एक शहर जो यादों में बसा है, कौन सा शहर, यह नहीं पता पर अपनी देश और विदेश की यात्राओं में मिले भवन स्थापत्य और शहर की संरचना के अनुभवों को स्मिता जैन एक दृश्य भाषा में प्रस्तुत करती हैं। शहर की घनी बसाहट में कहीं-कहीं इंसान की उपस्थिति दिखाई देती है पर जहाँ वह उपस्थित नहीं है, वहाँ उसकी धड़कन हैं, उसके सपने हैं। पिरामिड और त्रिकोण उनकी रचनाओं में सांस्कृतिक विलयन के रूप में सामने आता है। अपनी पेंटिंग्स के माध्यम से वह एक शहर को संपूर्णता में देखने की एक अलग दृष्टि प्रस्तुत करती हैं।
उनके कैनवास पर दिखाई देने वाले भवन यथार्थवादी प्रतीत होते हुए भी पूर्णतः यथार्थ के बंधन में नहीं बँधे। यहाँ अमूर्तन का गहरा प्रभाव है, जो इमारतों को किसी विशिष्ट स्थान का चित्रण न बनाकर उसकी अनुभूति में बदल देता है। कई बार संरचनाएँ अधूरी-सी लगती हैं—मानो वे स्मृति में धुंधली पड़ गई हों या बनते-बनते ठहर गई हों। यही गुण उनके शहरों को एक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक परिदृश्य में रूपांतरित करता है।
उनकी चित्र-भाषा में रेखाओं की लय, आकृतियों का दोहराव और स्थान का संतुलित विभाजन एक ऐसी संरचना रचते हैं, जहाँ ठोस और अमूर्त के बीच निरंतर संवाद चलता है। परिणामस्वरूप, उनके शहर एक साथ परिचित भी लगते हैं और अनजाने भी—जैसे वे देखे हुए भी हों और स्मरण में बसे हुए भी।
भवनों के तिकोने शिखर उनकी कला का एक विशिष्ट तत्व हैं, जिनमें पिरामिडीय संरचना की झलक मिलती है। यह रूप केवल स्थापत्यिक प्रयोग नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकेत भी है—एक ऐसा सार्वभौमिक प्रतीक, जो विभिन्न सभ्यताओं में समान रूप से उपस्थित रहा है। जब ये शिखर सुनहरे रंग में उभरते हैं, तो वे ऊर्जा, चेतना और मानवीय आकांक्षाओं के प्रतीक बन जाते हैं।
रंग योजना उनके कार्यों का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। नीले, भूरे, लाल और सुनहरे रंगों का संतुलित प्रयोग शहर के विविध भावों को व्यक्त करता है—उदासी, रहस्य, ऊर्जा और आशा। विशेष रूप से सुनहरा रंग उनके चित्रों में एक प्रतीकात्मक चमक लाता है, जो शहरी जीवन के सपनों और संभावनाओं को उजागर करता है।
उनकी प्रारंभिक रचनाओं में अमूर्तन अधिक प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देता है, जहाँ वे रंगों और रेखाओं के माध्यम से अस्तित्व के गहरे प्रश्नों को टटोलती हैं। यही अमूर्त दृष्टि बाद में उनके शहरी चित्रण में समाहित हो जाती है, जिससे उनके शहर अनुभव, स्मृति और कल्पना के जटिल संलयन बन जाते हैं।
कभी-कभी उनके चित्र धुंधली स्मृतियों की तरह उभरते हैं—अस्पष्ट, परंतु गहरे। यह धुंधलापन दर्शक को आमंत्रित करता है कि वह अपने अनुभवों और स्मृतियों को इन दृश्यों में जोड़ सके। हाल के कार्यों में उनके चौकोर, खंभेनुमा रूप स्थापत्य को नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयास हैं, जहाँ संरचना और अमूर्तन का संतुलन उनकी परिपक्व कलाभाषा को दर्शाता है।
इस प्रकार, स्मिता जैन की कला एक ऐसी दृश्य दुनिया रचती है, जो केवल देखने का नहीं, बल्कि अनुभव करने का आमंत्रण देती है—जहाँ शहर बाहरी नहीं, भीतर घटित होता है।
-डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज
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