और अमूर्तन: स्मिता जैन की कला

एक शहर जो यादों में बसा है, कौन सा शहर, यह नहीं पता पर अपनी देश और विदेश की यात्राओं में मिले भवन स्थापत्य और शहर की संरचना के अनुभवों को स्मिता जैन एक दृश्य भाषा में प्रस्तुत करती हैं। शहर की घनी बसाहट में कहीं-कहीं इंसान की उपस्थिति दिखाई देती है पर जहाँ वह उपस्थित नहीं है, वहाँ उसकी धड़कन हैं, उसके सपने हैं। पिरामिड और त्रिकोण उनकी रचनाओं में सांस्कृतिक विलयन के रूप में सामने आता है। अपनी पेंटिंग्स के माध्यम से वह एक शहर को संपूर्णता में देखने की एक अलग दृष्टि प्रस्तुत करती हैं। 




एक ऐसा शहर, जो स्मृतियों में बसा है—पर जिसकी कोई निश्चित पहचान नहीं। देश और विदेश की यात्राओं से संचित अनुभवों को स्मिता जैन अपनी विशिष्ट दृश्य भाषा में रूपांतरित करती हैं। उनके चित्रों में शहर केवल भौतिक संरचना नहीं, बल्कि एक जीवित इकाई के रूप में उभरता है, जहाँ स्थापत्य, स्मृतियाँ, आकांक्षाएँ और मानवीय ऊर्जा एक साथ सक्रिय रहती हैं। 


उनके कैनवास पर दिखाई देने वाले भवन यथार्थवादी प्रतीत होते हुए भी पूर्णतः यथार्थ के बंधन में नहीं बँधे। यहाँ अमूर्तन का गहरा प्रभाव है, जो इमारतों को किसी विशिष्ट स्थान का चित्रण न बनाकर उसकी अनुभूति में बदल देता है। कई बार संरचनाएँ अधूरी-सी लगती हैं—मानो वे स्मृति में धुंधली पड़ गई हों या बनते-बनते ठहर गई हों। यही गुण उनके शहरों को एक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक परिदृश्य में रूपांतरित करता है। 


उनकी चित्र-भाषा में रेखाओं की लय, आकृतियों का दोहराव और स्थान का संतुलित विभाजन एक ऐसी संरचना रचते हैं, जहाँ ठोस और अमूर्त के बीच निरंतर संवाद चलता है। परिणामस्वरूप, उनके शहर एक साथ परिचित भी लगते हैं और अनजाने भी—जैसे वे देखे हुए भी हों और स्मरण में बसे हुए भी। 


भवनों के तिकोने शिखर उनकी कला का एक विशिष्ट तत्व हैं, जिनमें पिरामिडीय संरचना की झलक मिलती है। यह रूप केवल स्थापत्यिक प्रयोग नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकेत भी है—एक ऐसा सार्वभौमिक प्रतीक, जो विभिन्न सभ्यताओं में समान रूप से उपस्थित रहा है। जब ये शिखर सुनहरे रंग में उभरते हैं, तो वे ऊर्जा, चेतना और मानवीय आकांक्षाओं के प्रतीक बन जाते हैं। 


रंग योजना उनके कार्यों का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। नीले, भूरे, लाल और सुनहरे रंगों का संतुलित प्रयोग शहर के विविध भावों को व्यक्त करता है—उदासी, रहस्य, ऊर्जा और आशा। विशेष रूप से सुनहरा रंग उनके चित्रों में एक प्रतीकात्मक चमक लाता है, जो शहरी जीवन के सपनों और संभावनाओं को उजागर करता है। 

उनकी प्रारंभिक रचनाओं में अमूर्तन अधिक प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देता है, जहाँ वे रंगों और रेखाओं के माध्यम से अस्तित्व के गहरे प्रश्नों को टटोलती हैं। यही अमूर्त दृष्टि बाद में उनके शहरी चित्रण में समाहित हो जाती है, जिससे उनके शहर अनुभव, स्मृति और कल्पना के जटिल संलयन बन जाते हैं। 

कभी-कभी उनके चित्र धुंधली स्मृतियों की तरह उभरते हैं—अस्पष्ट, परंतु गहरे। यह धुंधलापन दर्शक को आमंत्रित करता है कि वह अपने अनुभवों और स्मृतियों को इन दृश्यों में जोड़ सके। हाल के कार्यों में उनके चौकोर, खंभेनुमा रूप स्थापत्य को नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयास हैं, जहाँ संरचना और अमूर्तन का संतुलन उनकी परिपक्व कलाभाषा को दर्शाता है। इस प्रकार, स्मिता जैन की कला एक ऐसी दृश्य दुनिया रचती है, जो केवल देखने का नहीं, बल्कि अनुभव करने का आमंत्रण देती है—जहाँ शहर बाहरी नहीं, भीतर घटित होता है।
-डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज