रजा फाउंडेशन द्वारा नई दिल्ली के इंडिया इंटर नेशनल सेंटर की गैलरी में गोंड कलाकार जो प्रधान कहलाते हैं, उनकी प्रदर्शनी का आयोजन 12 से 26 जून तक किया गया है। इस प्रदर्शनी में शामिल रचनाएँ गोंड कलम में ताजी हवा के झोंकों की तरह हैं। सदियों से एक ही तरह के विषयों पर एक जैसी शैली में काम कर रहे प्रधान कलाकारों के बीच अब जो नई पीढ़ी आ रही है वह न केवल अपनी शैली को नया रूप दे रही है बल्कि दूसरी कलाओं के साथ सांस्कृतिक संबंध भी स्थापित कर रही है।
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| डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज और गजेंद्र सोनी |
इस प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं को देखें तो उनमें एक तरफ गोंड कला की पारंपरिक पहचान यथावत दिखाई देती है पर साथ ही सूक्ष्मता से देखने पर इस पहचान के विस्तार के संकेत भी मिलते हैं। इन रचनाओं में वैसी पुनरावृत्ति दिखाई नहीं देती, जैसी हम देखते रहै हैं।
इस प्रदर्शनी में शामिल ज्यादातर कलाकार आज भी पाटनगढ़ में ही रहकर कला कर रहे हैं। प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर इन कलाकारों का मार्गदर्शन करने वाले कलाकार गजेंद्र सोनी ने बताया कि वह इन कलाकारों को इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि वह केवल अपनी कल्पना से ही काम करें और किसी दूसरे कलाकार के काम से प्रभावित न हों।
प्रदर्शित रचनाओं में से कुछ में अन्य लोक कलाओं
से प्रेरणा ली गई दिखाई देती है। यह कोई नकल नहीं है, यह एक सांस्कृतिक संबंध है
जिसमें परस्पर आदान-प्रदान संबंधों को न केवल मजबूत करता है बल्कि एक नया जीवन भी
देता है। एक रचना में जिस तरह त्रिकोण के पैटर्न का डिजाइन की तरह इस्तेमाल किया
गया है, फूलों की जो संरचना है और सिंह की आकृति में जो मधूबनी कला का स्पर्श है,
वह नई संभावनाओं की तरफ इशारा है। हाथी गोंड कला का एक लोकप्रिय चरित्र है पर इस
बार कुछ कलाकारों ने उसमें रूप के स्तर पर प्रयोग किया है। रंगों को लेकर भी नयी
संभावनाएं यहां दिखाई देती हैं।





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