Sunday, March 15, 2026

Still I Rise: women’s saga


Sharmila Sharma; Dr. Ved Prakash Bhardwaj; Deepshika Bishoyi; and Praveen Mahto.




Still I Rise is not merely an exhibition of women artists; it is a women’s saga—a collective voice for identity and existence. Each painting in the exhibition tells a different story, sometimes loudly and sometimes quietly. 



In its third edition, Still I Rise, the annual all-women exhibition by Shailja Art Gallery, continues as a powerful affirmation of resilience, persistence, and creative freedom. What began as a celebration of women’s voices has grown into a meaningful platform—one that showcases artistic excellence while centring lived experiences and layered identities within contemporary practice. 

painting by Archana Jha



The title draws strength from the iconic poem Still I Rise by Maya Angelou—a timeless anthem of dignity and defiance. Angelou’s words speak of rising despite erasure, marginalisation, and struggle. This exhibition is not about survival alone; it is about standing one’s ground and defining oneself on one’s own terms. 
Painting by Yasmin Sultana



The participating artists—including Yasmin Sultana, Archna Jha, Neena Khare, Monika Sonik, Aasha Radhika, Alka Chadha Harpalani, Alpa Palkhiwala, Amrita Ghosh, Swati Vishvnath Sabale, Anshika Anand, Aparna Anand Singh, Moneka Sonik  and Harsh Inder Loomba, among others—unveil different realities of life through both figurative and abstract expressions. 
(from left to right): Dr. Ved Prakash Bhardwaj, Archana Sinha, Ashok Bhoumick, Anamika, Shailja Jain, Yasmin Sultana, and Sunil Kumar. 


painting by Swati Vishwanath Sabale



Through their works, they bring forward fragments of memory, emotion, and lived experience, translating them into visual narratives that resonate across personal and collective spaces. Each artist brings something deeply personal to the exhibition. Some draw inspiration from memories of childhood and home, while others explore themes of identity, mythology, labour, or the everyday realities of womanhood. 



Their materials and styles may differ—ranging from painting and woodwork to mixed media—but what unites them is authenticity. Each work becomes a story, told through colour, texture, and form. Every painting carries its narrative. Some of these stories are familiar—stories we have heard before—while many remain unheard, hidden between layers of colour, gestures, and silence. Together, these works reveal the complexity of women’s experiences: moments of strength, vulnerability, resistance, and hope. 

Painting by Alka Chadha Harpalani


When put together, these practices create a conversation that spans time and space. There is no single narrative, no single way of rising. Yet in every story shared and every canvas displayed, the message remains clear:

We are here. 
We have been here. 
And we rise.

स्टिल आई राइज़ : एक स्त्री गाथा

स्टिल आई राइज़ केवल महिला कलाकारों की एक प्रदर्शनी नहीं है; यह स्त्रियों की एक गाथा हैपहचान और अस्तित्व की सामूहिक आवाज़। इस प्रदर्शनी की प्रत्येक पेंटिंग एक अलग कहानी कहती हैकभी ऊँची आवाज़ में, तो कभी चुपचाप।



अपने तीसरे संस्करण में, स्टिल आई राइज़, शैलजा आर्ट गैलरी, गुरुग्राम द्वारा आयोजित वार्षिक सर्व-महिला प्रदर्शनी, दृढ़ता, निरंतरता और रचनात्मक स्वतंत्रता की एक सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में सामने आती है। जो शुरुआत महिलाओं की आवाज़ों के उत्सव के रूप में हुई थी, वह अब एक अर्थपूर्ण मंच में विकसित हो चुकी हैजहाँ समकालीन कला के भीतर निहित जीवनानुभवों और बहुस्तरीय पहचानों को केंद्र में रखते हुए कलात्मक उत्कृष्टता को प्रस्तुत किया जाता है।



इस प्रदर्शनी का शीर्षक माया एंजेलो (Maya Angelou) की प्रसिद्ध कविता Still I Rise से प्रेरित है, जो- स्त्री गरिमा और प्रतिरोध का एक कालजयी गीत। एंजेलो के शब्द उस साहस की बात करते हैं जो स्त्रियों को मिटाए जाने, हाशिये पर धकेले जाने और संघर्षों के बावजूद फिर से उठ खड़े होने की प्रेरणा देता है। यह प्रदर्शनी केवल जीवित रहने की कहानी नहीं है; यह अपने स्थान पर दृढ़ता से खड़े होने और स्वयं को अपनी शर्तों पर परिभाषित करने की घोषणा है।

इस प्रदर्शनी में भाग लेने वाली कलाकारोंअर्चना झा, यास्मिन सुल्ताना, नीना खरे, मोनिका सोनिक, आशा राधिका, अलका चड्ढा हरपलानी, अल्पा पालखिवाला, अमृता घोष, स्वाति विश्वनाथ सबले, अंशिका आनंद, अपर्णा आनंद सिंह, हर्ष लोम्बा, सहित अन्य नेअपने चित्रों के माध्यम से जीवन की विभिन्न सच्चाइयों को उजागर किया है। उनके कार्यों में कभी मूर्त तो कभी अमूर्त अभिव्यक्तियाँ दिखाई देती हैं। इन कलाकृतियों के माध्यम से वे स्मृतियों, भावनाओं और जीवन के अनुभवों के अंशों को सामने लाती हैं, जो व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर गूँजते हैं।



प्रत्येक कलाकार इस प्रदर्शनी में कुछ अत्यंत निजी और आत्मीय लेकर आयी है। कुछ कलाकार बचपन और घर की स्मृतियों से प्रेरणा लेती हैं, तो कुछ पहचान, मिथक, श्रम और स्त्री जीवन की रोज़मर्रा की वास्तविकताओं को अपने कार्यों में तलाशती हैं। उनकी सामग्री और शैली भिन्न हो सकती हैपेंटिंग और लकड़ी के कार्य से लेकर मिश्रित माध्यम तकलेकिन जो उन्हें एक सूत्र में बाँधता है, वह है उनकी सच्चाई और प्रामाणिकता। प्रत्येक कृति रंग, बनावट और रूप के माध्यम से कही गई एक कहानी बन जाती है।

हर चित्र अपने भीतर एक कथा समेटे हुए है। इनमें से कुछ कहानियाँ परिचित हैंऐसी कहानियाँ जिन्हें हमने पहले भी सुना हैजबकि कई अब भी अनकही हैं, जो रंगों, संकेतों और मौन की परतों में छिपी हुई हैं। ये सभी मिलकर स्त्री अनुभवों की जटिलता को सामने लाती हैंसाहस, संवेदनशीलता, प्रतिरोध और आशा के अनेक क्षणों के साथ।

जब ये सभी कृतियाँ एक साथ रखी जाती हैं, तो वे भौगोलिक सीमाओं और पीढ़ियों के पार एक संवाद रचती हैं। यहाँ कोई एक ही कथा नहीं है, न ही उठ खड़े होने का कोई एक तरीका। फिर भी, हर साझा कहानी और हर प्रदर्शित कैनवास में एक स्पष्ट संदेश उभरता है

हम यहाँ हैं।
हम हमेशा से यहाँ रही हैं।
और हम उठती रहेंगी।


Friday, March 13, 2026

आइफेक्स की स्टूडियो पॉटरी प्रदर्शनी


प्रदर्शनी विचारः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज, कलाकार जेपी सिंह और राजेंद्र प्रसाद सिंह


ल इंडिया फाइन आर्ट एंड क्राफ्ट सोसायटी (AIFACS), नई दिल्ली में 11 मार्च से 22वीं राष्ट्रीय स्टूडियो पॉटरी प्रदर्शनी शुरू हुई है। इस प्रदर्शनी में देशभर के लगभग एक सौ कलाकारों की कृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। ललित कला के क्षेत्र में स्टूडियो पॉटरी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और यह प्रदर्शनी इस माध्यम की विविध संभावनाओं और समकालीन प्रयोगों को सामने लाती है।

जेपी सिंह अपनी प्रदर्शित रचनाओं के साथ।

 

प्रदर्शनी में पारंपरिक पॉटरी के साथ-साथ ऐसे अनेक काम भी देखने को मिलते हैं जिनमें कलाकारों ने नए रूप और शिल्पगत प्रयोग किए हैं। सामान्यतः पॉटरी को उपयोगिता से जोड़कर देखा जाता रहा है। प्लेट, मग और अन्य घरेलू उपयोग की क्रॉकरी लंबे समय तक इस कला का प्रमुख हिस्सा रही है। लेकिन आज के कलाकार इस माध्यम को केवल उपयोगिता तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे कलात्मक अभिव्यक्ति के नए आयामों के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं।




प्रदर्शनी में शामिल कई कृतियाँ शिल्प कला की श्रेणी में आती हैं, जबकि कुछ कामों में संस्थापन कला की झलक भी दिखाई देती है। इससे स्पष्ट होता है कि स्टूडियो पॉटरी अब केवल उपयोगी वस्तुओं के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि समकालीन कला के व्यापक परिदृश्य में अपनी अलग पहचान बना रही है।




पॉटरी में ग्लेज़िंग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आमतौर पर पॉटरी में चटख रंगों और आकर्षक डिज़ाइनों पर विशेष ध्यान दिया जाता है, लेकिन स्टूडियो पॉटरी इससे अलग होती है। यह कलाकार का व्यक्तिगत सृजन होता है, जिसमें वह नवीनता और प्रयोग को अधिक महत्व देता है। स्टूडियो पॉटरी फैक्ट्री की तरह बड़े पैमाने पर तैयार नहीं की जाती। अक्सर कलाकार यदि प्लेट भी बनाता है तो हर प्लेट अपने आप में अलग और विशिष्ट होती है।








प्रदर्शनी में भी यही विशेषता देखने को मिलती है। इस संदर्भ में कलाकार जे.पी. सिंह के काम का उल्लेख किया जा सकता है, जिन्होंने पॉटरी के विविध रूपों में काम किया है। इसके अलावा कई कलाकारों ने पूरी तरह शिल्पात्मक कृतियाँ भी रची हैं, जो इस माध्यम की व्यापक संभावनाओं को उजागर करती हैं।

Thursday, March 12, 2026

सेरामिक में शिल्पः खुर्जा द क्ले स्पेस प्रदर्शनी

प्रदर्शनी विचारः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

वरिष्ठ कलाकार अनवर और सेरामिक कलाकार सीरज सक्सेना के साथ डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज


खुर्जा द क्ले स्पेस शीर्षक से सेरामिक कलाकारों की एक समूह प्रदर्शनी 11 से 17 मार्च 2026 तक नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एनेक्सी गैलरी में आयोजित की गई है। खुर्जा उत्तर प्रदेश का वह शहर है जो लंबे समय से पॉटरी और सिरेमिक शिल्प के लिए प्रसिद्ध रहा है। सीरज सक्सेना ने वहां अपना एक स्टूडियो स्थापित किया है, जहाँ कलाकारों के साथ मिलकर सिरेमिक में विभिन्न प्रयोग करते हैं।

सीरज सक्सेना की रचनाएं



इस प्रदर्शनी की एक विशेषता यह भी है कि कुछ कलाकारों ने ऐसे शिल्प रचे हैं जिनके रूप पारंपरिक पॉटरी से मेल खाते प्रतीत होते हैं, परंतु उनका उद्देश्य उपयोगितावादी वस्तु बनाना नहीं है। वे मूलतः मूर्तिकला हैंऐसी कृतियाँ जो पॉटरी की परिचित संरचनाओं को एक नए कलात्मक अर्थ में रूपांतरित करती हैं। शायद यही इस प्रदर्शनी की सबसे सुंदर और महत्वपूर्ण विशेषता है, जहाँ पारंपरिक शिल्प और समकालीन कला एक-दूसरे से संवाद करते हुए दिखाई देते हैं।

संजय सावंत की एक रचना


इस प्रदर्शनी में अनुजा पंजवानी मिन्हास, जया रावल, मिलन करमाकर, रितिका आनंद, संजय सामंत, सीरज सक्सेना, सूरज गोराई, और जहीर अहमद के काम प्रदर्शित किये गये हैं। प्रदर्शनी का नेतृत्व सीरज सक्सेना कर रहे हैं। यह सभी कलाकार मुख्यतः सिरेमिक माध्यम में काम कर रहे हैं और इनका काम किसी न किसी रूप में खुर्जा से जुड़ा हुआ है। इनमें से कई कलाकार वहीं रहकर काम करते हैं, जबकि कुछ कलाकार समय-समय पर खुर्जा जाकर वहाँ के स्टूडियो और पारंपरिक पॉटर्स के साथ मिलकर अपनी कृतियाँ तैयार करते हैं।

जया रावल का सेरामिक शिल्प


कला की दुनिया में परिवर्तन सामान्यतः बहुत तीव्र गति से नहीं होते। किसी भी नई प्रवृत्ति या माध्यम को स्वीकार किए जाने में समय लगता है, और वह धीरे-धीरे एक लंबी प्रक्रिया के बाद सामने आती है। सिरेमिक कला के संदर्भ में भी कुछ ऐसा ही हुआ। लंबे समय तक सिरेमिक को मुख्यतः पॉटरी के रूप में ही देखा जाता रहा। कलाकारों ने सिरेमिक प्लेटों या पात्रों पर चित्रांकन अवश्य किया, किंतु यह विचार कि सिरेमिक एक स्वतंत्र मूर्तिकला माध्यम भी हो सकता है, कला-जगत में बहुत बाद में गंभीरता से उभरा।

जहीर अहमद की रचनाएं


हालाँकि टेराकोटा में मूर्तिकला के उदाहरण पहले से मिलते हैं, फिर भी भारत में सिरेमिक को लंबे समय तक उपयोगितावादी पॉटरी की परंपरा से ही जोड़ा जाता रहा। इस धारणा को बदलने की दिशा में कुछ कलाकारों ने महत्वपूर्ण प्रयोग किए। उदाहरण के लिए ज्योत्सना भट्ट और पीआर दरोज जैसे कलाकारों के काम को देख सकते हैं जिन्होंने सिरेमिक के साथ ऐसे रचनात्मक प्रयोग किए जिनसे इस माध्यम की संभावनाएँ सामने आईं। पीआर दरोज  ने सिरेमिक में ऐसे कार्य प्रस्तुत किए जिन्होंने पॉटरी की पारंपरिक अवधारणा को तोड़ते हुए इसे एक स्वतंत्र कलात्मक माध्यम के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। उनके प्रयोगों ने बाद की पीढ़ी के कलाकारों को नए रूपों और संरचनाओं की खोज के लिए प्रेरित किया।

 

सीरज सक्सेना की रचनाएं

इसी परंपरा में सीरज सक्सेना का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने न केवल सिरेमिक में नए प्रयोग किए, बल्कि अन्य कलाकारों को भी इस माध्यम में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया।

मिलन करमाकर की रचनाएं


इस प्रदर्शनी को केवल सिरेमिक की प्रदर्शनी कहना पर्याप्त नहीं होगा। अधिक उचित यह है कि इसे मूर्तिकला की प्रदर्शनी के रूप में देखा जाए, जिसमें कलाकारों ने सिरेमिक माध्यम में विविध शिल्प रचे हैं। प्रदर्शनी में कुछ कार्य ऐसे हैं जिनमें पॉटरी की झलक अवश्य दिखाई देती है, किंतु वे पारंपरिक पॉटरी की सीमाओं से आगे जाते हैं। इसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में ऐसे कार्य भी हैं जो पूर्णतः त्रि-आयामी रूपों में निर्मित हैं। कुछ कृतियाँ ऐसी भी हैं जिन्हें दीवारों पर टाँगा जा सकता है, जिससे सिरेमिक माध्यम की अभिव्यक्ति केवल उपयोगितावादी वस्तुओं तक सीमित न रहकर समकालीन मूर्तिकला और इंस्टॉलेशन की दिशा में विस्तृत होती दिखाई देती है।

अनुजा पंजवानी मिन्हास की रचनाएं


सीरज सक्सेना वैसे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने सिरेमिक म्यूरल्स के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने भारत के अलावा कई अन्य देशों में भी बड़े पैमाने पर सिरेमिक म्यूरल्स का निर्माण किया है, जिनमें इस माध्यम की संरचनात्मक संभावनाएँ और दृश्य प्रभाव दोनों ही स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उनके ये म्यूरल्स सिरेमिक को केवल पॉटरी या छोटे आकार की कलाकृतियों तक सीमित नहीं रहने देते, बल्कि इसे वास्तुशिल्पीय और सार्वजनिक कला के व्यापक संदर्भ में स्थापित करते हैं। इस प्रदर्शनी में भी उनके कुछ ऐसे ही कार्य शामिल हैं, जिनमें सिरेमिक के बड़े और बहुस्तरीय रूपों के माध्यम से एक विशिष्ट दृश्य प्रभाव निर्मित होता है। इन कृतियों में रूप, बनावट और सतह के साथ किए गए प्रयोग सिरेमिक को एक स्वतंत्र मूर्तिकला माध्यम के रूप में देखने की संभावना को और अधिक सशक्त बनाते हैं।

अनुजा पंजवानी मिन्हास के कामों में से कुछ में मूल संरचना पारम्परिक पॉटरी की है जिसे वह कैनवास की तरह इस्तेमाल करती हैं।

संजय सामंत पारम्परिक पॉटरी को अलग तरह से फर्श और दीवार पर संयोजित करते हुए उनका विस्तार करते हैं। मिलन करमाकर प्रतिमाओं के साथ ही प्लेट्स बनाते हैं जिनपर चित्रकारी करते हैं। रितिका आनंद की रचनाओं में भूदृश्य के साथ ही प्राकृतिक संरचनाएं और जीवन प्रक्रिया का आरम्भ अंकुरण मुख्य विषय है। सूरज गोराई पॉटरी की संरचनाओं को आधार बनाते हुए उन्हें शिल्प में बदल कर कला प्रेमियों को अलग अनुभव संसार में ले जाते हैं। 

सूरज गोराई की रचनाएं


इस प्रदर्शनी में शामिल जया रावल के काम पूरी तरह शिल्प कहे जा सकते हैं जिनकी रचना सेरामिक माध्यम में की गई है। जया ने पहले भोपाल में काम किया है पर इन दिनों मुंबई में रहती हैं और सेरामिक में काम करने के लिए खुर्जा जाती हैं। ज़हीर अहमद परम्परागत पॉटर हैं जो अपने कामों में हमेशा कुछ नए प्रयोग करते रहते हैं। इस प्रदर्शनी में शामिल उनके कामों में खिलौनों जैसी संरचनाएं हैं पर उन्हें वह सजावटी वस्तुओं के दायरे से आगे ले जाते हुए कलात्मक बना देते हैं।

रितिका आनंद की रचनाएं


Monday, March 2, 2026

भौगोलिक सीमांत (𝘓𝘪𝘮𝘪𝘯𝘢𝘭 𝘎𝘦𝘰𝘨𝘳𝘢𝘱𝘩𝘪𝘦𝘴) : परमजीत सिंह के भूदृश्य

कला विचारः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज



परमजीत सिंह आधुनिक भारतीय कला के प्रमुख कलाकार हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकृति के सौंदर्य और उसके देखे-अनदेखे पहलुओं को देखने व खोजने की एक नई दृष्टि दी है। वडेहरा आर्ट गैलरी द्वारा आयोजित उनकी एकल प्रदर्शनी भौगोलिक सीमांत (𝘓𝘪𝘮𝘪𝘯𝘢𝘭 𝘎𝘦𝘰𝘨𝘳𝘢𝘱𝘩𝘪𝘦𝘴) 27 फरवरी से 3 मार्च, 2026 तक नई दिल्ली के बीकानेर हाउस की मेन गैलरी में हुई। यह प्रदर्शनी वडेहरा आर्ट गैलरी, डिफेंस कालोनी, नई दिल्ली में 6 मार्च 2026 से उपलब्ध रहेगी।



प्रकृति अपने स्वभाव में विविधता और रूपगत पूर्णता के साथ उपस्थित रहती है। वह एक साथ दृश्य और अदृश्य, ठोस और तरल, प्रकाश और छाया, विस्तार और रिक्ति का संगम है। प्रकृति के दो सीमांतों के बीच स्थिर दृश्य का चित्रण पेंटिंग में होता है पर उस स्थिर दृश्य में भी एक गति होती है। स्थिरता में हलचल का यह आभास परमजीत सिंह जैसे कलाकार के रचना संसार को महत्वपूर्ण बनाता है। अधिकांश कलाकार जब भूदृश्य रचते हैं, तो वे प्रकृति के प्रत्यक्ष, दृश्य और भौतिक रूप को केंद्र में रखते हैंपेड़ों, आकाश, जल, क्षितिज और रंग-संयोजन के माध्यम से वे एक स्थल-विशेष का आभास निर्मित करते हैं। किंतु परमजीत सिंह उन विरल कलाकारों में हैं जो प्रकृति के सीमांत क्षेत्र को अपना विषय बनाते हैं। यह सीमांत क्षेत्र नहीं है, कोई भौगोलिक सीमा नहीं है; यह दृश्य में उपस्थित भाव, स्मृति और अनुभूति का वह प्रदेश है जहाँ दृश्यात्मक अनुभव आंतरिक स्पंदन में परिवर्तित हो जाता है। स्थिर भू-दृश्य को रंगों के प्रत्यावर्तन और प्रकाश व छाया के खेल से वह स्थिर नहीं रहने देते।



उनके चित्रों में प्रकृति का उजास चकाचौंध पैदा नहीं करता, बल्कि एक मद्धिम, आत्मीय आलोक में प्रस्फुटित होता है। यहाँ प्रकृति दृश्य-सौंदर्य का प्रदर्शन नहीं करती; वह आत्मसंवाद का माध्यम बनती है। दर्शक जब उनके कैनवास के सामने खड़ा होता है, तो वह किसी विशिष्ट स्थल पर नहीं, बल्कि एक मानसिक क्षेत्र में उपस्थित होता है। एक मानसित क्षेत्र जो कल्पना और यथार्थ से एकसाथ संवाद करता है, जिसमें प्रकृति के सादृश्य रुपों की विपुलता के बोध के बीच एकांत उपस्थित रहता है, जहां मौन एक संवाद है, और आंतरिक शांति जिसमें अदृश्य हलचलें प्रकृति के निरंतर परिवर्तित स्वरूप को दर्शाती हैं। उनकी पेंटिंग्स सिर्फ दृश्य नहीं हैं, एक संकेत है, एक मौन संवाद है।



प्रकाश और छाया का आत्मीय व्याकरण

परमजीत सिंह की कला में प्रकाश और छाया केवल तकनीकी तत्व नहीं हैं; वे संरचना के दार्शनिक आयाम हैं। प्रकाश यहाँ किसी क्षणिक चमक का संकेत नहीं देता, बल्कि वह समय की गहराई का वाहक है। छाया दृश्य को ढँकती नहीं, बल्कि उसे विस्तार देती है। यह अंतःक्रिया दृश्य को उसके प्रत्यक्ष यथार्थ से अलग एक दूसरे स्तर पर स्थापित कर देती हैजहाँ बाह्य वस्तु का अस्तित्व उसके आंतरिक अर्थ में रूपांतरित हो जाता है। इससे उनकी रचनाओं में एक तरह की नाटकीयता जन्म लेती है। घने जंगलों की दुनिया में किसी एक जगह पर प्रकाश का प्रभाव या प्रकाशित मार्ग की अनुभूति, या पेड़ों के बीच से झांकता प्रकाशित आकाश, कहीं घने पेड़ों के बीच से आलोकित होता कोई एक अलग रंग, यह सब परमजीत सिंह की कला को रहस्यमय बनाता है, और शायद यही उनकी कला का सौंदर्य है कि वह सिर्फ सुंदर नहीं है, अनुभव नहीं है, वह चेतना का विस्तार भी है। उनकी एकल प्रदर्शनी, भौगोलिक सीमांत (𝘓𝘪𝘮𝘪𝘯𝘢𝘭 𝘎𝘦𝘰𝘨𝘳𝘢𝘱𝘩𝘪𝘦𝘴) में प्रकाश और छाया की चंचल गतिशीलता अपेक्षाकृत कम है, उसकी जगह स्थिरता अधिक दिखाई देती है। वडेहरा आर्ट गैलरी द्वारा आयोजित यह प्रदर्शनी 27 फरवरी से 3 मार्च 2026 तक बीकानेर हाउस में और उसके बाद 6 मार्च से वडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली में रहेगी। उनकी नई रचनाओं में वैसा आलोड़न नहीं है जो पहले हुआ करता था। इन चित्रों को देखकर किसी संत की संयमित और स्थिर साधना का बोध होता है, जैसे कोई गायक एक सुर पर स्थिर हो गया है। यहाँ कोई तीव्र नाटकीयता नहीं, कोई आकस्मिक झिलमिलाहट नहीं; बल्कि एक संयत, स्थिर और ध्यानपूर्ण आलोक है। यह स्थिरता दृश्य को कालातीत बनाती है। ऐसा लगता है जैसे समय ने स्वयं को विराम दे दिया हो और दृश्य किसी आंतरिक शांति में स्थिर हो गया हो।



परतों का शिल्प और गहराई की संरचना

परमजीत सिंह की रचना-प्रक्रिया बहुस्तरीय है। वे कैनवास पर अनेक परतों में कार्य करते हैंरंग की पारदर्शिता, अपारदर्शिता, मद्धिमता और उजास के सूक्ष्म संतुलन के साथ। यह परत-दर-परत निर्मिति चित्रों में केवल भौतिक गहराई नहीं लाती; यह अनुभव की गहराई भी रचती है। दर्शक जब चित्र को देखता है, तो उसकी दृष्टि सतह पर नहीं रुकती; वह भीतर उतरती जाती है।

यह विधि स्मृति की संरचना से मिलती-जुलती है। जैसे स्मृतियाँ एक-दूसरे पर आच्छादित होती हुई वर्तमान अनुभव को आकार देती हैं, वैसे ही विभिन्न रंगों की परतें दृश्य को उसके अंतिम रूप तक पहुँचाती हैं। परिणामस्वरूप, चित्र केवल एक दृश्य नहीं रहतावह एक मानसिक परिदृश्य (mental landscape) बन जाता है।



प्रकृति का आध्यात्मिक आयाम

परमजीत सिंह की रचनाओं में मानव की अनुपस्थित के बाद भी उसकी उपस्थिति का आभास बना रहता है। यह अनुपस्थिति उनकी कला का एक महत्वपूर्ण वक्तव्य है। यहाँ मनुष्य प्रकृति पर आधिपत्य स्थापित करने वाला प्राणी नहीं, बल्कि उसके मौन विस्तार में विलीन एक चेतना है। यह दृष्टि समकालीन समय की प्रकृति में हस्तक्षेपकारी प्रवृत्तियों के विपरीत एक संतुलित, विनम्र और आत्मसंयत दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

उनकी रचनाएँ किसी विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक वक्तव्य का प्रत्यक्ष उद्घोष नहीं करतीं, परंतु वे एक गहरी सांस्कृतिक संवेदना का संकेत अवश्य देती हैंजहाँ प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव की भूमि माना जाता है।

परमजीत सिंह के भूदृश्य दृश्य-यथार्थ के पुनरुत्पादन से आगे बढ़कर अनुभूति के आंतरिक भूगोल का मानचित्र तैयार करते हैं। वे प्रकृति को देखने का एक ऐसा तरीका प्रस्तुत करते हैं, जिसमें दृश्य और अदृश्य, प्रकाश और छाया, स्थिरता और गतिशीलता, सतह और गहराईसभी मिलकर एक ध्यानात्मक अनुभव रचते हैं।

उनकी कला हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति का सीमांत बाहर नहीं, भीतर है। उसे देखने के लिए आँख से अधिक संवेदना की आवश्यकता है। और शायद यही उनकी कृतियों की सबसे बड़ी उपलब्धि हैवे दर्शक को केवल देखने नहीं, बल्कि ठहरकर अनुभव करने के लिए आमंत्रित करती हैं।

सभी चित्र वडेहरा आर्ट गैलरी के सौजन्य से साभार।