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सोमवार, 16 मार्च 2026

कला और आत्म-अन्वेषण : डॉ. संजय धवले की सृजनात्मक दृष्टि


कला विचार/ डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

डॉ. संजय धवले

ला को अक्सर एक दृश्य माध्यम के रूप में देखा जाता है, जिसमें कलाकार रंगों, रेखाओं और आकृतियों के माध्यम से किसी विचार या दृश्य को अभिव्यक्त करता है। किंतु वास्तविकता में कला केवल बाहरी रूपों का संयोजन नहीं है, बल्कि यह आत्मा की गहराइयों में उतरने की एक प्रक्रिया है। यह उस भाव-जगत की अभिव्यक्ति है, जो यथार्थ और कल्पना दोनों के बीच एक सेतु का निर्माण करता है। इसी दृष्टि से डॉ. संजय धवले की कला को समझना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।


 

    पेशे से चिकित्सक होने के कारण संजय धवले का प्रतिदिन का जीवन मानव शरीर की संरचना और उसकी वास्तविकताओं से जुड़ा हुआ है। वे न केवल शारीरिक रोगों का उपचार करते हैं, बल्कि मरीजों की मानसिक और भावनात्मक अवस्थाओं के भी साक्षी बनते हैं। रोग, पीड़ा, आशा, निराशा और उपचार के बाद की शांतिये सभी अनुभव उनके भीतर एक संवेदनशील भाव-जगत का निर्माण करते हैं। इस अनुभव को किसी निश्चित आकार या परिभाषित छवि में बांधना संभव नहीं होता। यही कारण है कि जब वे कला के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तो उनकी अभिव्यक्ति अमूर्त रूप धारण कर लेती है।



    उनके लिए कला एक ऐसा माध्यम बन जाती है, जिसमें भौतिक अस्तित्व की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं और मनुष्य होने की अनुभूति एक नए स्तर पर विकसित होती है। वे जीवन को पुनः रचने का प्रयास करते हैंऐसा जीवन जिसमें विकार और पीड़ा के स्थान पर शांति, संतुलन और आनंद का वास हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अमूर्त कला को अपनाया है, जो उन्हें स्वतंत्रता प्रदान करती है कि वे अपने अनुभवों और भावनाओं को बिना किसी बंधन के व्यक्त कर सकें।



    चिकित्सा विज्ञान में मानव कोशिकाओं की जटिल और अमूर्त संरचना से उनका पहले से ही परिचय रहा है। यही अनुभव उनकी कला में भी परिलक्षित होता है। किंतु उनकी प्रेरणा केवल वैज्ञानिक जगत तक सीमित नहीं है। वे प्रकृति से भी गहराई से प्रभावित होते हैं। ग्वालियर जैसे स्थान में निवास करते हुए उन्हें प्रकृति के विविध रूपों को देखने और अनुभव करने का अवसर मिलता हैपथरीली चट्टानें, हरित परिदृश्य, बहता हुआ जल और आकाश का विस्तार। ये सभी तत्व उनकी कला में एक नए अर्थ और संवेदना के साथ प्रकट होते हैं।



    संजय धवले की रचनाओं में अमूर्तन की विविध शैलियों का समावेश देखा जा सकता है। उनके दैनिक जीवन में आने वाले अनुभवशांत और व्याकुल मनःस्थितियां, पीड़ा से ग्रस्त शरीर, उपचार के बाद की सहजताये सभी उनके चित्रों में रूपांतरित हो जाते हैं। जब वे चित्र बनाने बैठते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे उन अनुभवों को पुनः जी रहे हैं, किंतु एक नए दृष्टिकोण से। उनके लिए यह केवल मरीज का अनुभव नहीं रह जाता, बल्कि वह उनकी अपनी आत्मिक अवस्था का भी प्रतिबिंब बन जाता है।



    उनकी कला की एक विशेषता यह है कि उसमें कोई एक निश्चित शैली या संरचना नहीं है। प्रत्येक रचना अपने आप में विशिष्ट है, क्योंकि हर अनुभव और हर भाव अलग होता है। कहीं उनकी पेंटिंग्स में नगरीय संरचनाओं की झलक मिलती है, तो कहीं प्रकृति के कठोर और कोमल रूप दिखाई देते हैं। कभी आकाश का अनंत विस्तार उभरता है, तो कभी धरती की ठोस उपस्थिति। उनके चित्रों में फूलों की कोमलता भी है और पत्थरों की कठोरता भी; शांत बहती नदी का संगीत भी है और उसके वेग का उग्र स्वर भी।



    रंगों का चयन भी उनकी कला में विशेष महत्त्व रखता है। उनकी अधिकांश रचनाओं में नीले और लाल रंग की प्रधानता देखने को मिलती है, जिनके साथ श्वेत रंग की विविध छटाएँ संतुलन और गहराई प्रदान करती हैं। ये रंग केवल दृश्य प्रभाव नहीं उत्पन्न करते, बल्कि वे भावनाओं की तीव्रता और सूक्ष्मता दोनों को व्यक्त करते हैं।



    अमूर्त कला में अक्सर ज्यामितीय आकृतियों का उपयोग देखा जाता है, किंतु संजय धवले के लिए ये आकृतियाँ केवल न्यूनतम और प्रतीकात्मक भूमिका निभाती हैं। उनकी रचनाओं की मूल संरचना किसी निश्चित आकार पर आधारित नहीं होती, बल्कि वह आत्मा के अरूप और अनंत स्वरूप के अधिक निकट होती है। उनकी कला यह संकेत देती है कि वास्तविक सत्य को किसी एक रूप में बांधा नहीं जा सकता; वह निरंतर परिवर्तित होता रहता है और प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव में अलग रूप धारण करता है।



    संजय धवले अपनी पेंटिंग्स में रेखाओं का बहुत सजीव और गतिशील उपयोग करते हैं। ये रेखाएँ केवल आकृतियाँ बनाने के लिए नहीं होतीं, बल्कि वे रंगों के साथ मिलकर एक ऐसा प्रभाव पैदा करती हैं जिससे वास्तविक दुनिया (यथार्थ) का एहसास होता है।

    वे कई बार इन रेखाओं के माध्यम से प्राकृतिक तत्वों (जैसे पेड़, जल, आकाश आदि) को एकता या एक रूप में दिखाने की कोशिश करते हैं, जिससे चित्र में सामंजस्य और प्रवाह महसूस होता है।



    उनकी एक खास विशेषता यह भी है कि वे कैनवास के स्पेस (स्थान) को बहुत सोच-समझकर बाँटते हैं। अक्सर वे बड़े हिस्से को एक ही रंग (एकरंगी) में रखते हैं, जिससे बाकी तत्व और भी उभरकर सामने आते हैं और एक अलग दृश्य प्रभाव पैदा होता है।



    इस तरह संजय धवले की कला को आत्म-अन्वेषण की यात्रा के रूप में देखा जा सकता है। यह यात्रा न केवल कलाकार के भीतर की दुनिया को उजागर करती है, बल्कि दर्शक को भी अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उनकी रचनाएँ यह सिखाती हैं कि कला केवल देखने की वस्तु नहीं है, बल्कि अनुभव करने की प्रक्रिया हैएक ऐसी प्रक्रिया, जो हमें हमारे अस्तित्व के गहरे स्तरों तक ले जाती है।