Monday, March 31, 2025

Photography exhibition by Sanjay Das संजय दास की फोटोग्राफी प्रदर्शनी

Krishna and Kadamba tree



Sanjay Das is a familiar name in contemporary photography art who has long been famous for doing subject-oriented photography. His solo exhibition was held at the Museo Camera in Gurugram which was focused on Manipuri dance. This exhibition was curated by Ina Puri. In this, Sanjay has captured the emotional presentation of Krishna Leela and Kadamba tree by Manipuri artists on camera. Today, when most photo artists prefer colour photography, Sanjay establishes artistic beauty in black and white pictures. If you look at these photographs, there are scenes of dance presentation as well as preparation for the dance. Other artists preparing the artists, their costumes, makeup, etc., have special importance in dance, which Sanjay ji has given a new dimension with his camera. During the exhibition, an art dialogue took place between Ina Puri, Sanjay Das, and Aditya Arya, founder of Museo Camera, on March 29. Along with this, a group of Manipuri artists active in Gurugram presented a Manipuri dance titled Nritya Nikunj. This exhibition can be said to be creating a new relationship between different arts. 

Dr. Ved Prakash Bhardwaj








कृष्ण और कदंब का वृक्ष

संजय दास समकालीन फोटोग्राफी कला में एक परिचित नाम है जो लंबे समय से विषय केंद्रित फोटोग्राफी करने के लिए प्रसिद्ध हैं। गुरुग्राम स्थित म्यूजियो कैमरा में उनकी एकल प्रदर्शनी हुई जो मणिपुरी नृत्य पर एकाग्र थी। इस प्रदर्शनी को क्यूरेट किया था इना पुरी ने। इसमें कृष्ण लीला और कदंब वृक्ष को मणिपुरी कलाकारों की भाव स्तर पर प्रस्तुति को संजय ने कैमरे में कैद किया है। आज जब ज्यादातर फोटो कलाकार रंगीन फोटोग्राफी को प्राथमिकता देते हैं, संजय ब्लैक एंड व्हाइट चित्रों में कलात्मक सौंदर्य की स्थापना करते हैं। इन फोटोग्राफ्स को देखें तो उनमें नृत्य की प्रस्तुति के साथ ही नृत्य की तैयारी के दृश्य भी हैं। कलाकारों को तैयार करते दूसरे कलाकार, उनकी पोषाख, मेकअप आदि का नृत्य में विशेष महत्व होता है जिसे संजय जी ने अपने कैमरे से एक नया आयाम दिया है। प्रदर्शनी के दौरान 29 मार्च को इना पुरी, संजय दास और म्यूजियो कैमरा के संस्थापक आदित्य आर्य के बीच कला संवाद हुआ। इसके साथ ही गुरुग्राम में सक्रिय मणिपुरी कलाकारों के समूह ने नृत्य निकुंज शीर्षक से मणिपुरी नृत्य प्रस्तुत किया। यह प्रदर्शनी एक तरह से विभिन्न कलाओं के बीच एक नया संबंध बनाती कही जा सकती है। 

Monday, March 3, 2025

कला हमेशा रहेगीः हिम्मत शाह

हिम्मत शाह से वेदप्रकाश भारद्वाज की 30 नवंबर 2005 को अनंत आर्ट गैलरी में हुई बातचीत के अंश
आपने पेंटिंग से लेकर शिल्प तक सभी विधाओं में काम किया है। आपने आकृतिमूलक और अमूर्त दोनों तरह के काम किये हैं। आज के युवा कलाकार चाहे वे पेंटर हों या शिल्पी, उनके काम में काफी परिवर्तन हैं, और प्रयोग भी। आप उनके काम को किस तरह से देखते हैं? 

देखिये, एक बात तो यह है कि दूसरे के काम पर कोई भी निर्णय देना या निष्कर्ष देना संभव नहीं है। दूसरे कलाकार जो कुछ करते हैं उसपर टिप्पणी करना बहुत मुश्किल है। शायद मुझमें इतनी क्षमता नहीं है। पर इतना जरूर कहना चाहूंगा कि आज भारत में जो कलाकार काम कर रहे हैं वह काफी अच्छा है। जहां तक युवा कलाकारों का सवाल है तो वे काफी कुछ नया कर रहे हैं, नया खोज रहे हैं। कला की दुनिया बहुत बड़ी है, उसमें बहुत संभावनाएं हैं जबकि अब तक कला में जो कुछ हुआ है वह बहुत कम है। कला एक बहुत बड़ा समुद्र है जिसमें से कोई क्या निकाल लेता है या निकाल पाता है यह उसपर निर्भर करता है। आप समझिये कि कला में एक तरह से समुद्र मंथन हो रहा है। आज भारतीय कलाकार नयी से नयी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।
आज के कई युवा कलाकारों का काम देखें तो वे बहुत बड़े-बड़े शिल्प बना रहे हैं। उनमें प्रदर्शनप्रियता जितनी है उसनी सामग्री के प्रति संवेदनशीलता नहीं है। आपने टेराकोटा से लेकर मेटल तक सभी सामग्रियों में काम किया है। आपको सबसे अधिक प्रिय कौन सी सामग्री लगती है? 

क्ले मुझे सबसे प्रिय है क्योंकि उसमें इतना लोच है, इतनी अधिक संभावनाएं हैं काम करने की कि आप उसमें बहुत कुछ कर सकते हैं। आज बहुत से कलाकार कई तरह के माध्यमों में काम कर रहे हैं परंतु मैं तो अब केवल क्ले में काम करता हूं। हां, जब कभी मुझे लगा कि क्ले में किये काम को ब्रांज या लकड़ी में करने पर अच्छा लगेगा तो उसे उस सामग्री में भी किया। पर अब मेरी सेहत ठीक नहीं रहती। शरीर में बहुत ताकत नहीं रह गयी है इसलिए कह नहीं सकता कि आगे कितना काम कर पाऊंगा। यही वजह है कि मैंने अपनी इस प्रदर्शनी में 20-25 साल में किये काम में से जो बचा कर रखा था उसी को प्रदर्शित किया है। यह प्रदर्शनी भी अनंत आर्ट गैलरी की ममताजी करना चाहती थी इसलिए हो पायी है, वर्ना मैं तो अब प्रदर्शनी करना भी नहीं चाहता था।
ऐसा क्यों? इसकी वजह दिल्ली से जयपुर जाने के बाद बने हालात हैं या कुछ और? 

मुझमें अब प्रदर्शनी करने की बहुत शक्ति नहीं बची है। मैं 73 साल का हो गया हूं इसलिए अब प्रदर्शनी करने की बजाय मुझे केवल अपना काम करने में आनंद मिलता है। वैसे भी मैं कभी भी लगातार प्रदर्शनियां नहीं करता था। पांच-दस साल के अंतराल में ही मेरी प्रदर्शनी होती थी। 

  आपने शुरू में पेंटिंग भी की परंतु उस समय जब भारत में पेंटिंग का बाजार एक तरह से बनने लगा था तब आप पूरी तरह शिल्प करने लगे जबकि उसका बाजार नहीं था। ऐसा क्यों? 

ऐसा था कि पेंटिंग करते-करते मैंने पाया कि उसमें रिलिफ वर्क होने लगा है। तब मुझे लगा कि शिल्प मेरे लिए अधिक प्रभावी माध्यम हो सकता है। उसी दौरान मैंने अहमदाबाद में एक म्यूरल बनाया। यह सब करते-करते मुझे शिल्प में अधिक आनंद आने लगा तो मैं पूरी तरह शिल्प में रम गया। अलबत्ता अब राजस्थान जाने के बाद मैंने सोचा है कि पेंटिंग भी करूंगा, यह अलग बात है कि मेरी पेंटिंग की शैली पुरानी ही रहेगी। मैं उसमें कोई नये प्रयोग नहीं करूंगा। मैं राजस्थान में स्मारक देखता हूं, उनपर किया गया काम देखता हूं तो लगता है कि उसमें बहुत कुछ करने की संभावना है। वही सब मैं करना चाहता हूं।
आपके शिल्पों में अमूर्त अधिक है। उसमें कई जानी-अनजानी आकृतियों का आभास होता है। शिल्प में अमूर्तन को आपने क्यों अपनाया? 

 ऐसा है कि मैं ज्यादातर क्ले में काम करता हूं और उसमें करते-करते देखता हूं कि क्या फॉर्म बन रहा है। कोई नया फॉर्म मिल जाए जिसमें एक आकर्षण हो तो वह करने लगता हूं। ऐसा करते-करते कुछ अच्छा बन जाता है तो उसे अंतिम रूप दे देता हूं। आज मेरे टेराकोटा के काम को लोग पसंद करने लगे हैं, खरीदने लगे हैं, पर पहले ऐसा नहीं था। जहां तक मेरे काम में अमूर्तन की बात है तो मैंने इसे इस रूप में रचने की इच्छा कभी नहीं की। मैं शिल्प को हमेशा चाक्षुष रूप में देखता हूं कि जो भी फॉर्म बन रहा है उसमें आनंद है या नहीं। मिट्टी में जो लचीलापन होता है उससे नये-नये रूप बनते चलते हैं जो आपको आनंद देते हैं। उसमें एक सौंदर्य होता है। मैं केवल उस सौंदर्य को महत्व देता हूं, रूप को नहीं।
आज आपका काम खरीदा जाने लगा है, गैलरियां भी आपके काम में रुचि लेने लगी हैं जबकि एक समय आपका काम कोई खरीदता नहीं था। इस स्थिति को आप किस रूप में देखते हैं? 

अच्छा ही लग रहा है। स्थितियां अब बदली हैं। देश में आर्थिक विकास हो रहा है। लोगों के पास पैसा आया है तो वे कला को देखने-खरीदने लगे हैं। लोग कला को संग्रहित करने लगे हैं। कलाकार को एक सम्मान और पहचान मिलने लगी है। पहले लोग डॉक्टर, वकील, इंजीनियर आदि को ही जानते थे, कलाकार को कोई जानता तक नहीं था। पहले कोई बच्चा कला में जाना चाहता था तो उसके परिवार के लोग मना करते थे कि कला में जाकर क्या करेगा। पर अब ऐसा नहीं है। अब लोग अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर के समान ही कलाकार बनाने को भी महत्व देने लगे हैं क्योंकि अब कला का बाजार काफी बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में भी भारतीय कला का स्थान बना है। यह सब अच्छी बात है। कला का जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है। बड़े-बड़े विचारकों ने भी कहा कि जब मानव जाति का अस्तित्व भी नहीं रहेगा उस समय भी कला मौजूद रहेगी। जब कोई उम्मीद नहीं रहेगी तब कला ही एकमात्र उम्मीद होगी। मानव जीवन में शुरू से ही कला रही है, चाहे उसका रूप जो भी रहा हो। लोग हाथ से कुछ बनाते हैं, यह बहुत अच्छी बात है। छोटे-छोटे बच्चे भी घास से या किसी और चीज से मोर, चिडिया आदि बना लेते हैं। हमारे चारों तरफ सौंदर्य बिखरा पड़ा है जिसे देखकर हम अभिभूत हो जाते हैं। आज कला सामग्रियों के स्तर पर विकल्प और संभावनाएं बहुत बढ़ गयी हैं। लोग नयी-नयी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। 

  आपके टेराकोटा शिल्पों में एक तरह की संवेदना, संगीत और काव्यात्मकता है जो आज नयी सामग्रियों में काम करने वाले बहुत से शिल्पियों के काम में देखने को नहीं मिलती, ऐसा क्यों है? 

 इसका कारण मिट्टी का अपना गुण है, उसका अपना चरित्र है। मिट्टी एकदम सीधा माध्यम है। वह इतनी कोमल होती है कि आप उसे दबाकर चाहे जो रूप दे सकते हैं। वह आपके दिल के साथ काम करती है। और काम करते-करते एक समय वह भी आता है जब आपको लगता है कि मिट्टी का भी दिल धड़क रहा है। मैं पहले से कोई रेखांकन या सांचा बनाकर काम करने की बजाय सीधे काम करता हूं। इसीलिए मुझे ग्राफिक में काम करना पसंद नहीं है। मिट्टी में आप सीधे सामग्री की संवेदना को महसूस करते हुए काम कर सकते हैं।
आपका साहित्य से भी जुड़ाव रहा है, आप लिखते भी रहे हैं। और आपके काम में संगीत भी है। तो आप विभिन्न कला माध्यमों के संबंध को किस तरह से देखते हैं?

मैं साहित्य तो लगातार पढ़ता रहता हूं, विशेषरूप से कविता। हिंदी में बहुत से अच्छे कवि हैं। अन्य भाषाओं की रचनाएं भी अनुवाद के रूप में पढ़ने को मिल जाती हैं। इधर जो नये लेखक आये हैं, वे बहुत अच्छे प्रयोग कर रहे हैं। संगीत और नाटक से भी मुझे गहरा लगाव रहा है। यही वजह है कि मेरे काम में कभी-कभी कविता तो कभी संगीत का असर आ जाता है। मेरे ड्राइग में संगीतात्मकता काफी होती है। मैं जो कुछ पढ़ता, सुनता, देखता हूं वह सब किसी न किसी रूप में मेरे काम में आ ही जाता है। मैं मानता हूं कि कलाकार भी एक कृति को उसी तरह जन्म देता है जैसे एक मां बच्चे को जन्म देती है। 

  पब्लिक आर्ट के नाम पर नेताओं की मूर्तियों और फौव्वारों के अलावा कुछ नहीं मिलता। इस पर आपका क्या कहना है? 

अभी हमारे यहां वास्तविक अर्थ में पब्लिक आर्ट हुआ ही नहीं है। वातावरणीय कला, कि किस जगह पर क्या लगाया जाए कि अच्छा लगेगा, यह सोच ही हमारे यहां नहीं बन पाई है। एक जगह का सौंदर्य क्या है और उसे किस तरह सुंदर बनाया जा सकता है, यह विचार ही हमारे यहां नहीं बन पाया है। अमेरिका और यूरोप में देखें तो वहां बड़े-बड़े कलाकारों ने पब्लिक आर्ट के तहत बहुत अच्छा काम किया है। विदेशों में भी नेताओं की मूर्तियां लगायी जाती हैं जो कला की दृष्टि से भी बहुत अच्छी होती हैं पर हमारे यहां जो नेताओं की मूर्तियां लगायी जाती हैं वह बहुत अच्छी नहीं होतीं। वडोदरा में और कुछ अन्य जगहों पर अच्छा काम हुआ क्योंकि वहां के महाराजा विदेशों से अच्छे कलाकारों को ले आये जिसके कारण हमें कुछ अच्छे शिल्प देखने को मिल जाते हैं। 

  कला और समाज के संबंध को आप किस तरह देखते हैं। क्या समाज में कला की स्वीकृति है और क्या कला और समाज एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं? 

समाज में कला हो, लोग कला को देखें, उनमें सौंदर्यबोध विकसित हो, सब अच्छी तरह से रहें तो अच्छी बात होगी। कला को जीवन का एक अंग बनना चाहिए। आज लोग घरों में पेंटिंग या ड्राइंग लगाने लगे हैं। कई लोग तो पेंटिंग नहीं खरीद पाने के कारण उसका प्रिंट लगाते हैं। पहले भी जीवन में कला थी। लोग घरों में कढ़ाई के रूमाल, कपड़े आदि लगाते थे, मिट्टी की मूर्तियां बनाते थे। राजस्थान में, कच्छ में लोग घरों की दीवारों पर पेंटिंग करते थे, रिलिफ वर्क करते थे।

  पर शहरी जीवन में देखें तो आज भी लोग शिल्प को उतना पंसद नहीं करते जितना पेंटिंग को। 

 ऐसा नहीं है। अब लोग शिल्प भी खरीदने लगे हैं। उसका बाजार बनने लगा है। यही वजह है कि बहुत से पेंटर भी शिल्प बनाने लगे हैं। आज कला का अच्छा बाजार बन गया है। बहुत से कलाकार अच्छा पैसा कमा रहे हैं, बहुत अच्छी तरह से रह रहे हैं। पैसा आने से कलाकारों के काम में भी सुधार हुआ है। दरअसल, पैसा न हो तो कलाकार की बहुत सी क्षमताएं दबी रह जाती हैं। पैसा आने से वह बाहर आयी हैं।
आपका कोई सपना या ऐसा काम जो आप करना चाहते हैं? 

अब तो मेरी केवल आराम करने की इच्छा रहती है। उम्र हो चली है और तबीयत भी ठीक नहीं रहती। इसलिए थोड़ा सा काम करने के बाद ही आराम करने की इच्छा होने लगती है। पिछले पांच-छह साल से मैंने कोई नया काम किया ही नहीं है। मैं तो अब खुद को कलाकार भी नहीं मानता। 

  पर जयपुर जाने के पीछे आपकी कुछ विशेष काम करने की इच्छा थी, कुछ उद्देश्य था

नहीं, कोई उद्देश्य नहीं था। मैं शांति चाहता था और दिल्ली में रहना नहीं चाहता था, इसलिए वहां चला गया। राजस्थान मुझे इसलिए अच्छा लगता है कि वहां कला और शिल्प में बहुत कुछ देखने को मिलता है। वहां के स्मारक, महल आदि में घूमना अच्छा लगता है। वहां काफी जगह है, शांति है जो दिल्ली में नहीं है। फिर वहां के जीवन में अभाव ने कला को जन्म दिया है। वहां के मकान मिट्टी और पत्थर के होते हैं, वहां की खेती, वहां की जमीन, सब कुछ एकदम कविता की तरह लगते हैं। 

कला के संदर्भ में आमतौर पर लोगों की यह अपेक्षा रहती है कि एक पेंटिंग या शिल्प में किसी साफ-साफ अर्थ मिले। एक कृति में आप अर्थ को कितना महत्व देते हैं? 

मैं इस बात को नहीं मानता कि कला में कोई सीधा-सीधा अर्थ होना चाहिए या वह देखने वाले को किसी व्यक्ति या स्थिति के बारे में साफ-साफ समझाए। यदि ऐसा होगा तो वह इलस्ट्रेशन हो जाएगा। कला आप केवल आनंद के लिए देखते हैं। मैं अपने काम के माध्यम से कुछ कहना नहीं चाहता। मैं मानता हूं कि कला के माध्यम से किसी तरह का परिवर्तन नहीं आता। कला तो सिर्फ आपको अंदर से आनंदित करती है। 

  पर लोग अक्सर किसी पेंटिंग में एक अर्थ तो तलाश करते ही हैं? 

हां, ऐसा लोग करते हैं परंतु अर्थ का क्या है, अब मेरा नाम हिम्मत शाह है परंतु मुझमें हिम्मत है ही नहीं। (हंसते हैं) 

ऐसा तो नहीं है। आपमें हिम्मत तो खूब रही है और आज भी है। इसी हिम्मत के सहारे आप प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद अपनी कला को अपनी शर्तों पर जीते आये हैं। 

इसका कारण यह है कि एक कलाकार अपना काम नहीं छोड़ सकता। कोई फैक्टरी वाला हो और वह कार बनाता है, यदि कार नहीं बिकेगी तो वह साइकिल बनाने लगेगा, वह नहीं बिकेगी तो कुछ और बनाने लगेगा। पर एक कलाकार तो सिर्फ कला कर सकता है इसलिए वह हर स्थिति में अपना काम करता रहता है। 

  पर आज कई कलाकार ऐसे हैं जो बाजार में जिस तरह का काम बिकता है, उसी तरह का काम करते हैं?

किसी कलाकार को यह करना यदि अच्छा लगता है तो उसकी मर्जी। मुझे इसपर कोई बुराई नहीं लगती है। मैं तो बस इतना मानता हूं कि यदि आप पैसे के लिए कला करते है तो उसमें कोई बुराई नहीं है बशर्ते आप कला करें।

  (चित्र किरण नडार म्यूजियम ऑफ आर्ट, सैफरन आर्ट और गूगल से साभार)