कला क्या है—यदि वह केवल किसी दृश्य, अनुभव या विचार को रूप देना नहीं, बल्कि स्वयं से आगे जाने की एक निरंतर कोशिश है?
चित्र, कविता, संगीत, नृत्य, शिल्प, छायाचित्र—कला के रूप अनेक हैं, उनके माध्यम अलग-अलग हैं, उनकी भाषाएँ भी अलग हैं;
लेकिन इन सबके भीतर एक अदृश्य धारा निरंतर बहती रहती है। यह धारा
मनुष्य के अनुभव, उसकी संवेदना, उसकी
स्मृति, उसके प्रश्नों और उसकी आकांक्षाओं से निर्मित होती
है। कला इसी प्रवाह को किसी रूप में दृश्य, श्रव्य या
अनुभव्य बनाती है।
पंकज निगम
द्वारा क्यूरेट की गई समूह प्रदर्शनी, "प्रवाह - जीवन के प्रवाह का उत्सव" में
पेंटर्स, मूर्तिकारों और
फ़ोटोग्राफ़र्स की अभिव्यक्तियाँ माध्यमों और शैली की भिन्नता के बावजूद जीवन के
जिस सतत प्रवाह को उजागर करती हैं, वह कलात्मक खोज की भावना को सामने लाती हैं। इस
प्रदर्शनी में आदर्श मिश्रा, खुशबू शर्मा, प्रांजलि चौधरी, दीपक, पारुल कुमार, मनोजकुमार एम. साकले, आनंदा गुप्ता, सौरभ मजूमदार, अजब सिंह, सोनिया सरीन, संजीव कुमार
सिन्हा, विनय कुमार, समीर मजूमदार, डिंपल चावला
डांग, विकास बैजल, स्मिता घोष
दत्ता, अजय रावत, डॉ. गुरदीप नागर, शीमिता
वात्स्यायन, बासु कुमार, सेबी ऑगस्टीन, विनय विक्रम सिंह, जयंती बनर्जी, ज़ैद और पंकज निगम की रचनाएँ शामिल हैं। 4 से 10
सितंबर 2026 तक नई दिल्ली की आईफैक्स की गैलरियों में इस प्रदर्शनी का आयोजन किया
जाएगा।
जीवन के प्रवाह
के उत्सव की प्रतीक इस प्रदर्शनी में शामिल कलाकारों की रचनाएँ देखने वालों को
दृश्य में बांधती हैं तो मुक्त भी करती हैं। कला का एक आयाम, एक उद्देश्य दर्शक की
मुक्ति भी है। एक कलाकार अपनी रचना के माध्यम से स्वयं को मुक्त करता है, और साथ
ही दर्शक के लिए भी मुक्ति का एक मार्ग संभव करता है। यह मुक्ति है वर्तमान से, जड़ता से, पूर्वनिर्धारित अर्थों से और
कभी-कभी स्वयं अपने बनाए हुए रूपों से भी। यह मुक्ति हमेशा प्रत्यक्ष नहीं होती।
कभी वह रूप को तोड़ती है, कभी रूप के भीतर ही एक नया अर्थ
खोजती है। कभी वह दिखाई देती है और कभी केवल महसूस की जा सकती है। कला में मुक्ति
का यह अनुभव रूप और अरूप, दृश्य और अदृश्य, स्थिरता और गति के बीच लगातार घटित होता रहता है।
सौरभ मजूमदार, दीपक, अजब सिंह, सोनिया सरिन आदि के शिल्प अपने संरचनात्मक विन्यास से अधिक अंतर्गुंफित अर्थ छवियों के कारण जीवन के प्रवाह को सामने लाते हैं। कोई भी रचना शून्य से जन्म नहीं लेती। उसके पीछे कलाकार का देखा हुआ संसार, जिया हुआ समय, स्मृतियाँ, असफलताएँ, प्रश्न और पूर्ववर्ती रचनाएँ उपस्थित रहती हैं। इस अर्थ में प्रत्येक रचना अपनी पिछली रचना का विस्तार है—उसका अगला पड़ाव, उसका परिवर्तन, उसका विकास। कलाकार जब दोबारा उसी विषय की ओर लौटता है, तब भी वह वास्तव में उसी जगह नहीं लौटता।
किसी भी रचना में कलाकार मनुष्य
के आगे बढ़ने के साथ ही उसके वापस लौटने को भी दर्ज करता है। इस संदर्भ में मनोजकुमार एम. सकाले, बासु कुमार, संजीव कुमार
सिन्हा, खुशबू शर्मा, जैद आदि की रचनाओं में देखा जा सकता है। समय बदल चुका होता है, देखने वाला बदल चुका होता है और स्वयं विषय भी अपने अर्थों
में बदल चुका होता है। इसलिए एक ही विषय में भी अनंत संभावनाएँ जन्म लेती रहती हैं,
और इस बात को इस प्रदर्शनी में शामिल रचनाओं में देखा जा सकता है। डॉ. गुरुदीप
नागर और अजय रावत के शिल्प, और जयंति बनर्जी, समीर मजूमदार, पारुल कुमार, पंकज
निगम आदि के चित्र जीवन के प्रवाह को अपनी तरह से सामने लाते हैं।
इस तरह ‘प्रवाह’ प्रदर्शनी जीवन की निरंतरता को देखने और अनुभव करने का एक अवसर सामने लाने
वाली साबित होगी, इसकी पूरी संभावना है। विभिन्न माध्यमों और शैलियों में काम कर
रहे कलाकारों की रचनाएँ यहाँ एक ऐसी साझा धारा में दिखाई देती हैं, जहाँ भिन्नताएँ अपनी जगह रहते हुए भी एक-दूसरे से संवाद करती हैं। एक रचना
दूसरी तक पहुँचती है, एक अनुभव दूसरे अनुभव को छूता है और एक
दृष्टि किसी दूसरी दृष्टि में अपना विस्तार खोजती है।
यह प्रवाह केवल कलाकृतियों के बीच नहीं है। यह कलाकार
और दर्शक के बीच भी है। रचना कलाकार के भीतर से निकलकर दर्शक के अनुभव में प्रवेश
करती है और वहाँ जाकर एक नए अर्थ, नई संवेदना और नए प्रश्न को जन्म
देती है। इस तरह कलाकृति पूर्ण होकर भी पूर्ण नहीं होती; उसका
अर्थ उसके बनने के बाद भी बहता रहता है।
आज जब निजी और सार्वजनिक जीवन, दोनों ही स्तरों पर अनेक प्रकार के विचलन, अस्थिरता और विखंडन हमारे अनुभव का हिस्सा बन चुके हैं, तब रचनात्मकता का यह प्रवाह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ठहराव और जड़ता
के विरुद्ध कला का होना अपने आप में एक सक्रिय प्रतिरोध है। वह हमें याद दिलाती है
कि मनुष्य केवल परिस्थितियों का परिणाम नहीं है; वह उन्हें
देखने, बदलने और नए अर्थों में रचने की क्षमता भी रखता है।
‘प्रवाह’ इसलिए
केवल एक समूह प्रदर्शनी नहीं, बल्कि मनुष्य के रचनात्मक
अस्तित्व की एक बुनियादी अवस्था है। एक ऐसी अवस्था जो निरंतर बहती है, बदलती है,
और हमेशा नये की संभावना को जिंदा रखती है।

























