भारतीय कला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भारतीय कला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

गोरा प्रदर्शनीः लोक की आभा और आधुनिकता

 प्रदर्शनी विचार- डॉ.  वेद प्रकाश भारद्वाज


प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर कलाकारों को संबोधित करते डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज

कलाकारों को संबोधिक करते डॉ. चिंतामनी कर


समकालीन कला परिदृश्य में हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति उभरकर सामने आई हैलोक परंपराओं और आधुनिकता के बीच एक नए संवाद का निर्माण। यह सहभागिता केवल शैलीगत समन्वय नहीं है, बल्कि संवेदनाओं, प्रतीकों और सांस्कृतिक स्मृति की गहरी पुनर्व्याख्या है। आधुनिक कलाजिसे कभी उसकी शहरी और वैश्विक प्रवृत्तियों के कारण लोक जीवन से दूर माना जाता थाअब उन्हीं जड़ों से पुनः ऊर्जा और प्रेरणा प्राप्त कर रही है। यह परिवर्तन केवल भारत तक सीमित नहीं है; विश्वभर में पारंपरिक लोक रूपों का पुनरावलोकन और पुनर्पाठ किया जा रहा है, जिससे आधुनिक कलात्मक प्रक्रियाओं को नया अर्थ और दृष्टि मिल रही है।


राखी गुप्ता की रचना


भारतीय संदर्भ में यह संवाद विशेष महत्व रखता है। देश की लोक परंपराएँ न केवल प्राचीन हैं, बल्कि अत्यंत विविधतापूर्ण भी हैं, जो सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की एक जीवंत निरंतरता प्रस्तुत करती हैं। इसी समृद्ध विरासत के आधार पर छत्तीसगढ़ प्रगतिशील कलाकार समूह द्वारा आयोजित गोराप्रदर्शनी एक सशक्त पहल के रूप में सामने आती है। यह केवल कलाकृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि एक सक्रिय मंच है जहाँ लोक परंपराएँ और समकालीन कलात्मक अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं और विकसित होती हैं। इसका प्रमाण प्रदर्शनी में शामिल कुछ रचनाओं में मिलता है जिनमें कलाकारों ने लोक कलाओं की परंपरा से संवाद किया है, साथ ही अपनी रचनाओं में लोक संस्कृति को स्थान दिया है। इस दृष्टि से सुनीता वर्मा, केशव राम, डॉली सर्वा, प्रीति सोनी, सुभांगी सिंह ठाकुर, पूनम चक्रधारी आदि के काम उल्लेखनीय हैं।

डॉली सर्वा की रचना 

डॉ. तरुणा माथुर की रचना


श्यामा शर्मा की रचना


गोराशीर्षक स्वयं अनेक अर्थों से परिपूर्ण है। यह एक ओर दिव्य स्त्री शक्ति (शक्ति) का आह्वान करता है, तो दूसरी ओर भगवान शिव की आदिम शक्ति का संकेत भी देता है। छत्तीसगढ़ की जनजातीय समुदायों का गोरा-गोरी पर्वजिसमें शिव और पार्वती के अमूर्त रूप गोबर से निर्मित कर पूजा की जाती हैइस प्रदर्शनी की अवधारणा का केंद्र है। यह परंपरा एक महत्वपूर्ण तथ्य को उजागर करती है कि अमूर्तन केवल आधुनिकतावाद की देन नहीं, बल्कि लोक अभिव्यक्ति का एक प्राचीन और स्वाभाविक अंग है।

केशव राम की रचना


अनिल खोबरगड़े की रचना


पोडियाम रवि का शिल्प


देशभर से करीब एक सौ कलाकारों की भागीदारी इस प्रदर्शनी की व्यापकता को दर्शाती है। इस प्रदर्शनी का विचार अवश्य स्थानीय है पर छत्तीसगढ़ प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संस्थापक कलाकार जितेन साहू और प्रदर्शनी के क्यूरेटर कलाकार डॉ. ध्रुव तिवारी ने इस प्रदर्शनी को व्यापक बनाते हुए देशभर से कलाकारों को आमंत्रित किया है। प्रदर्शनी में चित्रकला, ग्राफिक, रेखांकन और मूर्तिकला जैसे विविध माध्यमों के माध्यम से प्रस्तुत कृतियाँ एक उत्सवधर्मी दृश्य भाषा का निर्माण करती हैं। रूप, रंग और बनावट का समृद्ध संयोजन एक उत्सव का वातावरण रचता है, जबकि प्रतीकात्मकता इन सभी को जोड़ने वाला सूत्र बनती है। यही प्रतीकात्मक भाषा आधुनिक कला की अभिव्यक्ति और लोक परंपराओं की सहजता के बीच सेतु का कार्य करती है। यह उत्सव का वातावरण और संबंधों की ऊर्जा प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर 10 अप्रैल 2026 को देखने को मिली। प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार चिंतामनी कर और कलाकार डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज अतिथि थे। श्री कर ने अपने संबोधन में कला में संवेदना, अनुभूति और अभिव्यक्ति की बात करते हुए कहा कि कला एक कलाकार व्यक्तिगत रुप से करता अवश्य है पर उसकी कला सबके लिए होती है। कला सबसे संवाद करती है, और सबकी हो जाती है। कला एक तरह से व्यष्टि से समष्टि में रूपांतरित हो जाती है। कलाकृति में प्रत्येक दर्शक स्वयं को तलाश करता है। इस अवसर पर डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज ने कला में देखने के महत्व पर बल देते हुए कहा कि प्रत्येक कलाकार की कला का समाज बनाने, उसका वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कला को देखने के लिए, उसे आत्मसात करने के लिए दृश्य में जो दिख रहा है, उससे हट कर जो नहीं दिख रहा है, उसे देखना चाहिए। इस अवसर पर कलाकारों के अलावा बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित थे।

डॉ. ध्रुव तिवारी की रचना

जितेन साहू की रचना

रविकांत झा की रचना


प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं से यह स्पष्ट हो गया है कि संयोजक डॉ. ध्रुव तिवारी ने वैचारिक एकता और कलात्मक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित किया है। प्रदर्शनी में शामिल रचनाकारों में रविकांत झा, राजीव सेमवाल, शैलेंद्र साहू, ड़ा, वेद प्रकाश भारद्वाज, राजेश रावत, मोहन बराल, रीना, चौधरी, रत्ना शिवयोगी आदि का काम बहुआयामी भारतीय कला के वर्तमान परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करता कहा जा सकता है। गोराकी थीम को बनाए रखते हुए, प्रत्येक कलाकार को अपनी तरह से इस विचार को आत्मसात और व्यक्त करने की स्वतंत्रता दी गई है। परिणामस्वरूप, कृतियाँ मूर्त और अमूर्त, व्यक्तिगत और सामूहिक के बीच विचरण करती हुई एक बहुस्तरीय और गहन दृश्य अनुभव प्रस्तुत करती हैं। यह विविधता इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। प्रदर्शनी में राहुल रुंजे के टेराकोटा के शिल्प और पोडियाम रवि के लकड़ी के शिल्प एक नया अनुभव जोड़ते हैं।

राहुल रुंजे के शिल्प

हर्षिता नामदेव की रचना

पूनम चक्रधारी की रचना


इस प्रदर्शनी के मूल में शिवत्व का दार्शनिक तत्व निहित हैशिव का वह स्वरूप जो साकार और निराकार, सृजन और संहार, रूप और अरूपसभी का समावेश करता है। जनजातीय मान्यताओं में गोराकेवल एक रक्षक ही नहीं, बल्कि जीवन्तता और आनंद का प्रतीक भी है। लोक मान्यताओं में ग्राम देवता की अवधारणा भी इसी प्रकार की है जिसे कलाकार केशव राम ने अपनी पेंटिंग्स में प्रस्तुत किया। लोक परिदृश्य में छत्तीसगढ़ के नैसर्गिक सौंदर्य का अपना महत्व है जिसे जितेन साहू, डॉ. ध्रुव शुक्ल, डॉ. तरुणा माथुर, प्रीति सोनी सहित कई कलाकारों के काम में देखा जा सकता है। सुनीता वर्मा ने गोरी-गोरा की अवधारणा बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है। इस तरह हम पाते हैं कि प्रदर्शनी में लोक परंपराओं और आधुनिकता में सहअस्तित्व को प्रभावशाली तरीके से व्यक्त किया गया है। प्रदर्शित रचनाएँ इस बात को प्रभावी तरीके से सामने रखती हैं कि कला जीवन की बहुआयामी संरचनात्मक विशेषताओं को प्रभावशाली तरीके से सामने लाती है।

अभिकल्प यदु की रचना

सरिता साहू की रचना 



प्रदर्शित सभी रचनाओं के बारे में लिखना संभव नहीं है। प्रदर्शनी के उदघाटन के अवसर पर अनेक कलाकारों से उनके काम, उनकी रचना प्रक्रिया आदि के बारे में बातचीत करने का अवसर मिला। यह देखकर खुशी हुई की प्रदर्शनी में शामिल युवा कलाकार अपनी कला और विचारों को लेकर बहुत स्पष्ट हैं। कई युवा महिला कलाकारों ने जिस तरह की सामाजिक चेतना का परिचय दिया वह भारतीय कला के भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। इस दृष्टि से पूनम चक्रधारी, डॉली सर्वा, शुभांगी सिंह ठाकुर, श्यामा शर्मा, श्वेता इंदोरिया जैन आदि का उल्लेख करना उचित होगा। अपने परिवेश और समकालीन संकटों को लेकर अनिल खोबरगड़े, शांति टिर्की, दियांशु देवांगन जैसे कलाकार नई संभावनाएं जगाते हैं। प्रदर्शनी में स्त्री चेतना की वाहक रचनाकारों में डॉ. तरुणा माथुर, वंदना परगानिहा, सरिता साहू, जयश्री भागवानानी, प्रियांशि वर्मा आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। इन रचनाकारों के काम की विशेषता यह है कि कि यह मानवीय आकारों के साथ ही अमूर्तन के माध्यम से स्त्री अस्मिता को उजागर करती हैं।   

श्वेता इंदोरिया जैन की रचना

शांति टिर्की की रचना


यह प्रदर्शनी इस बात को स्थापित करती है कि लोक परंपराएँ अतीत के जड़ अवशेष नहीं हैं, बल्कि जीवंत और सृजनात्मक शक्तियाँ हैं जो आज भी समकालीन कला को प्रभावित और समृद्ध कर रही हैं। लोक की इस शाश्वत आभा को आधुनिकता में उजागर करते हुए, यह प्रदर्शनी एक विकसित होती कलात्मक दिशा की ओर संकेत करती हैजहाँ परंपरा और नवाचार मिलकर एक जीवंत सांस्कृतिक निरंतरता का निर्माण करते हैं।

शनिवार, 28 मार्च 2026

कला जीवन की पुनर्व्याख्याः डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज








ए. रामाचंद्रन की पेंटिंग ययाति

ला जीवन को फिर से लिखने का एक माध्यम है, एक ऐसी भाषा में जो प्रतिकात्मक है, और जीवन को देखने की अलग दृष्टि देती है। कला एक तरह से दृष्टि का विस्तार है, अनुभूति की बहुलता है। यह अनुभूति की बहुलता व्यक्ति सापेक्ष होती है। कलाकार की और दर्शक की अनुभूति एक ही हो, यह जरुरी नहीं है। इसीलिए कला में जीवन को लिखना एक तरह से लोकतांत्रिक दृष्टि का विस्तार है जो दर्शक को भी उतनी ही स्वतंत्रता देती है, जितनी स्वतंत्रता कलाकार को होती है। इसीलिए कला केवल सृजन करना नहीं, बल्कि पुनर्व्याख्या करना हैजो कुछ जिया गया है, और उस जिये गये को भौतिक व मानसिक स्तर पर जिस-जिस प्रकार से अनुभव किया गया है, उसे एक नया रूप देना है। जीवन, अपने कच्चे रूप में, अक्सर बिना किसी संपादन के हमारे सामने आता है। वह उथल-पुथल, अनिश्चितता और ऐसे पलों से भरा होता है जिन्हें समझना मुश्किल होता है। कला एक शांत, फिर भी शक्तिशाली शक्ति के रूप में सामने आती है, जो हमें इन पलों को संशोधित करने, उन्हें कोई अर्थ देने और उन्हें ऐसी कहानियों में बदलने का अवसर देती है जिनके साथ हम जी सकें।

अतुल डोडिया की एक पेंटिंग


इस संदर्भ में हमें पहले से हो चुकी कला के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जैसे पिकासो की गुएर्निका। भारतीय कला में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं। ए रामाचंद्रन की ययाति, तैयब मेहता की सेलिब्रेशन, एमएफ हुसेन की कई रचनाएँ के साथ ही बिकास भट्टाचार्यजी, गणेश पाइन, सोमनाथ होर, चित्तोप्रसाद, हक्कू शाह, अमित अम्बालाल, केजी सुब्रमण्यन, सुधीर पटवर्धन, अतुल डोडिया सहित कितने की कलाकार हैं जिनकी रचनाओं में हमें अपने जिये गये जीवन के अनेक अनुभव याद आते रहते हैं। इन कलाकारों के साथ ही दूसरे कलाकारों की रचनाओं को देखते समय हम जीवन को अलग तरह से देखने और पढ़ने लगते हैं। यही कला की विशेषता है, कि वह हमें देखे हुए को नयी तरह से देखना सिखाती है, और कलाकार को उसे अलग तरह से लिखने की शक्ति देती है।

गणेश पाइन की पेंटिंग


कला के माध्यम से जीवन को फिर से लिखना, अपने जीवन की बागडोर (रचयिता होने का अधिकार) वापस अपने हाथों में लेना है। मनुष्य लगातार परिस्थितियों द्वारा गढ़ा जाता हैलाभ और हानि, खुशी, संघर्ष और बदलाव द्वारा। ये अनुभव हमें अक्सर ऐसा महसूस कराते हैं, मानो हम किसी ऐसी कहानी के पात्र मात्र हैं जिसे हमने खुद नहीं चुना है। 

जीवन का चुनाव जीव के नियंत्रण में नहीं है, वह विभिन्न परिस्थितियों में, ज्ञात-अज्ञात शक्तियों द्वारा निरयंत्रित होता है। एक कलाकार इस नियंत्रण को चुनौती देता है, जीवन को अलग तरह से देखने और अभिव्यक्त करने के माध्यम से। चित्रकला, लेखन, संगीत, नृत्य या किसी भी रचनात्मक कार्य के माध्यम से, हम अपनी कहानी को फिर से लिखना शुरू करते हैं। एक दर्दनाक याद कविता बन जाती है; एक क्षणिक भावना मधुर धुन बन जाती है; एक बिखरी हुई पहचान एक सुसंगत कहानी का रूप ले लेती है। इस प्रक्रिया में, हम अब केवल अनुभवों के विषय मात्र नहीं रह जातेबल्कि हम उन अनुभवों के व्याख्याकार बन जाते हैं।

एमएफ हुसेन की पेंटिंग ग्राम यात्रा


कला बहुआयामी होने की गुंजाइश भी देती है। किसी एक घटना के कई अर्थ हो सकते हैं, और कला हमें उन सभी को खंगालने की स्वतंत्रता देती है। यह किसी एक 'सत्य' की मांग नहीं करती, बल्कि इसमें विभिन्न परतें, विरोधाभास और अस्पष्टताएँ भी समाहित होती हैं। जहाँ जीवन अक्सर स्थिर और अपरिवर्तनीय प्रतीत हो सकता है, वहीं कला तरल और प्रवाहमान होती है। यह हमें अतीत में झाँकने का अवसर देती हैइसलिए नहीं कि जो घटित हो चुका है उसे बदल सकें, बल्कि इसलिए कि वह घटना हमारे भीतर किस रूप में जीवित है, उसे बदल सकें। ऐसा करने से, यह यादों के तीखेपन को नरम करती है और घावों को भरने के लिए एक नया स्थान बनाती है।

चित्तोप्रसाद का एक चित्र


इसके साथ ही, कला व्यक्तिगत अनुभवों को सार्वभौमिक अनुभवों से जोड़ती है। जब हम रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से अपने जीवन को फिर से लिखते हैं, तो हम अक्सर पाते हैं कि हमारी कहानियाँ दूसरों के जीवन से भी मेल खाती हैं। जो कार्य एक व्यक्तिगत प्रयास के रूप में शुरू होता है, वह धीरे-धीरे एक साझा अनुभव बन जाता है। एक चित्र किसी और के मौन दुख की प्रतिध्वनि बन सकता है; एक गीत उन भावनाओं को व्यक्त कर सकता है जिन्हें केवल शब्द पूरी तरह से बयाँ नहीं कर पाते। इस आदान-प्रदान के माध्यम से, कला अलग-थलग पड़े जीवन के बीच सेतु का निर्माण करती है, और हमें यह याद दिलाती है कि हमारे संघर्ष और हमारी खुशियाँ केवल हमारी अपनी ही नहीं हैं।

सोमनाथ होर का शिल्प


जीवन को फिर से लिखने के इस कार्य में अदम्य साहस भी निहित है। सृजन करने का अर्थ हैसाहसपूर्वक सामना करना; अपने अनुभवों को सीधे-सीधे देखना और उनसे मुँह मोड़ने के बजाय, उनके साथ जुड़ने का चुनाव करना। दर्द को सौंदर्य में, भ्रम को स्पष्टता में और मौन को एक सशक्त आवाज़ में बदलने के लिए अत्यंत संवेदनशीलता और साहस की आवश्यकता होती है। और ठीक यही साहस है, जो कला को इतना शक्तिशाली और प्रभावशाली बनाता है। यह जीवन की मुश्किलों को मिटा नहीं देता, बल्कि उन्हें एक नया रूप देता हैउन्हें देखने का एक नया नज़रिया देता है और कभी-कभी, उनसे मुक्ति भी दिलाता है।

केजी सुब्रमण्यन की रचना


कला जीवन की जगह नहीं लेतीबल्कि वह जीवन की फिर से कल्पना करती है। यह हमें वह भाषा देती है जहाँ पहले कोई भाषा नहीं थी; वह ढाँचा देती है जहाँ पहले केवल अव्यवस्था थी; और वह नियंत्रण का एहसास देती है जहाँ पहले केवल अनिश्चितता थी। यह कहना कि कला जीवन को फिर से लिखने का एक माध्यम है, मानव अस्तित्व में उसकी गहरी भूमिका को स्वीकार करना है। यह एक ही साथ दर्पण भी है और कलम भी: यह जो 'है' उसे दर्शाती है, और साथ ही हमें वह उसे अभिव्यक्त करने की आज़ादी देती है जो जो महसूस किया गया है, और जो 'हो सकता है'

अमित अम्बालाल की एक पेंटिंग


कला के माध्यम से, हम जीवन से भागते नहीं हैंबल्कि हम उसे फिर से लिखते हैं, एक-एक पंक्ति करके।