Wednesday, May 6, 2026

यदि कला अर्थ से मुक्त है तो......?

कला विचार

अर्पिता सिंह की एक रचना।

यदि कला अर्थ से मुक्त है तो फिर किसी कलाकृति के शीर्षक की क्या आवश्यकता है? और किसी प्रदर्शनी का कोई नाम देने या उसके लिए क्यूरेटर की और उसके लेखन की क्या जरुरत है? यदि कला अर्थ से मुक्त है, संदर्भ से मुक्त है, और उसे पढ़ने की आवश्यकता नहीं है तो कोई व्यक्ति किसी गैलरी में पेंटिंग या शिल्प देखने आए ही क्यों? क्योंकि जो कुछ वह पेंटिंग में देखेगा वह तो वैसे भी उसके दृश्य-अनुभव का हिस्सा है। नदी, पहाड़, पेड़, मनुष्य, पशु-पक्षी, इन सबको तो हम वैसे भी प्रत्यक्ष देखते ही रहते हैं, फिर उन्हें किसी चित्र या शिल्प के रूप में देखने कोई क्यों जाए?

डॉ तरुणा माथुर की एक पेंटिंग।


पिकासो ने एक बार इस बात पर आपत्ति की थी कि लोग उससे उसकी पेंटिंग का अर्थ क्यों पूछते हैं? पर उसने कभी खुद से यह सवाल किया होता कि वह अपनी रचनाओं को एक नाम क्यों देते हैं तो उन्हें अपनी बात का जवाब मिल जाता।

पिकासो अपनी एक पेंटिंग के साथ।


भारतीय कला में हम देखते हैं कि बहुत सारे कलाकार अपनी रचनाओं को कोई शीर्षक नहीं देते हैं, हालांकि ऐसा न करने का कारण कुछ और होता है, जैसे ज्यादातर को कोई ऐसा शीर्षक नहीं सूक्षता है जो उपयुक्त हो, या इसलिए कि एक ही जैसी रचनाओं के लिए अलग-अलग शीर्षक तय करना बहुत मुश्किल है। बहुत से कलाकार शीर्षक के लिए दूसरों से विचार-विमर्श भी करते हैं। कितने ही कलाकारों को उनकी रचनाओं के शीर्षक मैंने स्वयं दिये हैं। हालांकि शीर्षक हो यह बहुत जरुरी नहीं है, क्योंकि दर्शक के लिए कलाकृति के दृश्यात्मक तत्व ही पर्याप्त होते हैं जिनसे वह अपने दृश्यात्मक अनुभव को विस्तार देते हुए रचना के अपने अर्थ की खोज करता है। फिर भी उसके सामने एक शीर्षक होता है तो उसके लिए आसानी हो जाती है।

कला को देखने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। 


कला को देखना अपने आप में एक कला है, जो गैलरी में आने वाले सभी लोगों के पास नहीं होती है। कला प्रदर्शनी में बहुत से ऐसे लोग भी अचानक चले आते हैं जिन्हें पहले से कला को देखने का अनुभव नहीं होता है, या जिनके पास कला को लेकर बहुत समझ नहीं होती है। उनके पास रंगों, रेखाओं और विभिन्न रुपों को लेकर किसी तरह की अन्वेषणात्मक चेतना नहीं होती है। उनके लिए रंगों के अर्थ भी सीमित होते हैं। इसके बाद भी ऐसे लोग कला प्रदर्शनी में आते हैं और कला को देखने व समझने की कोशिश करते हैं, और इसमें अक्सर वह कलाकार की मदद भी चाहते हैं।

एक कला प्रदर्शनी के दौरान कलाकार से बात करते दर्शक।


दर्शक चाहते हैं कि जो कुछ वह देख रहे हैं, उसका कुछ अर्थ अवश्य है जिसे वह यदि समझ नहीं पा रहे हैं तो कोई ऐसा रास्ता हो जो उनकी मदद कर सके। रचनाओं के शीर्षक और क्यूरेटर का आलेख ऐसे रास्ते हैं। आजकल गैलरियाँ और कलाकार अपनी प्रदर्शनी में वॉकथ्रू का कार्यक्रम रखते हैं, या कला पर संवाद का कार्यक्रम रखते हैं। यदि कला में अर्थ की कोई आवश्यकता नहीं है तो ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता ही क्यूं है? आश्चर्य की बात नहीं कि ऐसे कई कार्यक्रमों में वह लो वक्ता के रूप में उपस्थित रहते हैं जो कला को सिर्फ देखने की वस्तु मानते हैं, विचार और अर्थ की नहीं। जो कहते हैं कि पेंटिंग पढ़ने की नहीं देखने की चीज है, पर मौका मिलते ही वह खुद पेंटिंग को पढ़ने और पढ़ाने लगते हैं।

एक कला प्रदर्शनी में कलाकार और दर्शक।


मेरी कला को सिर्फ देखकर उसका आनंद लीजिए कहने वाले कलाकार अक्सर अखबारों और पत्रिकाओं में अपनी कला पर कुछ न कुछ छपवाते रहते हैं। वह कला समीक्षकों को बुलाकर अपना काम दिखाते हैं, उनसे लिखने को कहते हैं, कुछ संपन्न कलाकार और गैलरियाँ किताबें लिखवातीं व प्रकाशित करती हैं, यह सब क्यों यदि कला में किसी प्रकार के अर्थ की तलाश की आवश्यकता नहीं है या कला को पढ़ने की जरूरत नहीं है। फिर कलाकार के जीवन, उसकी रचना प्रक्रिया, उसके माध्यम, उसके संघर्ष आदि के बारे में लोगों को बताने की जरुरत क्यों है? 

राशिद अहमद की एक पेंटिंग।


मनुष्य स्वभाव से ही दोहरी मानसिकता रखता है, एक तरफ वह अपने आपको विभिन्न माध्यमों से व्यक्त करना चाहता है, दूसरी तरफ चाहता है कि उसकी अभिव्यक्ति को लेकर उसे किसी तरह के सवालों का सामना न करना पड़े, वह रहस्यमय बनी रहे, कलाकारों पर भी यह बात लागू होती है। आज ऐसे कलाकारों की संख्या बढ़ती जा रही है जो इस बात को बड़े गर्व से कहते हैं कि उनका काम रचना है, रचना का अर्थ बताना नहीं, यदि उनकी रचना का कोई अर्थ लोगों की पकड़ में नहीं आ रहा है, उसे कोई समझ नहीं पा रहा है तो यह उनकी समस्या है। इसके लिए लोग समाज में कला चेतना के अभाव को भी दोषी देते हैं। पर, इसके लिए जिम्मेदार कौन है? और इस स्थिति को बदलने में क्या कलाकारों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए?

-डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

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