बिकाश भट्टाचार्जी (1940-2006) का जन्म कोलकाता में हुआ था। पश्चिम बंगाल शुरु
से ही राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र रहा, जिनमें पूंजीवादी और साम्यवादी राजनीति
केंद्र में थी। 1960 का दशक, जब बिकाश भट्टाचार्जी का कला जीवन शुरु होता है,
वैचारिक और राजनीतिक सक्रियता का दशक था। कई तरह के राजनीतिक मोहभंग के साथ ही इसी
कालखंड में नक्सलवादी आंदोलन का उभार और किसान आंदोलन ऐसी घटनाएँ थीं जिन्होंने
सामान्य जीवन को प्रभावित किया। इन सबका बिकाश भट्टाचार्जी की कला पर गहरा प्रभाव
पड़ा। मध्यवर्गीय विचलन, अपसंस्कृति, वैचारिक अस्थिरता, और इसी तरह की दूसरी
विरोधाभासी स्थितियों के बीच व्यक्ति के अस्तित्व और व्यक्तित्व के संकट ने उनकी
कला को नया आयाम दिया। गहरे अंधेरे और विरोधाभासी चित्रण का उनकी कला में विशेष
स्थान रहा। उनकी कला में गुडिया सीरिज का विशेष स्थान है। 
बिकाश भट्टाचार्जी
बिकाश बाबू के नाम से मशहूर इस कलाकार एक राजनीतिक रूप से तनावपूर्ण वातावरण
में विकास हुआ, जिसका उनकी कला पर गहरा प्रभाव पड़ा। कम उम्र में ही अपने
पिता को खोने के बाद, वे उत्तरी कोलकाता में अपने चाचा के साथ रहने चले गए - जहाँ की गलियाँ और
निवासी उनके जीवन के अंत तक उनकी रचनाओं का आधार बने रहे। अपने बचपन के संघर्षों
ने उन्हें अपने आसपास के लोगों के संघर्षों के प्रति संवेदनशील बना दिया।
1970 के दशक की शुरुआत में उन्होंने 'गुड़िया श्रृंखला' नामक एक श्रृंखला चित्रित की। यह बंगाल में राजनीतिक
उथल-पुथल के चरम पर था, जहाँ नक्सलवादी आंदोलन ने राज्य को जकड़ रखा था। इन चित्रों में, एक गुड़िया को केंद्रीय
प्रतीक के रूप में उपयोग किया गया है, जो एक बच्चे के खिलौने की मासूमियत को कलकत्ता की सड़कों पर
व्याप्त हिंसा और आतंक के साथ जोड़ती है। गुड़िया को दराजों वाली अलमारियों में
कुछ ढूंढते हुए देखा जा सकता है, जिसके एक तरफ छोटी लाल किताब रखी हुई है, जैसा कि उस समय के कई बंगाली घरों में होता था।
बंगाल की शांत सड़कों पर, यह बेजान चीज़ जीवंत हो उठती है—कभी सड़क के कोनों से झाँकती हुई, कभी कपड़ों की रस्सियों पर लटकी हुई, या फिर दूसरी गुड़ियों के
साथ ढेर में पड़ी हुई। इन चित्रों में एक बेचैन करने वाला माहौल और उदास, धुंधले बैकग्राउंड के साथ एक
अजीब सी घबराहट दिखाई देती है। अधिकांश कला समीक्षक इस सीरिज को बंगाल के उस समय
के राजनीतिक माहौल का प्रतीक मानते हैं, पर देखा जाए तो उसी तरह के हालात देश में
बाकी हिस्सों में भी थे। 1970 के दशक के उत्तरार्ध्द तक आम लोगों के बीच डर,
अशांति और खौफ़ आम बात थी।
माना जाता है कि इस सीरीज़ की प्रेरणा उन्हें तब मिली, जब एक छोटी बच्ची ने भट्टाचार्जी से अपनी टूटी हुई
गुड़िया को फिर से रंगने और ठीक करने के लिए कहा। उन्होंने उस खिलौने का इस्तेमाल
कलकत्ता के निवासियों की दुर्दशा को दिखाने के एक माध्यम के तौर पर किया। इस बेजान
चीज़ का इस्तेमाल करके इंसानी भावनाओं को दिखाना और देखने वाले को झकझोर देना ही
इस सीरीज़ को इतनी तारीफ़ और शोहरत दिलाने की वजह बना।
बिकाश बाबू की कला यात्रा को देखें तो 1060 के दशक तक, उन्होंने अमूर्त चित्र बनाए और कोलकाता की छतों के
रेखाचित्र रचे। 1960 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 1970 के दशक के मध्य तक, उनकी रचनाओं में
अतियथार्थवादी श्रृंखलाएँ प्रमुख थीं, जिनमें अमानवीय और/या राक्षसी परिवेश की झलक मिलती थी। उनकी
बाद की रचनाओं में, फोटो यथार्थवाद प्रमुख हो गया, जैसे कि चित्र 'भोर' में। उन्हें भारतीय
कला जगत में यथार्थवाद को पुनर्जीवित करने का श्रेय दिया जाता है, ऐसे समय में जब कलाकार
अमूर्तता और विकृति की ओर अग्रसर थे। वे जलरंग, कॉन्टे और ऐक्रेलिक जैसे विभिन्न माध्यमों का उपयोग
करने वाले एक बहुमुखी चित्रकार थे, लेकिन वे मुख्य रूप से अपने तेल चित्रों के लिए जाने जाते हैं।
भट्टाचार्जी ने अपने दृश्य और बौद्धिक विचार कोलकाता की सड़कों और लोगों से
प्राप्त किए। गरीबी, हिंसा और लोगों के दयनीय जीवन को देखने के उनके अनुभव ने उन्हें एक अनूठा
दृष्टिकोण दिया और उन्हें दूसरों से अलग पहचान दिलाई। वे सार्वजनिक और निजी
स्थानों में पुरुषों, बच्चों और विशेष रूप से मध्यम वर्ग की महिलाओं के साथ-साथ वेश्याओं के चित्रों
के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके चित्र उस समय व्याप्त राजनीतिक उथल-पुथल और लोगों पर
इसके प्रभाव को दर्शाते हैं, जिससे उनमें बेचैनी का भाव तो आता है, लेकिन साथ ही एक परिचितता का भी एहसास होता है।





