Friday, March 20, 2026

समन्वय प्रदर्शनीः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज



कला रंग, रूप, प्रतीक और रेखाओं के समन्वय का परिणाम है। जब तक ये सभी तत्व कैनवास पर, या मिट्टी, धातु और लकड़ी के रूप में एक साथ नहीं आते, तब तक कला का वास्तविक जन्म नहीं होता। इसी प्रकार, जब तक कलाकार सामूहिक रूप से सृजन में सहभागी नहीं होते, तब तक कला का समुचित वातावरण भी निर्मित नहीं हो पाता। समन्वयशीर्षक से आयोजित यह समूह प्रदर्शनी इसी मूल भाव को केंद्र में रखती है और विविध कलाभिव्यक्तियों के माध्यम से उसे साकार करती है।

डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज, वंदना राकेश, अश्वनी कुमार पृथ्वीवासी, सतीश शर्मा और अपूर्वा गर्ग


20 मार्च 2026 से नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कमलादेवी कॉम्पलेक्स की गैलरी में आयोजित इस प्रदर्शनी का संयोजन दिल्ली आर्ट सोसायटी और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर द्वारा किया गया है। इस प्रदर्शनी को ज्योति कठपालिया ने क्यूरेट किया है। क्यूरेटर ने न केवल विभिन्न पीढ़ियों के कलाकारों को एक मंच पर लाया है, बल्कि उनके भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों को इस प्रकार संयोजित किया है कि प्रदर्शनी एक संवादात्मक अनुभव बन जाती है।

प्रेम सिंह के साथ शफी चमन, अशीमा मेहरोत्रा व अन्य।

डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज, अंजु कौशिक, अशीमा मेहरोत्रा, डॉ रमेश कांडिगिरी, कविता नायर और प्रशांत कलीता


इस प्रदर्शनी की एक प्रमुख विशेषता इसका बहुस्तरीय स्वरूप है, जहाँ वरिष्ठ और नवोदित कलाकारों के कार्य एक साथ उपस्थित होकर कला की निरंतरता और परिवर्तनशीलता दोनों को दर्शाते हैं। वरिष्ठ कलाकारों में प्रेम सिंह, कालीचरण गुप्ता, जगदीश चंदर, आनंद मोय बनर्जी, मीना देवरा, नीरज गुप्ता, सतीश शर्मा, राकेश कुमार गुप्ता, वंदना राकेश, अलका झाम्ब, श्रुति गुप्ता चंद्रा, प्रशांत कलीता के कार्य जहाँ अनुभव, गहराई और परिपक्वता का परिचय देते हैं, वहीं अंजु कौशिक, अपूर्वा गर्ग, गिरीश उरकुड़े, मोहन सिंगाने, अवनीत चावला, संजय रॉय, सुरेंद्र कुमार मिश्रा, अशीमा मेहरोत्रा आदि कलाकारों के कार्य समकालीन संवेदनाओं और प्रयोगशीलता को सामने लाते हैं।

डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज और गिरीश उरकुड़े

डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज और मोहन सिंगाने 


प्रदर्शनी में प्रस्तुत कलाकृतियाँ विषय और माध्यमदोनों स्तरों पर विविधता लिए हुए हैं। मूर्त चित्रों में जहाँ मानवीय भावनाओं, सामाजिक यथार्थ और सांस्कृतिक स्मृतियों का सजीव चित्रण देखने को मिलता है, वहीं अमूर्त कृतियाँ रंगों, आकृतियों और बनावट के माध्यम से आंतरिक अनुभवों और दार्शनिक चिंतन को व्यक्त करती हैं। इन दोनों के बीच संतुलन ही इस प्रदर्शनी के समन्वयशीर्षक को सार्थक बनाता है।




वंदना राकेश की रचना

प्रशांत कलीता की रचना


सतीश शर्मा की रचनाएं

अल्का झाम्ब व अन्य कलाकारों की रचनाएं



केवल चित्रकला तक सीमित न रहकर, प्रदर्शनी में सेरामिक और लकड़ी के शिल्प भी शामिल किए गए हैं, जो इसे त्रि-आयामी विस्तार प्रदान करते हैं। सेरामिक कृतियों में सतह, बनावट और रूप के साथ किए गए प्रयोग दर्शकों को आकर्षित करते हैं, जबकि लकड़ी के शिल्प प्राकृतिक तत्वों के साथ कलाकार की संवादशीलता को उजागर करते हैं। इन शिल्पों की उपस्थिति प्रदर्शनी को अधिक स्पर्शनीय और जीवंत बनाती है।

राकेश कुमार गुप्ता की पेंटिंग्स देखते दर्शक

क्यूरेटर ज्योति कठपालिया की दृष्टि इस पूरी प्रदर्शनी में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। उन्होंने केवल कलाकृतियों का चयन ही नहीं किया, बल्कि उन्हें इस प्रकार संयोजित किया है कि दर्शक एक दृश्य यात्रा का अनुभव करता हैजहाँ हर कृति अगली कृति से संवाद करती प्रतीत होती है। यह संयोजन दर्शक को न केवल देखने बल्कि सोचने और महसूस करने के लिए भी प्रेरित करता है।

अनिरुद्ध सागर का सेरामिक शिल्प


समग्र रूप से समन्वयएक ऐसी प्रदर्शनी है, जो कला के विभिन्न रूपों, माध्यमों और पीढ़ियों को एक साथ लाकर एक समृद्ध और बहुआयामी अनुभव प्रस्तुत करती है। यह केवल कलाकृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि विचारों, संवेदनाओं और रचनात्मक ऊर्जा का संगम हैजहाँ कला अपने व्यापक और जीवंत स्वरूप में प्रकट होती है।

Thursday, March 19, 2026

जीवन का नव-सृजन- अजला फाउंडेशन की प्रदर्शनी 'उज्जीवन'






अजला फाउंडेशन की वार्षिक प्रदर्शनी उज्जीवन शीर्षक से 19 मार्च 2026 को दिल्ली की गांधी दर्शन गैलरी में शुरु हुई। उज्जीवन का अर्थ है फिर से पनपना यानी पुनर्जीवन या दूसरे शब्दों में नये सिरे से रचना, देखना, विश्लेषित करना, अभिव्यक्त करना। करीब सौ कलाकारों की इस प्रदर्शनी में प्रत्येक कलाकार की रचना में यही दिखाई दिया। मूर्त व अमूर्त रचनाओं के समन्वित आयोजन में विभिन्न आयुवर्ग के कलाकार शामिल हैं। प्रदर्शित कलाकृतियों में पेंटिंग, शिल्प, ड्राइंग आदि शामिल हैं।




प्रदर्शनी में शामिल सभी कलाकारों के नाम गिना पाना और उनकी रचनाओं का विश्लेषण संभव नहीं है पर जिन कलाकारों के कामों ने अधिक प्रभावित किया उनमें अजय समीर, अमित कल्ला, प्रकाश चांदवडकर, पूजा मुदगल, नीरजा चांदना, प्रवीण सैनी, हर्ष लोम्बा, सुनीता लांबा, देवीदास खत्री, नीरज शर्मा, सुरजीत कुमार, विनोद गोस्वामी, बबिता पात्रा, राम ओंकार, वेद प्रकाश भारद्वाज, पंकज हरजाई, सचिन कुमार, शर्मिला शर्मा, प्रीति जैन, छाया दुबे, कविता राजपूत आदि के काम शामिल हैं।




उज्जीवन, संस्कृत से उत्पन्न यह शब्द पुनर्जीवन और पुनसृजन से संदर्भित है जो कला का एक आयाम है। कला में एक कलाकार जीवन को नये सिरे से खोजता, रचता और अभिव्यक्त करता है। उसकी अभिव्यक्ति का रुप कुछ भी हो सकता है, मूर्त या अमूर्त पर उसमें जीवन को नये सिरे से सिरजने की इच्छा ही केंद्र में होती है। प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं में यह बात साफ दिखाई देती है। अनेक कलाकारों के काम में जीवन के सार तत्व की खोज के रूप में हमें अमूर्त संरचनाओं का मुक्त संसार दिखाई देता है। इन रचनाओं में जीवन का रूप नहीं, उसका भाव प्रमुख है। दूसरी तरफ अनेक रचनाकारों ने आकृतिमूलक कामों के माध्यम से जीवन को सिरजा है।





प्रदर्शित आकृतिमूलक कामों में से कई में हमें अमूर्तन का प्रभाव भी दिखाई देता है। कई कलाकारों ने इसीलिए मानव आकृतियों को रचते समय उनके अंगों को अमूर्त रखा है। यही वास्तविक जीवन है, जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं है। यह जीवन को अलग तरह से देखने की दृष्टि है। कुछ कलाकारों के काम में अध्यात्म और दर्शन की अभिव्यक्ति है। जीवन अपने आप में ऐसा उलझा हुआ दर्शन है जिसे आज तक कोई पूरी तरह खोल नहीं पाया है। आध्यात्मिकता जीवन का आधार है। इन दोनों, अध्यात्म और दर्शन को मिलाकर कलाकारों ने जीवन को प्रतिकात्मक रूप में पुनः रचा है। प्रदर्शनी में शामिल शिल्पों में भी हमें यही दिखाई देता है।




पेंटिंग में कैनवास पर जब रंग अपनी आभा बिखेरते हैं, और जब आकार बनते-बिगड़ते हैं तो उनमें हमें जीवन का वह रूप दिखाई देता है जो उसके दृश्यरूप से एकदम अलग होता है। कैनवास जैसे जीवन की धड़कन बन जाता है। वहां हमें मानवीय आशाओं, सपनों और कल्पनाओं की उड़ान दिखाई देती है। उनमें जीवन अपने अनेकानेक रूपों में दिखाई देने लगता है। प्रत्येक चित्र को देखते हुए प्रत्येक दर्शक अपनी तरह से जीवन को फिर से खिलते हुए महसूस करता है।


Wednesday, March 18, 2026

Anjolie Ela Menon by Dr Ved Prakash Bhardwaj

Anjolie Ela Menon is among the artists who contributed most significantly to infusing Indian art with modernity. In the 1960s, she gave a new direction to her artistic journey by creating paintings that prioritized the female existence. The artistic environments of Mumbai—and subsequently Paris—honed the artist within her and gave it a distinct direction. She placed the utmost value on creative freedom in art.


We cannot deny the significant role of women artists in contemporary Indian art. There was a time when people believed that fields like painting and sculpture were exclusively for men. In the last century, Amrita Sher-Gil was the first woman artist who not only established her identity in this field within the country but also gained recognition at the international level. Furthermore, Amrita Sher-Gil had a significant influence on numerous contemporaries and subsequent painters. Anjolie Ela Menon's work also reflects her influence.



Anjolie Ela Menon, Devyani Krishna, Arpita Singh, Arpana Caur, Gogi Saroj Pal, Rekha Rodwittiya, Bulbul Sharma, Kanchan Chander, and many other women artists not only challenged the long-standing male dominance in the field of art but also established themselves firmly. Among them, if Anjolie Ela Menon is considered a leading figure, it is because, over her more than six-decade-long artistic career, she has consistently proven herself in terms of subject matter, technique, and experimentation. She still regards her first painting, Head, created at around the age of seventeen, as a foundational example for herself.



Born in 1940, Anjolie Ela Menon received her first formal training in art at the age of sixteen at Sir J.J. School of Art in Mumbai. The structure of education there was entirely British, but through exhibitions she saw outside the school, she became acquainted with authentic Indian art. It was there that she first saw the works of M.F. Husain and Mohan Samant, both of whom, she openly admits, greatly influenced her. According to her, at one point, Husain’s bold black lines and flat surfaces influenced her so much that she began to follow them—though her themes remained different. She had to leave Sir J.J. School after just six months.



At the age of eighteen, the paintings she created had a strong sense of romanticism, partly due to the influence of Amrita Sher-Gil, which she herself acknowledges. In her first exhibition, she displayed 53 paintings in various styles. However, when she went to Paris to study art, the direction of her work changed completely. A vast new world of ideas and perspectives opened before her. People often claim that Western art heavily influences her work. This claim is true to some extent, as her real artistic journey began after her studies in Paris. However, it is important to note that, although her technique may reflect Western influences, the soul of her work remains Indian.



This is why, when she seeks to connect her art with Indian identity, she incorporates not only Indian themes but also elements of calendar art, which she considers entirely Indian and contemporary. She expresses concern that whenever we discuss indigenous art, we tend to look only to the past—Ajanta or miniature painting—while ignoring the art around us, such as calendar art or the paintings on rickshaws, buses, and trucks. She paid attention to these forms and incorporated their elements into her work, giving them new and contemporary meanings.



At the age of twenty, Menon went to Paris for further study, where she was influenced by European Impressionism as well as church art based on Christianity. There, she established a dialogue with Western art. After returning, her artistic identity reflected Western techniques combined with Indian themes. Much later, she again turned toward the West, going to Murano, where she worked on glass art for two to three years. Even then, she remained rooted in Indian themes, painting subjects like the Shiva lingam and Krishna.



Anjolie Ela Menon never separates her art from her personal world. In her early paintings, windows and crows frequently appear, reflecting memories of her life in Mumbai. According to her, crows were a common sight in Mumbai but not in Delhi. The subjects in her later works also remained closely connected to her personal experiences. Therefore, it would not be wrong to describe her art as a pictorial autobiography.



Menon should be regarded as a bold painter because she depicted the nude form at a time when such representation was not expected, especially from a woman artist. Perhaps this is because she does not accept any form of gender discrimination in art. She does not like being labelled a "woman artist." She argues that if male painters are not called “male artists," then why should women be labelled differently? Similarly, she rejects any notion of competition in art. According to her, art is not a 100-meter race where someone comes first and someone else comes second.



In fact, Anjolie Ela Menon wishes to be acknowledged solely as an artist. This reflects the aspiration of a true artist—one whose work has established a distinct identity not only in India but also abroad. She is among the most expensive women artists in the country, with her paintings valued in lakhs and crores. International auction houses like Christie’s and Sotheby’s, as well as India’s Saffronart, regularly include her works in their auctions. International galleries also host her exhibitions. Having conducted around thirty solo and numerous group exhibitions, her artistic journey shows no sign of rest. Believing that dissatisfaction is the basis of growth, she continues to strive for new creations. A few years ago, reports of the sale of counterfeit versions of her paintings confirmed her immense popularity.



In her art, Anjolie Ela Menon consistently addresses the social position of women. In her paintings, she portrays women’s status in contrast to male dominance in various ways. She also explores themes of loneliness and the lives of elderly women within families. Most of the women depicted in her works belong to the working and middle classes. She has no shortage of subjects—ranging from various narratives to depictions of deities, as well as works centred on Christ. She has also created unique social imagery through subjects like old windows and doors.

*All images have been sourced from Google and private collections. The author holds no rights to these images; they are used solely as a reference to understand the artist's work. 

Monday, March 16, 2026

कला और आत्म-अन्वेषण : डॉ. संजय धवले की सृजनात्मक दृष्टि


कला विचार/ डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

डॉ. संजय धवले

ला को अक्सर एक दृश्य माध्यम के रूप में देखा जाता है, जिसमें कलाकार रंगों, रेखाओं और आकृतियों के माध्यम से किसी विचार या दृश्य को अभिव्यक्त करता है। किंतु वास्तविकता में कला केवल बाहरी रूपों का संयोजन नहीं है, बल्कि यह आत्मा की गहराइयों में उतरने की एक प्रक्रिया है। यह उस भाव-जगत की अभिव्यक्ति है, जो यथार्थ और कल्पना दोनों के बीच एक सेतु का निर्माण करता है। इसी दृष्टि से डॉ. संजय धवले की कला को समझना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।


 

    पेशे से चिकित्सक होने के कारण संजय धवले का प्रतिदिन का जीवन मानव शरीर की संरचना और उसकी वास्तविकताओं से जुड़ा हुआ है। वे न केवल शारीरिक रोगों का उपचार करते हैं, बल्कि मरीजों की मानसिक और भावनात्मक अवस्थाओं के भी साक्षी बनते हैं। रोग, पीड़ा, आशा, निराशा और उपचार के बाद की शांतिये सभी अनुभव उनके भीतर एक संवेदनशील भाव-जगत का निर्माण करते हैं। इस अनुभव को किसी निश्चित आकार या परिभाषित छवि में बांधना संभव नहीं होता। यही कारण है कि जब वे कला के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तो उनकी अभिव्यक्ति अमूर्त रूप धारण कर लेती है।



    उनके लिए कला एक ऐसा माध्यम बन जाती है, जिसमें भौतिक अस्तित्व की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं और मनुष्य होने की अनुभूति एक नए स्तर पर विकसित होती है। वे जीवन को पुनः रचने का प्रयास करते हैंऐसा जीवन जिसमें विकार और पीड़ा के स्थान पर शांति, संतुलन और आनंद का वास हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अमूर्त कला को अपनाया है, जो उन्हें स्वतंत्रता प्रदान करती है कि वे अपने अनुभवों और भावनाओं को बिना किसी बंधन के व्यक्त कर सकें।



    चिकित्सा विज्ञान में मानव कोशिकाओं की जटिल और अमूर्त संरचना से उनका पहले से ही परिचय रहा है। यही अनुभव उनकी कला में भी परिलक्षित होता है। किंतु उनकी प्रेरणा केवल वैज्ञानिक जगत तक सीमित नहीं है। वे प्रकृति से भी गहराई से प्रभावित होते हैं। ग्वालियर जैसे स्थान में निवास करते हुए उन्हें प्रकृति के विविध रूपों को देखने और अनुभव करने का अवसर मिलता हैपथरीली चट्टानें, हरित परिदृश्य, बहता हुआ जल और आकाश का विस्तार। ये सभी तत्व उनकी कला में एक नए अर्थ और संवेदना के साथ प्रकट होते हैं।



    संजय धवले की रचनाओं में अमूर्तन की विविध शैलियों का समावेश देखा जा सकता है। उनके दैनिक जीवन में आने वाले अनुभवशांत और व्याकुल मनःस्थितियां, पीड़ा से ग्रस्त शरीर, उपचार के बाद की सहजताये सभी उनके चित्रों में रूपांतरित हो जाते हैं। जब वे चित्र बनाने बैठते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे उन अनुभवों को पुनः जी रहे हैं, किंतु एक नए दृष्टिकोण से। उनके लिए यह केवल मरीज का अनुभव नहीं रह जाता, बल्कि वह उनकी अपनी आत्मिक अवस्था का भी प्रतिबिंब बन जाता है।



    उनकी कला की एक विशेषता यह है कि उसमें कोई एक निश्चित शैली या संरचना नहीं है। प्रत्येक रचना अपने आप में विशिष्ट है, क्योंकि हर अनुभव और हर भाव अलग होता है। कहीं उनकी पेंटिंग्स में नगरीय संरचनाओं की झलक मिलती है, तो कहीं प्रकृति के कठोर और कोमल रूप दिखाई देते हैं। कभी आकाश का अनंत विस्तार उभरता है, तो कभी धरती की ठोस उपस्थिति। उनके चित्रों में फूलों की कोमलता भी है और पत्थरों की कठोरता भी; शांत बहती नदी का संगीत भी है और उसके वेग का उग्र स्वर भी।



    रंगों का चयन भी उनकी कला में विशेष महत्त्व रखता है। उनकी अधिकांश रचनाओं में नीले और लाल रंग की प्रधानता देखने को मिलती है, जिनके साथ श्वेत रंग की विविध छटाएँ संतुलन और गहराई प्रदान करती हैं। ये रंग केवल दृश्य प्रभाव नहीं उत्पन्न करते, बल्कि वे भावनाओं की तीव्रता और सूक्ष्मता दोनों को व्यक्त करते हैं।



    अमूर्त कला में अक्सर ज्यामितीय आकृतियों का उपयोग देखा जाता है, किंतु संजय धवले के लिए ये आकृतियाँ केवल न्यूनतम और प्रतीकात्मक भूमिका निभाती हैं। उनकी रचनाओं की मूल संरचना किसी निश्चित आकार पर आधारित नहीं होती, बल्कि वह आत्मा के अरूप और अनंत स्वरूप के अधिक निकट होती है। उनकी कला यह संकेत देती है कि वास्तविक सत्य को किसी एक रूप में बांधा नहीं जा सकता; वह निरंतर परिवर्तित होता रहता है और प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव में अलग रूप धारण करता है।



    संजय धवले अपनी पेंटिंग्स में रेखाओं का बहुत सजीव और गतिशील उपयोग करते हैं। ये रेखाएँ केवल आकृतियाँ बनाने के लिए नहीं होतीं, बल्कि वे रंगों के साथ मिलकर एक ऐसा प्रभाव पैदा करती हैं जिससे वास्तविक दुनिया (यथार्थ) का एहसास होता है।

    वे कई बार इन रेखाओं के माध्यम से प्राकृतिक तत्वों (जैसे पेड़, जल, आकाश आदि) को एकता या एक रूप में दिखाने की कोशिश करते हैं, जिससे चित्र में सामंजस्य और प्रवाह महसूस होता है।



    उनकी एक खास विशेषता यह भी है कि वे कैनवास के स्पेस (स्थान) को बहुत सोच-समझकर बाँटते हैं। अक्सर वे बड़े हिस्से को एक ही रंग (एकरंगी) में रखते हैं, जिससे बाकी तत्व और भी उभरकर सामने आते हैं और एक अलग दृश्य प्रभाव पैदा होता है।



    इस तरह संजय धवले की कला को आत्म-अन्वेषण की यात्रा के रूप में देखा जा सकता है। यह यात्रा न केवल कलाकार के भीतर की दुनिया को उजागर करती है, बल्कि दर्शक को भी अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उनकी रचनाएँ यह सिखाती हैं कि कला केवल देखने की वस्तु नहीं है, बल्कि अनुभव करने की प्रक्रिया हैएक ऐसी प्रक्रिया, जो हमें हमारे अस्तित्व के गहरे स्तरों तक ले जाती है।